शिक्षा के अधिकार का मजाक उड़ाती मध्यप्रदेश सरकार !

मुरैना। मुरैना के खेरवारेरी का पुरा-संगोली गांव में तीन कमरों का मकान है. चटकती दीवारों पर गोबर लीपा हुआ है. यहीं लकड़ी के खंभे बल्ली और रस्सी से बंधे हुए हैं. तीन कमरों का यह मकान असल में एक स्कूल है, जिसे एक दशक पहले सिर्फ दलित बच्चों को पढ़ाने के लिए बनाया गया था. लेकिन आज यहां न तो अध्यापक हैं और न ही बच्चे. एक कमरे के भीतर झांकने पर आपको धूल से भरा हुआ ब्लैक बोर्ड दिख जाएगा. कुर्सी, बेंच और टेबल का तो अब यहां नामों-निशान नहीं है. इस इमारत में आप शिक्षा का मजाक उड़ते हुए देख सकते हैं. खेरवारेरी के पुरा संगोली गांव का यह स्कूल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 465 किमी. दूर है.

भारत और राज्य सरकार बच्चों को शिक्षा के अधिकार की गारंटी देता है लेकिन मुरैना के इस स्कूल में पहली से पांचवी तक मात्र 30 बच्चें पढ़ रहे हैं और अध्यापक भी सिर्फ दो ही पढ़ाने आते है. यह दो अध्यापक ही बच्चों को सभी विषय पढ़ाते. लेकिन क्लास बहुत कम लगती हैं, अध्यापक का कहना है कि कुछ प्राइमरी पास तो हो जाते है लेकिन उन्हें एक अक्षर का भी ज्ञान नहीं होता है. ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल और बच्चों की उपेक्षा के पीछे जाति का बंटवारा है. स्कूल में एक स्थायी अध्यापक है जोकि स्कूल का हेडमास्टर भी है, वह उच्च जाति का है और दलित बच्चों के साथ पक्षपात करता है. उस पर आरोप है कि वह बच्चों को गलत तरीके से सीखता है. वह बच्चों को बोलता है कि अगर वह उच्च जाति वालों के खेतों में काम करेगें तो शिक्षित होंगे.

गांव के एक व्यक्ति राधेश्याम जाटव ने बताया कि स्कूल हरिजन बस्ती में है, छात्र अध्यापकों के लिए अछूत है. अध्यापक बहुत मुश्किल से आते हैं. जाटव ने हेडमास्टर पर बच्चों का भविष्य बर्बाद करने का भी आरोप लगाया. एक छात्र सूरज जाटव ने कहा कि बच्चों का नाम सिर्फ इसलिए लिखा जाता है कि स्कूल में अधिक से अधिक मिड-डे-मील मिल सके, जोकि बच्चों को कभी-कभी मिलता है. छह साल का गुड्डू पांचवी क्लास में पढ़ता जबकि उसकी उम्र के हिसाब से वह पहली क्लास में होना चाहिए. इसी तरह सात साल के देवेश ने पांचवी पास कर ली है. स्कूल की रसोई खंडहर बन गई है. गांव के लोग यहां जानवरों को चारा खिलाने और गोबर कराने के लिए बांधते हैं.

मिड-डे-मील बनाने वाली रसोइया अंगूरी देवी का कहना है कि अध्यापक मुझे कभी-कभी खाना बनाने का आदेश देते हैं, सिर्फ 250 ग्राम दाल और रोटी. उसने आगे कहा कि किचन गोबर से भरा रहता है तो में घर से ही खाना बना कर लाती हूं और बच्चों से उनकी प्लेट मांग कर ही खाना परोसती हूं. हेडमास्टर रामकुमार तोमर ने आरोप को खारिज कर दिया और कहा कि मैं अपना काम ईमानदारी के साथ करता हूं और जातिवाद में विश्वास नहीं करता हूं. लेकिन ग्रामीण उसकी ईमानदारी पर सवाल उठा रहे हैं. उन्होंने कहा कि अध्यापक हरिजन बस्ती के नवजात बच्चों का नाम भी लिख लेते है, उनके अभिभावक अनुमति के बिना.

ब्लॉक शिक्षा अधिकारी बादाम सिंह ने भी पुष्टि करते हुए कहा कि हमें भी इस गांव से शिकायत मिली थी. इसलिए हमने अध्यापक का तबादला 20 दिन पहले ही नजदीक के स्कूल में कर दिया और कंचन सिंह नाम के अन्य अध्यापिका की नियुक्ति कर दी.

गांव वाले आश्चर्यचकित है कि अध्यापक का तबादला होने से स्कूल के हालात बदलेंगे और पिछले दस सालों से हमारे बच्चों ने जो झेला अब आगे कोई बच्चा नहीं झेलेगा. एक ग्रामीण दीप सिंह ने कहा कि दलित समुदाय से संबंध रखने वाली अध्यपिका सिर्फ हफ्ते में दो बार स्कूल आती है. वो भी तोमर कदमताल पर चल रही है.

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