भारतीय धर्मगुरूओं का खतरनाक मिशन!

भारत में सामाजिक राजनीतिक बदलाव को रोकने के लिये सबसे कारगर हथियार की तरह जिस उपकरण को सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया है वो है भारत का धर्म और अध्यात्म. भारत का धर्म और इसका पलायनवादी अध्यात्म भारत की सबसे बड़ी कमजोरी रहा है लेकिन दुर्भाग्य ये कि इसे ही भारत की केंद्रीय संपदा के रूप में प्रचारित किया जाता है. ये हजारों साल से चला आ रहा षड्यंत्र है और जब तक भारत अकेला था, तब तक ये षड्यंत्र सफल भी होता रहा. लेकिन जैसे ही व्यापार, राजनीति और सामरिक समीकरणों में अन्य सभ्यताओं और मुल्कों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई वैसे ही इस षड्यंत्र की पोल खुल गयी और भारत हर सदी में किसी न किसी का गुलाम होता गया.

पौराणिक कहानियों में हम जिस भारत या समाज को पाते हैं वो कभी जमीन पर रहा ही नहीं. असल में भारत का पुराण और मिथकशास्त्र भारतीय आध्यात्मिक षड्यंत्र का स्वाभाविक परिणाम हैं, जिसने इतिहास बोध, न्याय बोध और सभ्यता बोध को पनपने ही नहीं दिया. अध्यात्म पढ़े लिखे वर्ग को बांझ बनाता है और मिथक या पुराण गरीब अनपढ़ वर्ग की गर्दन कसता है, और इस खेल का नियंत्रण ब्राह्मणवाद के हाथ में उनके शास्त्रों के और व्याख्याओं के जरिये होता है. ये तरीका हर दौर में आजमाया गया है और कामयाब रहा है. क्षत्रियों को परशुराम के द्वारा से और वैश्यों को सत्यनारायण के द्वारा काबू किया गया और शूद्रों को पुनर्जन्म से कसा गया. ऐसे हर दौर में भारत के भीतर ही भीतर चार वर्णों की व्यवस्था में एक वर्ण का आधिपत्य बनाये रखने में ये सबसे सफल रणनीति रही है.

जब क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों और जनजातीय समाजों को काबू में रखना था तब तक ये आध्यात्मिक पौराणिक षड्यंत्र बहुत सफल रहा. जब तक “काबू किये जाने योग्य” जनसंख्या भारतीय ढंग के आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म में भरोसा करती रही और इन चीजों से डरती रही तब तक ये व्यवस्था बेहतरीन ढंग से चलती रही. यहां तक सफल रही कि धर्म की रक्षा को ही जीवन और विकास की गारंटी मान लिया गया. वर्ण और आश्रम का पालन ही धर्म बन गया। और धर्मो रक्षति रक्षते जैसी उक्तियां और अहम ब्राह्मणवाद जैसे निहायती षड्यंत्रपूर्ण और तर्कविरोधी वक्तव्य इसी दौर में उभरे और छा गए, इनका प्रकोप अभी भी बना हुआ है.

भारतीय धर्मभीरु जनसंख्या को काबू करने में मिली यह सफलता ज्यादा देर टिक न सकी. जब यवनों, अफग़ानों, तुर्कों, मुगलों, ब्रिटिशों का प्रवेश हुआ तो उन्हें भारतीय ढंग के धार्मिक भयों की कोई चिंता नहीं थी वे एक तुलनात्मक रूप से सभ्य और संगठित समाज से आये थे और इसी कारण उन्होंने भारत को तुरंत गुलाम बना लिया और भारत के धर्मभीरु और उनके वेदांती आका समझ ही न सके कि ये क्या हो गया? वेदांती आका तो फिर भी इस गुलामी में अपनी सत्ता बहुत ढंग से बचाकर रख सके लेकिन क्षत्रियों, राजपूतों, वैश्यों, शूद्रों को बहुत अपमान और पीड़ा से गुजरना पड़ा. इस एक हजार साल से लंबी गुलामी में वेदांती पुरोहित वर्ग ने गुलाम बनाने वाली कौमों से भी समझौते कर लिए और गुलाम हुई भारतीय धर्मभीरु जनता पर धार्मिक अंधविश्वासों, मिथकों, पुराणों और जाति व्यवस्था का शिकंजा और अधिक कस दिया ये आजकल और तेज हो गया है.

मुसलमानों की हुकूमत में ब्राह्मणी आधिपत्य को बहुत व्यवस्थित चुनौती नहीं मिली लेकिन ब्रिटिश आधिपत्य में ब्रिटशों ने शिक्षा, भाषा, धर्म आदि में सीधा हस्तक्षेप शुरू कर दिया इससे ब्राह्मणवाद तिलमिला उठा और यूरोपीय पुनर्जागरण के ही तत्वों से प्रभावित होकर छुटपुट सुधार और बदलाव भी करने लगा. तब तक चूंकि आधुनिकता, विज्ञानवाद और औद्योगीकरण की हवा बन चुकी थी जिसका अंग्रेजी शिक्षा द्वारा लाभ उठाकर भारतीय मध्यमवर्ग समाज बदलाव के लिए तैयार होने लगा.

लेकिन आजादी के काफी पहले विश्वयुद्धों और आर्थिकमन्दियों के परिणाम में ये तय हो चुका था कि ब्रिटिश सत्ता ज्यादा देर भारत को गुलाम नहीं रख सकेगी तब भारतीय वेदान्तियों ने अपनी सनातन कला को फिर से चमकाना शुरू किया. जिन शास्त्रों कर्मकांडों रहस्यवादी शिक्षाओं ने इस मुल्क को गरीब गुलाम और बुजदिल बनाया था उन्ही शास्त्रों, धर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को फिर से प्रचारित करने का काम शुरू हो गया. यूरोपीय सभ्यता में रचे बसे थियोसोफिकल सोसाइटी, अरबिंदो घोष, विवेकानन्द, राममोहन रॉय, केशब चन्द्र, देबेन्द्रनाथ और अन्य अनेक लोगों ने ईसाई धर्म की नकल में एक नया धर्म बुना जो सामाजिक सुधार और ईसाई मिशनरी सेवा से प्रेरित था. यह नियो वेदांत या नियो हिंदूइस्म है जिसे हम आज देख रहे हैं. विवेकानन्द ने तो आयरलैंड की एक प्रशिक्षित कैथोलिक नन को बाकायदा ऐसा धर्म और मिशनरी काम सिखाने के लिए भारत बुलाया था. उन्हें भगिनी निवेदिता कहा जाता है.

आजादी के बाद, देश के विभाजन के बाद वेदांती हिंदूवादी सत्ता को अपनी सुरक्षा की चिंता बराबर बनी रही. इसी दौर में धीरे धीरे ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण उभरा और बाद में शिखर पर पहुंचा. 50, 60, से लेकर 90 के दशक तक भारतीय पोंगा पंडितों ने इस नियों हिंदुइज्म को पश्चिमी मापदण्डों के अनुरूप और विज्ञान के अनुरूप ढालने का व्यवस्थित ढंग से काम किया लेकिन इस जाति व्यवस्था ने उनकी फांसी लगा दी. वे जितना ही महान बनने की कोशिश करते उतना ही भारत की गरीबी गंदगी और सामाजिक छुआछूत के सवाल उनसे टकराने लगते. ऐसे में हिन्दू धर्म को ईसाई मिशनरी समाजसेवा प्रधान धर्म की फोटोकॉपी में बदल देने का जो प्रोजेक्ट हाथ में लिया वह असफल होने लगा.

हालांकि तब तक स्वतंत्र भारत में वर्ण व्यवस्था के शिखर पर बैठे लोगों ने फिर से सत्ता कायम कर ली और वे देख सके कि ईसाई धर्म की सभ्यता और समाज सेवा भारत में फैल गयी तो उनकी सत्ता को शुद्र, आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों की टक्कर मिलने लगेगी. अंबेडकर, फुले, पेरियार ने तब तक यह हकीकत में करके दिखा भी दिया था.

ऐसे में बड़ा संकट पैदा हुआ, नेहरू के सुधारों ने जिस समता और सबलीकरण की इबारत लिखी वह कुछ हद तक ही लेकिन सही दिशा में सफल रही और पिछड़ी जातियों और स्त्रियों में विराट शक्ति पैदा हुई. इन “पापयोनियों” की शक्ति बढ़ते देख पोंगा पंडितों को बड़ी चिंता हुई. अब ऐसे धर्म की जरूरत थी जो आभासी जगत में शुद्ध बुद्ध होने और सबके समान होने की बात करे और सामाजिक बदलाव को भी एकदम असंभव कर दे. मतलब आश्रम की दीवार के अंदर भाईचारा, प्रेम, सहभोज और फ्री सेक्स तक दे सके लेकिन आश्रम की दीवार के ठीक बाहर जाति और लिंग का विभाजन तुरन्त शुरू हो जाए.

अब यह काम कैसे हो और कौन करे?

यह काम अरबिंदो, विवेकानन्द, ओशो, आसाराम बापू जैसे लोगों ने किया. अध्यात्म और परलोक का ऐसा जाल बुना गया जिसमें कहा गया कि समाज कैसा भी सड़ता रहे तुम ज्ञान ध्यान और मोक्ष में लगे रहो. अद्वैत का प्रचार हुआ कि कण कण में ब्रह्म है, “तत्वमसि” तुम वही ब्रह्म हो, सब पंचतत्व के पुतले हैं कोई भेद नहीं. साथ ही जाति, वर्ण और लिंग के भेद और दान इत्यादी भी चलता रहा.

बाद में शहरी जीवन में जाति और लिंग के भेदभाव ने शहरी मध्यम वर्ग को और अधिक डरा दिया. पहले ही भारतीयों में आपस में सहयोग, संबंध और प्रेम नहीं था ऊपर से शहरी जीवन की असुरक्षाओं ने मध्यम वर्ग को और डरा दिया. युवा वर्ग यूरोपीय सभ्यता, मुक्त मित्रता और मुक्त प्रेम के वातावरण से मोहित हो ही चुका था और भारतीय बाबाओं ने इसी सम्मोहन और प्यास को आटा बनाकर धर्म के कांटे पर लगाकर तीन पीढ़ियों का शिकार किया. जो मैत्री, प्रेम, सहकार, सहभोज, सुरक्षा और अपनापन समाज में युवाओं को नहीं मिलता वह आश्रमों में परोसा जाने लगा. कामकाजी वर्ग भी इस “आसान और आभासी” इंसानियत से प्रभावित होने लगा और इन बाबाओं योगियों ने बड़ी कुशलता से आध्यात्मिक पलायनवाद में शहरी कामकाजी युवावर्ग को फंसा लिया, इसी युवावर्ग में सामाजिक बदलाव की ललक उठती है, उसे नियों वेदान्तिक अध्यात्म में फंसाकर बांझ बना दिया.

अब मजा ये कि उस धर्म और अध्यात्म के ठीक समानांतर धर्म और कॉरपोरेट का नया समीकरण बन गया जिसने राजनीति को अपने ढंग से चलाना शुरू किया. अद्वैत और छुआछूत की समानांतर पटरियों पर ब्राह्मणवाद की ट्रेन फिर चलने लगे और राजनीति और कॉरपोरेट का ईंधन उन्हें तेजी से धार्मिक राष्ट्रवाद की तरफ खींचने लगा. भारतीय बाबा कारपोरेट और राजनेता अपने काम में सफल रहे. इस काम में उन्हें सबसे बड़ी चुनौती कबीर, गोरख और बुद्ध से मिली. लेकिन उसका इलाज भी ढूंढ लिया गया. बुद्ध को विष्णु, कबीर को वैष्णव और गोरख को शिवअवतार बनाकर खत्म कर दिया और उनकी शिक्षाओं को वेदान्तिक शिक्षा की तरह पुनर्जन्म और सनातन आत्मा में लपेटकर पेश कर दिया गया. अब कोई समस्या नहीं रही.

अब इसके बाद का भारत आपके सामने है. अभी जितने बाबा योगी और गुरु हैं उन्हें और उनकी शिक्षाओं को कॉर्पोरेट और राजनीति के साथ मिलाकर इस नजर से देखिये, तब आप समझ सकेंगे कि भारतीय धर्मगुरु कितने खतरनाक मिशन में किस योजना से लगे हुए हैं. और इन गुरुओं में सबसे प्रभावशाली गुरु रहे हैं ओशो उन्होंने इस पतन में चार चांद लगा दिया. आज के पोंगा पंडितों की पूरी फौज के भीष्म पितामह वे ही हैं. आज (11 दिसंबर) ओशो रजनीश का जन्मदिन है. आज उन पर गहराई से विचार करें और सोचें कि इन बाबाओं, नेताओं और उद्योगपतियों के षड्यंत्रों से भारत की जनता को कैसे बाहर निकाला जाए.

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