महिला दिवस विशेषः महिला सशक्तिकरण के नायक थे मान्यवर कांशीराम

हर साल मार्च महीने की 8 तारीख को महिला सशक्तिकरण की चर्चा हर साल होने वाली एक कवायद भर बनकर रह गई है. तमाम संगठनों द्वारा की जाने वाली यह सारी कवायद ‘महिला सशक्तिकरण’ का ढोल पीटती नजर आती है. लेकिन जब वास्तव में ही इनके सामने किसी महिला के विकास का मामला आता है तो स्वभाविक है ये फिर ‘सशक्तिकरण’ जैसी चीजों को भूल जाते हैं. महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि जब तक बीमारी के कारणों का ज्ञान ना हो तो फिर सही इलाज भी नहीं होता. ठीक इसी प्रकार से भारतीय महिलाओं की समस्याओं के इतिहास व उसके विभिन्न स्तरों को जाने बिना ही कुछ महिला संगठन, चिंतक, कार्यकर्ता, एन०जी०ओ० और तमाम नेता ‘महिला सशक्तिकरण’ की मिसाल बन जाते हैं.

वो कुछ सुविधाएं दिलवाकर, किसी ऊंची जाति के घर से किसी महिला का उदाहरण देकर यह मान लेते हैं कि महिलाओं का सशक्तिकरण हो रहा है. इतिहास के सल्तनत काल में एक महिला (रजिया बेगम) दिल्ली की सुल्तान बनी तो क्या हम मान सकते हैं कि उस समय ही महिलाओं का सशक्तिकरण हुआ?. ठीक उसी तरह इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने को ही उपरोक्त लोग ‘महिला सशक्तिकरण’ का बड़ा उदाहरण मानते है, लेकिन ये भूल जाते है कि रजिया बेगम जहां एक सुल्तान की बेटी थी तो वहीं इंदिरा गांधी भी देश के प्रधानमंत्री की बेटी. ऐसे में ये दोनों महिलाएं पद पर आने के पहले से ही सशक्त थीं.

महिला सशक्तिकरण के इन दोनों ऐतिहासिक उदाहरणों के अतिरिक्त एक और उदाहरण भी मिलता है. वह है 3 जून 1995 को देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में मायावती का मुख्यमंत्री बनना. यही वह वास्तविक उदाहरण है जिसे ‘महिला सशक्तिकरण’ के लिए दिया जा सकता है. अन्य महिलाएं भी इससे प्रेरणा ले सकती हैं. क्योंकि कुमारी मायावती अन्य महिलाओं की तरह संपन्न वर्ग से नहीं थी और ना ही किसी सुल्तान या प्रधानमंत्री की औलाद हैं. दूसरा सबसे बड़ा कारण वो दोनों उदाहरण तो केवल इतिहास भर है जबकि सुश्री मायावती का उदाहरण इतिहास और वर्तमान दोनों है. जिस अनुसूचित जाति से पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का सम्बन्ध है, वह ब्राह्मणी धर्मशास्त्रों में हर तरह से गुलाम बनायी गई है. इतनी तरह की गुलामी भरे समुदाय से उठकर एक महिला को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने वाले महान योद्धा ‘बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम जी’ थे. अगर सही मायनों में देखा जाए तो मान्यवर कांशीराम जी महिला सशक्तिकरण के वास्तविक नायक नजर आते हैं इस महिला उत्थान से सम्बन्धित इतने मजबूत उदहारण को मेनस्ट्रीम की मनुवादी मीडिया और सब लोग बायकाट करते है; और साथ में दलित/बहुजन चिन्तक भी.

इस संदर्भ में एक तथ्य यह भी है कि एक महिला (सुश्री मायावती) को यू० पी० के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाना कांशीराम जी की मजबूरी नहीं थी और ना ही उनपर किसी प्रकार का दबाव था. उनके पास पुरुष नेताओं की भी बड़ी संख्या थी जो मायावती से भी वरिष्ठ थे. लेकिन मान्यवर कांशीराम ने उन सब नेताओं में एक महिला नेता को यू० पी० की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया. हालांकि भारतीय इतिहास इस प्रकार के अद्भुत उदाहरणों से सुना पडा है; लेकिन फिर भी इस उदाहरण को मुख्यधारा के विद्वान, साहित्यकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता, महिलाओं के संगठन तथा बहुजन समाज के बुद्धिजीवी चिंतक व कुछ कार्यकर्ता भी नहीं देख रहे हैं. इस महिला सशक्तिकरण के सबसे बड़े ऐतिहासिक उदाहरण को कोई नहीं बताता है.

अगर देश के बहुजनों की महिलाओं के सशक्तिकरण का इतिहास लिखा जाएगा तो इसकी शुरुआत बाबा साहेब अम्बेडकर से शुरू होगी और कांशीराम जी से गुजरती हुई ही आगे जाएगी. साधारण परिवार की एक दलित महिला को देश के सबसे बड़े सूबे का मुख्यमंत्री बनाने का मान्यवर कांशीराम जी द्वारा किया गया महान ऐतिहासिक कार्य क्या वास्तव में ही महिला सशक्तिकरण का महान कार्य नहीं है?

‘पायोनियर’ अंग्रेजी अखबार के सम्पादक ‘अजय बोस’ जी ने मायावती जी की जीवनी लिखी है. जो वाणी प्रकाशन से प्रकाशित की गई, मेरा उन सभी लोगों से, महिलाओं से आग्रह है जो ‘महिला सशक्तिकरण’ जैसी किसी चीज के बारे में सोचते हैं, उनको यह जीवनी जरुर पढ़नी चाहिए. उसमें मायावती जी के बचपन के कुछ जानकारियाँ दी गई है. जब मायावती जी 9-10 साल की थी और सम्भवतः पाचवीं कक्षा में पढ़ती थी तो उसके चौथे नम्बर के छोटे भाई सुभाष कुमार का जन्म हुआ था और जब वह मात्र दो ही दिन का था तो उसे सख्त निमोनिया हो गया था. पिता जी भी ड्यूटी करने के लिये दूर गए हुए थे और माँ इस हालत में नहीं थी कि उठ सके. भाई बीमारी से तड़प रहा था और डिस्पेंसरी लगभग 7 किलोमीटर दूर थी. मासूम बच्ची मायावती ने अपने दो दिन के भाई को गोद में उठाया, डिस्पेंसरी का कार्ड लिया, साथ में पानी की बोतल ली और पैदल ही निकल पड़ी. जब भाई रोता-चिल्लाता तो चलते-चलते ही उसे बोतल से पानी पिला देती. उम्र कम होने के कारण बहुत थक जाती तो भाई को कभी बाई तरफ कंधे से लगाती तो कभी दायीं तरफ. दो घंटे पैदल चलकर डिस्पेंसरी पहुंच गई और कार्ड दिखाकर भाई को इंजेक्शन और दवाई दिलवाई जिससे उसकी हालत में सुधार आया. फिर वापिस पैदल चलकर उसी तरह भाई को गोद में उठाकर रात के लगभग साढ़े नौ बजे अकेली घर पहुंची. जब माताजी ने मुझे और भाई को देखा तो उसकी जान में जान आयी.

एक अन्य उदाहरण भी दिल्ली का है. दिल्ली की इंद्रपुरी इलाके में हमारे  पड़ोस में घनश्याम सिंह बिरला नामक व्यक्ति की पत्नी को शादी के कई वर्षों बाद भी संतान नहीं हुई थी, लेकिन बाद में उनकी पत्नी गर्भवती हुई तो जिस दिन बच्चा पैदा होने वाला था तो इत्तेफाक से उस दिन उनके घर पर कोई नहीं था. और आस- पड़ोस की महिलाएं उनकी सहायता करना तो दूर उनके पास जाने से भी कतरा रही थी. यह सब सुनकर जब मैं उनकी सहायता करने के लिए जाने लगी तो मेरी माँ ने मुझे कहा की ‘तुम्हारी तो अभी शादी भी नहीं हुई है और उस औरत की बीमारी तुझे लग जाएगी और अन्य महिलाओं ने भी मुझे रोका. लेकिन जब मैं अपनी माँ व अन्य पड़ोसियों की परवाह ना करते हुए और उस औरत को ऑटो में बिठाकर करोलबाग दिल्ली में स्थापित कपूर हॉस्पिटल ले गई, जहां उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया उसके बाद घनश्याम सिंह बिरला जी भी आए तो नर्स जब बच्चे को बिरला जी की गोद में देने लगी तो उन्होंने कहा की “मुझसे पहले इस बच्चे को ‘मायावती’ की गोद में दे दो क्योंकि अगर ये ना होती तो आज ना तो मेरी पत्नी होती और ना ही मेरा बच्चा जिन्दा होता.”

उपरोक्त दो उदाहरण तो मजह एक झलक हैं. उनकी पुरे जीवन की एक-एक घटना का वर्णन बहुत ही हैरानी भरा है. आज शिखर पर पहुंची हुई तमाम महिलाओं के जीवन को देखने से मालूम पड़ता है कि वे सब मायावती जी के संघर्ष के सामने बहुत बौनी हैं. उन्हें तो उनकी धन-दौलत व मनुवादी समाज व्यवस्था तथा उनकी सांस्कृतिक पूंजी के लाभ मिले हैं तो ही वो आगे बढ़ी हैं, जबकि मायावती जी तो मनुवादी समाज व्यवस्था में बिना धन-दौलत और बिना सांस्कृतिक पूंजी के ही इन मुख्यधारा की सभी महिलाओं और पुरुषों का अकेले ही सामना कर रही हैं. इसमें हैरत नहीं कि सुश्री मायवती को दुखों और संघर्ष ने पत्थर-समान मजबूत बना दिया है और इसे मजबूती देने वाले महान योद्धा मान्यवर कांशीराम जी थे. उन्होंने मायावती जी की क्षमता को सही रूप से पहचाना और उन्हें अवसर दिया. अवसर मिलने पर मायावती जी ने भी अपने गुरु को दिखा दिया कि अगर हमारी महिलाओं को सही अवसर दिया जाए तो वो भी अपना दम-खम हर क्षेत्र में दिखा सकती हैं.

– लेखक भावनगर युनिवर्सिटी भावनगर, गुजरात में शोधार्थी हैं।

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