नास्तिक ही असली पात्र हैं- ओशो

मैं नास्तिकों की ही तलाश में हूं, वे ही असली पात्र हैं. आस्तिक तो बड़े पाखंडी हो गए हैं. आस्तिक तो बड़े झूठे हो गए हैं. अब आस्तिक में और सच्चा आदमी कहां मिलता है? अब वे दिन गए, जब आस्तिक सच्चे हुआ करते थे. अब तो अगर सच्चा आदमी खोजना हो तो नास्तिक में खोजना पड़ता है.

आस्तिक के आस्तिक होने में ही झूठ है. उसे पता तो है नहीं ईश्वर का कुछ, और मान बैठा है. न आत्मा का कुछ पता है, और विश्वास कर लिया है. यह तो झूठ की यात्रा शुरू हो गयी. और बड़े झूठ! एक आदमी छोटे-मोटे झूठ बोलता है, उसको तुम क्षमा कर देते हो. क्षमा करना चाहिए. लेकिन ये बड़े-बड़े झूठ क्षम्य भी नहीं हैं. ईश्वर का पता है? अनुभव हुआ है? दीदार हुआ है? दर्शन हुआ है? साक्षात्कार हुआ है? कुछ नहीं हुआ. मां-बाप से सुना है. पंडित-पुरोहित से सुना है. आसपास की हवा में गूंज है कि ईश्वर है, मान लिया है. भय के कारण, लोभ के कारण, संस्कार के कारण. यह मान्यता दो कौड़ी की है. यह असली आस्तिकता थोड़े ही है. यह नकली आस्तिकता है. असली आस्तिकता असली नास्तिकता से शुरू होती है.

नास्तिक कौन है? नास्तिक वह है जो कहता है, मुझे अभी पता नहीं, तो कैसे मानूं? जब तक पता नहीं, तब तक कैसे मानूं? जानूंगा तो मानूंगा. और जब तक नहीं जानूंगा, नहीं मानूंगा.

मैं ऐसे ही नास्तिकों की तलाश में हूं. जो कहता है जब तक नहीं जानूंगा तब तक नहीं मानूँगा, मैं उसी के लिए हूं. क्योंकि मैं जनाने को तैयार हू. आओ, मैं तुम्हें ले चलूं उस तरफ! मैंने देखा है, तुम्हें दिखा दूं! आस्तिक को तो फिकर ही नहीं है देखने की. वह तो कहता है, हम तो मानते ही हैं, झंझट में क्या पड़ना! हम तो पहले ही से मानते हैं. यह उसकी तरकीब है परमात्मा से बचने की. उसकी परमात्मा में उत्सुकता नहीं है. इतनी भी उत्सुकता नहीं है कि इंकार करे. वह परमात्मा को दो कौड़ी की बात मानता है, वह कहता है, क्या जरूरत है फिकर करने की? असल में परमात्मा की झंझट में वह पड़ना नहीं चाहता, इसलिए कहता है कि होगा, जरूर होगा, होना ही चाहिए; जब सब लोग कहते हैं तो जरूर ही होगा. इसको बातचीत के योग्य भी नहीं मानता है. इस पर समय नहीं गंवाना चाहता है. वह कहता है, यह एक औपचारिक बात है, कभी हो आए चर्च, कभी हो आए मंदिर, कभी रामलीला देख ली-सब ठीक है. अच्छा है, सामाजिक व्यवहार है. सबके साथ रहना है तो सबके जैसा होकर रहने में सुविधा है. सब मानते हैं, हम भी मानते हैं. अब भीड़ के साथ झंझट कौन करे? और झंझट करने-योग्य यह बात भी कहां है? इसमें इतना बल ही कहां है कि इसमें हम समय खराब करें?

तुम देखते हो, लोग राजनीति का ज्यादा विवाद करते हैं, बजाय धर्म के. बड़ा विवाद करते हैं कि कौन-सी पार्टी ठीक! बड़ा विवाद करते हैं कि कौन-सा सिद्धांत ठीक! धर्म का तो विवाद ही खो गया है! धर्म का विवाद ही कौन करता है? अगर तुम एकदम बैठे हो कहीं होटल में, क्लबघर में और एकदम उठा दो कि ईश्वर है या नहीं; सब कहेंगे कि भई होगा, बैठो, शांत रहो, जरूर होगा, मगर यहाँ झंझट तो खड़ी न करो। कौन इस बकवास में पड़ना चाहता है?

नास्तिक अभी भी उत्सुक है. नास्तिक का मतलब यह है–वह यह कहता है कि परमात्मा अभी भी विचारणीय प्रश्न है; खोजने-योग्य है; जिज्ञासा-योग्य है; अभियान-योग्य है. जाऊंगा, खोजूंगा। नास्तिक यह कह रहा है कि मैं दावं पर लगाने को तैयार हूं. समय, तो समय लगाऊंगा.

मेरे अपने देखे जगत में जो परम आस्तिक हुए हैं, उनकी यात्रा परम नास्तिकता से ही होती है, क्योंकि सचाई से ही सचाई की खोज शुरू होती है. कम-से-कम इतनी सच्चाई तो बरतो कि जो नहीं जानते हो उसको कहो मत कि मानता हूं.

नास्तिक की भूल कहां होती है? नास्तिक की भूल इस बात में नहीं है कि वह ईश्वर को नहीं मानता, नास्तिक की भूल इस बात में है कि ईश्वर के न होने को मानने लगता है. तब भूल हो जाती है. फर्क समझ लेना.

अगर आस्तिक ईमानदार है तो वह इतना ही कहेगा कि मुझे पता नहीं, मैं कैसे कहूं कि है, मैं कैसे कहूं कि नहीं है? अपना अज्ञान घोषणा करेगा; लेकिन ईश्वर के संबंध में हां या नहीं का कोई निर्णीत जवाब नहीं देगा. यह असली नास्तिक है. जो नास्तिक कहता है कि मुझे पता है कि ईश्वर नहीं है, यह झूठा नास्तिक है. यह आस्तिक जैसा हि झूठा है. आस्तिक ने एक तरह की झूठ पकड़ा है-बिना पता हुए कहता है कि ईश्वर है, इसने दूसरी तरह की झूठ पकड़ा है–बिना पता हुए कहता है कि ईश्वर नहीं है. दोनों झूठ हैं.

असली नास्तिक कहता है, मुझे पता नहीं, मैं अज्ञानी हूं, मैंने अभी नहीं जाना है, इसलिए मैं कोई भी निर्णय नहीं दे सकता, मैं कोई निष्कर्ष घोषित नहीं कर सकता.

मगर यही तो खोजी की अवस्था है. यही तो जिज्ञासा का आविर्भाव है. यहीं से तो जीवन की यात्रा शुरू होती है.

तुम कहते हो, ‘आत्मा-परमात्मा, पूर्वजन्म-पुनर्जन्म, मंत्र-तंत्र , चमत्कार- भाग्यादि में मेरा कतई विश्वास नहीं है. मैं निपट नास्तिक हूं.’ तो तुम ठीक आदमी के पास आ गए. अब तुम्हें कहीं जाने की कोई जरूरत न रही. मैं भी महा नास्तिक हूं. दोस्ती बन सकती है. मैं तुम्हारी ‘नहीं’ को ‘हां’ में बदल दूंगा. मगर यह बदलाहट किसी विश्वास के आरोपण से नहीं-यह बदलाहट किसी अनुभव से. और वह अनुभव शुरू हो गया है. किरण उतरने लगी है. तुम कहते हो, ‘आपके प्रवचनों में अनोखा आकर्षण है तथा मन को आनंद से अभिभूत प्रेरणाएं मिलती हैं.’ शुरू हो गयी बात, क्योंकि परमात्मा आनंद का ही दूसरा नाम है. परमात्मा कुछ और नहीं है, आनंद की परम दशा है, आनंद की चरम दशा है. परमात्मा सिर्फ एक नाम है आनंद के चरम उत्कर्ष का. शुरू हो गयी बात. तुम मुझे सुनने लगे, डोलने लगे मेरे साथ; तुम मुझे सुनने लगे, मस्त होने लगे; तुम मेरी सुराही से पीने लगे; शुरू हो गयी बात. तुम रंगने लगे मेरे रंग में. अब देर की कोई जरूरत नहीं है. तुम संन्यासी बनो. बनना ही होगा! अब बचने का कोई उपाय भी नहीं है. अब भागने की कोई सुविधा भी नहीं है.

मेरे संन्यास में आस्तिक स्वीकार है, नास्तिक स्वीकार है. आस्तिक को असली आस्तिक बनाते हैं, क्योंकि आस्तिक झूठे हैं. नास्तिक को परम नास्तिकता में ले चलते हैं, क्योंकि परम आस्तिक और परम नास्तिक एक ही हो जाते हैं. कहने-भर का भेद है. आखिरी अवस्था में ‘हां’ और ‘न’ में कोई भेद नहीं रह जाता; वे एक ही बात को कहने के दो ढंग हो जाते हैं.

-ओशो

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