‘विसडम ऑफ आदिवासी’ पर जर्मनी में व्याख्यान देंगी जसिंता केरकेट्टा

Adivasi Poet

नई दिल्ली। झारखंड की आदिवासी कवयित्री जसिंता केरकेट्टा जर्मनी की हैमबर्ग यूनिवर्सिटी में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में हिस्सा लेंगी. इसका विषय ‘विसडम ऑफ आदिवासी’ है. वे अपनी कविताओं के पाठ के साथ आदिवासी संघर्षों और वर्तमान परिस्थितियों पर अपनी बात रखेंगी. जसिंता की कविताओं का संग्रह जर्मन भाषा में पिछले वर्ष प्रकाशित हो चुका है. जर्मनी में उनकी कविताएं चर्चित रही हैं. जर्मन भाषा में उनका दूसरा कविता संग्रह भी शीघ्र प्रकाशित होगा. वे बीते गुरुवार को जर्मनी के लिए रवाना हुईं.

जसिंता केरकेट्टा कविता रचना के साथ-साथ पत्रकारिता भी करती है और उरांव आदिवासी समुदाय से आती है. पश्चिमी सिंहभूम के मनोहरपुर प्रखंड में खुदपोश गांव की रहने वाली हैं. स्कूली दिनों से ही वह कविताएं लिख रही है. पत्रकारिता में आने के बाद उनके कविता सृजन में ठहराव आ गया था जिसे एक बार फिर उन्होंने गति दी है.

जसिंता की कविताओं में झारखंड और यहां के आदिवासी लोग हैं. उनकी कविताओं में आदिवासी समाज की लूट और दोहन है तो गैर आदिवासी समाज के पाखंड और षड्यंत्र पर चोट भी. हम यहां उनकी एक कविता साझा कर रहे हैं जिसमें उसने निर्दोष आदिवासियों को माओवादी कहकर दमन करने की तीखी आलोचना की है.

        दर्द
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मैं आंगन में बैठा था
कि आकर पुलिस
उठा ले गई मुझे
मैंने लाख कहा
कि मैं वो नहीं
जो आप समझते हो
उन्होंने मेरी एक न सुनी
और
बना दिया मुझे माओवादी,
मैं याद करता हूं
अपनी जवानी के दिन
कैसे मैंने भूखे दिन गुजारे
रात काटी कच्ची भूमि पर लेटकर
हथकरघा से कपड़े बनाते हुए
देखा था उन पुलिसवालों ने भी
मुझे मेरे गांव में
जिनके ऑर्डर पर
मैं गमछे बनाता था
पर फिर याद आता है
वो टेबो थाना
कैसे सफेद कागज पर
पिटते हुए
लिया गया मेरा हस्ताक्षर
और कोर्ट में
बना दिया गया
आम ग्रामीण से एक नक्सल
अपनी जीवनभर की
सच्चाई और सरलता
के बाद
आज मैं देखता हूं
अपने सीने में डंडे के दाग
और
आंखों में आक्रोश की आग
सोचता हूं बार-बार
कैसे मेरे माथे पर बांध कर
माओवाद का सेहरा
वो लूट ले जाएंगे
मेरी ही नजरों में मेरा सम्मान
ताकि मैं छोड़ कर चला जाउ
जंगल में
दूर तक पसरी
अपनी जमीन, अपने खेत-खलिहान
ताकि वो बड़ी आसानी से
लूट सके मेरा अस्तित्व
मेरी विरासत और
मेरे पूर्वजों की धरोहर..

दुनियाभरके विद्वान शामिल
सम्मेलन में भारत के अलग अलग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता भी हिस्सा लेंगे. इनमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से आनंद वर्धन शर्मा, महात्मा गांधी इंटरनेशनल हिंदी यूनिवर्सिटी, वर्धा से गिरीश्वर मिश्रा और उषा शर्मा, सेंटर फॉर ओरल एंड ट्राइबल लिट्रेचर, एकेडमी ऑफ लेटर्स, दिल्ली की निदेशक अनीता अब्बी, बस्तर से राजाराम त्रिपाठी अलग-अलग विषयों पर अपनी बात रखेंगे. यहां आदिवासी इलाकों में हो रहे खनन, आदिवासी भाषा, संस्कृति, आधुनिक हिंदी साहित्य और आदिवासी जीवन संस्कृति, उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति, आदि विषयों पर बात रखी जाएगी.

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