नोटबंदी बनाम वोटों की गोलबंदी

उत्तर प्रदेश में 2017 में होने वाला विधानसभा का आम चुनाव श्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 8 नवम्बर-2016 को सम्पूर्ण देश को आर्थिक आपातकाल के दावानल में झोंक दिया. जिसमें बैंक के बाहर अपना ही पैसा प्राप्त करने के लिए लाइनों में लगे लगभग 74 लोगों की जान जा चुकी है. जो उरी में हुए आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों से चार गुणा से भी ज्यादा हैं. जिन्हें सम्पूर्ण विपक्ष की पूरजोर मांग के बावजूद शहीद मानकर सरकार ने श्रद्धांजलि देने से साफ मना कर दिया. इससे समझा जा सकता है कि देश की आम जनता के दु:ख दर्द से मोदी सरकार का कोई सरोकार नहीं, वह मरती हो तो मरने दो.

मायावती जो उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी है तथा राज्यसभा की सदस्य हैं, इस समय देश में विपक्ष की सबसे कद्दावर नेता होकर उभरी है. उन्होंने राज्यसभा में कहा कि मोदी सरकार ने देश पर आर्थिक आपात काल थोप दिया है …देश की जनता पर ही सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया है. बाद में सभी पार्टियों के नेताओं ने उनके ही बयान को दोहराया.

मोदी सरकार की पूरी कोशिश है कि वह यह साबित कर पाए कि समूचा विपक्ष उनका विरोध इसलिए कर रहा है कि उसके पास काला धन है? उनके नोटबंदी कार्यक्रम से सपा, बसपा का यह काला धन बेकार हो जाएगा और उनके पास चुनाव लड़ने के लिए पैसा ही नहीं होगा. सारा विपक्ष यह कह रहा है कि देश की जनता जानती है कि सबसे ज्यादा काला धन देश में किस दल के पास है. लेकिन उसने उसे पहले ही ठिकाने लगा दिया है. इसके लिए विपक्षी दल पश्चिमी बंगाल भाजपा द्वारा 7 नवंबर को बैंक में जमा कराए गए एक करोड़ रूपए को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं

जब भी किसी देश में नोटबंदी होती है, तो कभी भी पूरी मुद्रा वापस नहीं आती है. उसका बीस से पच्चीस प्रतिशत हिस्सा वापस नहीं आता है. 500-1000 के जो नोट चलन में हैं, उनका 20 प्रतिशत 8 लाख करोड़ बैठता है. जिसका घोटाला करके सरकार अपने कुछ सहयोगी पूंजीपतियों के ऋण माफ़ कर देना चाहती है. जिसे वे 2017 के यूपी के चुनाव तथा 2019 के लोकसभा चुनाव में पुनः निवेश कर देंगे. सरकार द्वारा अपने चहेते उधोगपतियों के बड़े-बड़े ऋण माफ करने के कारण बैंकों के खजाने खाली हो गए थे, उन्हें भरने के लिए नोटबंदी का उपक्रम किया गया, जिसके कारण बैंकों के पास इतनी मुद्रा इक्कट्ठी हो जाएगी, जिससे बड़े-बड़े उधोगपतियों को सरकार ब्याज रहित या बहुत ही कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध करवा देगी

इस पूरे घटनाक्रम से साबित होता है कि भाजपा की कथनी और करनी में भारी अंतर है. जैसा कि कहा जाता है कि भाजपा में सामूहिक नेतृत्व है और निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं. यह निर्णय प्रधानमंत्री ने अकेले ही लिया है और उसकी घोषणा भी उन्होंने अकेले ही की है. जो देश को अधिनायकवाद (तानाशाही) की ओर ले जाने वाला कदम है. लोग कह रहे हैं कि उन्होंने सरकार और पार्टी दोनों को हाइजैक कर लिया है.

आपातकाल की तारीफ जिस तरह आम जनता कर रही थी, नोटबंदी की तारीफ भी लोग उसी तरह कर रहे हैं. आपातकाल में जनता जिस तरह परेशान थी, नोटबंदी से भी आम जनता उसी तरह परेशान है. जिस तरह भारत की जनता ने आपातकाल के विरोध में वोट दिया था और कांग्रेस हार गई थी. क्या नोटबंदी के विरोध में भी जनता उसी तरह वोट देगी? यह कहना अभी जल्दबाजी होगी. इसके लिए फरवरी 2017 तक प्रतीक्षा करनी होगी और 2019 तो अभी दूर है.

लेखक से इस पर drnsingh27@gmail.com संपर्क किया जा सकता है.

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