भारतीय मीडिया में दलित पत्रकार क्यों नहीं हैं?

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पिछली गर्मियों में एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (एसीजे) में डायवर्सिटी प्रोजेक्ट (विविधता परियोजना) को गोपनीय रखने की सारी कोशिशें की गईं. लेकिन कक्षाएं शुरू होने के कुछ दिनों के बाद ही यह बात किसी तरह से सार्वजनिक हो गई कि चेन्नई के इस प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थान में, जहां पढ़ना और रहना ठीक-ठाक खर्चीला है, कुछ विद्यार्थियों को पढ़ाई करने के लिए जाति आधारित स्कॉलरशिप दी गई है.

2016-17 बैच के मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से वास्ता रखने वाले ऊंची जातियों के कई छात्र इससे नाराज हो गए. उन्होंने इसे ‘उलटा जातिवाद’ करार देते हुए इसके खिलाफ कानाफूसी अभियान शुरू कर दिया. ये बात जैसे-जैसे कैंपस के बाहर तक फैली, ऊंची जातियों के मध्यवर्गीय एल्युमनाई (पूर्व छात्र) भी इस सामूहिक कानाफूसी में शरीक हो गए. उन्होंने संस्थान के संस्थापकों पर ‘नकली कम्युनिस्ट’ होने, ‘संस्थान पर मार्क्सवाद थोपने के अभियान में शामिल होने, जातिवादी व्यवहार करने और विद्यार्थियों की जेब काटने’ का आरोप लगाया.

इनमें से जो थोड़े प्रगतिशील किस्म के थे, उनका यह कहना था कि जाति आधारित स्कॉलरशिप से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन उनकी इच्छा है कि संस्थान को आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों, दूसरे शब्दों में ऊंची जातियों के गरीब विद्यार्थियों की भी मदद करनी चाहिए.

बात चाहे एसीजे की हो या अंग्रेजी माध्यम के अन्य प्रतिष्ठित निजी पत्रकारिता संस्थानों की, तथ्य यह है कि इनकी कक्षाओं में तथाकथित ऊंची जाति के छात्रों का भारी बहुमत होता है, जिसका परिणाम यह होता है कि पूर्व छात्रों के प्रभावशाली नेटवर्क में भी इन्हीं जातियों का दबदबा होता है.

गरीब/अमीर, ग्रामीण/शहरी, भाषाई रूप से अलग-अलग, हिंदू, मुस्ल्मि, ईसाई और गेहुएं रंग का हर व्यक्ति; उपमहाद्वीप के वैसे तमाम लोग, जो यहां आम तौर पर पाई जाने वाली एक किस्म की दृष्टिहीनता के शिकार हैं, उन्हें यह विविधता आश्चर्यजनक लगती है. लेकिन, आंखें, खोल कर देखें तो ये सब दुखद रूप से एक ही हैं.

भारत के किसी भी दूसरे प्रतिष्ठित संस्थान की ही तरह, फिर चाहे वह अकादमिक हो, विधायी हो, न्यायिक हो या नौकरशाही से संबंधित हो या पत्रकारिता से जुड़ा हो, एसीजे ‘अन्य’ सामाजिक समूहों से आने वाले तमाम लोगों के लिए एक पराई जगह साबित हो सकता है.

पिछले साल जून महीने में दाखिला लेने वाले 190 छात्रों में वहां का मैनेजमेंट सिर्फ 6 दलितों और एक आदिवासी की पहचान कर सका. बाकी सारे सवर्ण यानी तथाकथित ‘छूई जा सकने वाली’ जातियों से ताल्लुक रखते थे, चाहे उनका धर्म, भाषा, खानपान (चाहे वे बीफ खाने वाले हों या न हों) कुछ भी क्यों न हों. हर साल की तरह इनमें सबसे बड़ा समूह बंगाली सवर्णों का था, उसके बाद हिन्दीभाषी सवर्ण थे, उसके बाद मलयाली सवर्णों का नंबर था. और हर साल की तरह इन छूए जा सकने वालों में ब्राह्मणों का बहुमत था.

इस पेशे में ब्राह्मणों के वर्चस्व का इतिहास देश में अंग्रेजी पत्रकारिता के इतिहास जितना ही पुराना है. लेकिन, जो चीज वास्तव में परेशान करने वाली है; वह यह कि 200 सालों के बाद भी पत्रकारिता की आधुनिक कक्षा भारत के एक आम अंग्रेजी न्यूजरूम की हूबहू मूरत नजर आती हैं.

ऐसी जगहों पर दलितों और आदिवासियों को लेकर आना खतरनाक है, जहां वे संख्या में बेहद कम हैं, जहां उन्हें मु्फ्तखोर करार देकर उनके साथ कटु व्यवहार होता है, और जहां वे अपनी असली पहचान को छिपा कर ही सिर ऊंचा करके चल सकते हैं. दलित और आदिवासी एक्टिविस्टों और छात्र नेताओं ने छात्रों को एसीजे की स्कॉलरशिप के लिए आवेदन करने से हतोत्साहित किया है और उन्हें अकादमिक जगत या सिविल सेवा में कॅरियर बनाने की ओर मोड़ने की कोशिश की है. हालांकि, ये क्षेत्र भी जातिवाद से मुक्त नहीं हैं, लेकिन कम से कम वहां इस बात का भरोसा तो है कि किसी को बस इस कारण निकाल बाहर नहीं किया जाएगा, क्योंकि किसी को उनकी नस्ल पसंद नहीं है.

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पिछले दस वर्षों से एसीजे अनुसूचित जातियों और जनजातियों (एससी/एसटी) के लिए 4 पूरी तरह से वित्त पोषित सीटों की व्यवस्था कर रहा है. लेकिन, इन सीटों पर विरले ही किसी ने कभी दावेदारी की है. या तो पर्याप्त संख्या में आवेदन नहीं आए या इससे भी दुखद यह है कि जिन्होंने आवेदन किया, वे भी विशेषाधिकार हासिल वर्गों के उम्मीदवारों से पिछड़ गए.

फिर एक दिन छह दलितों और एक आदिवासी विद्यार्थी ने संस्थान के दरवाजे पर दस्तक दी. ये पिछली गर्मियों की बात है. इनमें से तीन लड़कियां और दो लड़के अति वंचित माडिगा जाति से ताल्लुक रखते थे. उनमें से सिर्फ एक संपन्न परिवार से था और संस्थान की फीस चुकाने में समर्थ था. बाकी में से तीन दिहाड़ी मजदूरों के बच्चे थे. एक लड़की के पिता किसान थे और मां स्कूल की टीचर थीं. दो इकलौती कमाई वाले परिवारों से थीं, जिनके पिता कम आय वाली नौकरियों में थे.

इनमें से सभी ने न सिर्फ उन प्रतियोगियों से मुकाबला किया, जिनके पीछे पीढ़ियों से विशेषाधिकार का बल था, बल्कि उन्हें पछाड़ा भी.

एसीजे और साउथ एशियन फाउंडेशन (एसएएफ) ने इन छह छात्रों की ट्यूशन फीस और आवास के लिए करीब 2,000,000 रुपए (30,800 अमेरिकी डॉलर) की मदद की. जब यह रकम कम पड़ गई, तो अंग्रेजी मीडिया में काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकारों के एक चुने हुए समूह से, जिन पर सकारात्मक कार्रवाई का समर्थन करने के मामले में विश्वास किया जा सकता था, आर्थिक मदद की गुहार लगाई गई. इन लोगों ने मिलकर कम पड़ रही रकम के संकट को हफ्ते भर में खत्म कर दिया. बल्कि उनकी मदद के बाद इतना पैसा और बच गया कि विद्यार्थियों को चेन्नई की ब्रिटिश काउंसिल में अंग्रेजी की अतिरिक्त कोचिंग के लिए भी स्पांसर किया जा सकता था.

लेकिन डोनेशन के आने का सिलसिला थमा नहीं और अंत में इतना पैसा जमा हो गया कि कोर्स के अंत में सभी छह छात्रों के पास एक लैपटॉप, कैमरा और वॉयस रिकॉर्डर भी था.

वरिष्ठ पत्रकारों का समूह अब इसे एक वार्षिक कार्यक्रम का रूप देने और इसके भीतर पत्रकारिता के दूसरे संस्थानों को भी शामिल करने की योजना बना रहा है. उनकी योजना भारतीय संपादकों से विविधता के पक्ष में प्रतिज्ञा कराने के लिए एक राउंड टेबल मीटिंग का आयोजन करने की भी है.

लेकिन इस कहानी के भीतर कहानी यह है कि जब ये छह छात्र संस्थान से पढ़ाई पूरी कर रहे थे, तब अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रों में से सभी ने मुझसे यह बात कही कि कोई इनके पास यह दरयाफ्त करने आया था कि क्या उन्हें ‘उन’ छात्रों के बारे में कुछ पता है? उनमें से एक दलित छात्र ने कहा, ‘मेरे अपने रूममेट्स ने मुझसे यह कहना शुरू किया कि वे इस बात का पता लगाना चाहते हैं कि आखिर स्कॉलरशिप किन्हें मिली है? वे यह पता करना चाहते थे कि क्या जिन्हें स्कॉलरशिप मिली हैं, वे वास्तव में इसके योग्य थे.’ वह यह कहते हुए मुस्करा उठा, ‘उसकी परेशानी बस ये थी कि वह विद्यार्थियों के चेहरों को देख कर दलित और आदिवासी नहीं छांट पा रहा था.’

यह वास्तव में ईश्वर की बड़ी रहमदिली है कि कुछ ब्राह्मण आबनूस की तरह (काले) रंग के होते हैं और कुछ दलित आड़ू की तरह (लाल) होते हैं. पिछले दस सालों में जिसे भी यह स्कॉलरशिप मिली उसे योग्य होने के बावजूद लुका-छिपी का यह दुखद खेल खेलने पर मजबूर होना पड़ा. हर साल की तरह इस साल भी मैनेजमेंट को हस्तक्षेप करना बड़ा और इससे पहले कि वे छह छात्रों की पहचान कर पाते, जाति पहरेदारों को अनुशासित करना पड़ा.

अंग्रेजी पत्रकारिता में आपको खुलेआम खुद को होमोसेक्सुल कबूल करने वाले लोग ज्यादा मिल जाएंगे, बनिस्बत ऐसे लोगों के जो खुल कर अपना दलित होना कुबूल करते हों. भारतीय पत्रकारिता इस कदर दिमाग को चकरा देने वाले स्तर तक उच्च जातीय है कि पत्रकार याशिका दत्त द्वारा बस अपने दलित होने की स्वीकृति को जाति-विविधता हासिल करने की दिशा में एक मील के पत्थर के तौर पर देखा गया.

ऐसा नहीं है कि एक न्यूजरूम किसी गांव की तरह है, जहां हर कोई यह जानता है कि कौन किसका बेटा या बेटी है, कौन कहां रहता है. दलितों के लिए न्यूजरूम के रॉक स्टारों के घमंडीपने को नजरंदाज करना और न्यूज रूम की भीड़ में घुल-मिल जाना काफी आसान है, जहां हर कोई यह कह देने पर कि आप बंगाल से हैं, यह मान लेता है कि आप बंगाली भद्र लोक तबके से ही होंगे.

देश में दस सालों तक खोजने के बाद मैं अंग्रेजी मीडिया में बस आठ दलितों की खोज कर पाया हूं. इनमें से सिर्फ दो अपनी दलित पहचान उजागर करने की हिम्मत जुटा पाए हैं.

करीब छह साल पहले जब इनमें से एक ने काफी झिझक के बाद वाम झुकाव रखने वाले अपने करीबी ब्राह्मण सहकर्मियों के सामने अपनी जाति को उजागर किया, तो उनमें से एक ने कहा, ‘तुम में दलित जैसा क्या है? तुम्हें इस पहचान का दावा करने की क्या जरूरत है?’

वह इतना स्तब्ध रह गया कि उस दिन वह कोई जवाब नहीं दे पाया, लेकिन वह आज भी ऐसे किसी मौके का इंतजार कर रहा है, जिस दिन वह अपनी सहकर्मी से कहेगा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए पूरी तरह से दलित नहीं हूं, क्योंकि मैं अच्छी अंग्रेजी बोलता हूं, फैशनेबल कपड़े पहनता हूं, शहर के सबसे आधुनिक किस्म के लोगों के साथ समय बिताता हूं. क्या मैं तुम्हारी नजरों में तब दलित होता, जब मैं तुम्हारे घर के बाहर कचरा बीन रहा होता, तुम्हारी मरी हुई गाय की खाल उतार रहा होता या मेरे परिवार की औरतें देवदासियां होतीं या दुष्कर्म की शिकार होतीं?’

जिन आठ लोगों की मैंने तलाश की, उनमें से सिर्फ चार ही अब भी पत्रकारिता के पेशे में हैं.

न्यूजरूम का ब्राह्मण चेहरा

दस साल पहले तक अंग्रेजी अखबारों के संपादक अपने रिपोर्टरों से यह कहते थे कि दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों पर अत्याचारों की कहानी को कोई नहीं पढ़ता है. आज वे उन रिपोर्टरों के लिए हवाई जहाज के टिकट कटा रहे हैं और टैक्सियां बुक करा रहे हैं, जो सुदूर गांवों में जाकर ताजातरीन अत्याचारों की रिपोर्टिंग पूरे भावनात्मक ब्यौरों के साथ करने के लिए लालायित हैं.

हाशिए के बहिष्कृत लोगों में इस नई पनपी दिलचस्पी की एक वजह ये है कि पिछले एक दशक में दलित, बहुजन, आदिवासी, मुस्लिम, कश्मीरी और उत्तर-पूर्वी समुदायों के संपादकों द्वारा चलाए जा रहे वैकल्पिक मीडिया ने काफी बड़ी संख्या में ऑननलाइन पाठकों को अपनी ओर आकर्षित किया है. इसने ही तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया को अपना रास्ता बदलने पर मजबूर किया है.

फेसबुक, ट्विटर की बदौलत ऐसी वेबसाइटें, जिन्हें पहले हाशिए का मामूली खिलाड़ी कह कर खारिज कर दिया जाता था, अब समाचार के शिकारियों की दुनिया के केंद्र में हैं और ब्रेकिंग न्यूज का पीछा कर रही हैं. दलित कैमरा, राउंड टेबल इंडिया, वेलिवाडा, आदिवासी रिसर्जेंस, साहिल ऑनलाइन, मिलि गैजेट, कश्मीर रीडर, रैयत और थम्ब प्रिंट इनमें से बस कुछ उदाहरण हैं.

पिछले साल मई में हुए दीक्षांत समारोह से पहले ही एसीजे के 90 फीसदी छात्र विभिन्न न्यूजरूमों में प्लेसमेंट पा चुके थे. इनमें वे भी थे, जिन्हें एससी/एसटी स्कॉलरशिप से दिक्कत थी. आने वाले समय में वे अपने नए संपादकों को शीशे में उतारने की तमाम कोशिशें करेंगे और मुमकिन है उनमें से कुछ ताजातरीन दलित अत्याचार की दिल को छूने वाली स्टोरी भी लिखें.

जहां तक सात, एससी/एसटी विद्यार्थियों का सवाल है, उनमें से एक कोर्स के अंत में पत्रकारिता से आकर्षित नहीं था और उसने प्लेसमेंट न लेकर सिविल सर्विसेज की तैयारी करने का मन बनाया है. चार को देश के शीर्ष न्यूज कॉरपोरेशनों से नौकरी का प्रस्ताव मिला है. बाकी दो ने अभी तक मिले प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया है और वे बेहतर प्रस्ताव का इंतजार कर रहे हैं. इन लोगों ने एक करार किया है कि जब वे पत्रकारिता के पेशे में अपने लिए नाम कमा लेंगे, तब वे अपनी जाति की पहचान को उजागर करेंगे.

यह दुखद है कि ये छह दलित विद्यार्थी एक ऐसे पेशे में वीरता दिखाना चाह रहे हैं, जिसमें आज भी ज्यादातर नौकरियां कनेक्शन वालों को मिलती है.

गरीब ब्राह्मण परिवारों से पत्रकारिता के क्षेत्र में नाम कमाने वालों की कोई कमी नहीं है. ऐसे अनगिनत मौके हैं जब एक सफल ब्राह्मण पत्रकार ने मेरे सामने यह शिकायत की कि अगर एससी/एसटी आरक्षण नहीं होता, तो वे या तो वैज्ञानिक बने होते या भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में शान से अधिकारी की नौकरी बजा रहे होते.

आज भी ब्राह्मण आईएएस के बच्चों को इंटरव्यू में यह कहने पर भी न्यूजरूम की नौकरी मिल जा रही है कि वे एटिडिंग डेस्क पर सिर्फ अपने जनरल नॉलेज को सुधारने के लिए काम करना चाहते/चाहती हैं, क्योंकि वे भी अपने अभिभावकों की तरह नौकरशाह बनना चाहते/चाहती हैं.

दक्षिण के एक खानदानी न्यूज पेपर ने एक ब्राह्मण रिपोर्टर के प्रोबेशन को चार बार आगे बढ़ाया, जबकि आमतौर पर ज्यादातर रिपोर्टरों को दूसरी बार में ही बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. क्या इस बात का कोई लेना-देना इस तथ्य से है कि उसके पिता और दादा भी उसी अखबार में रिपोर्टर थे?

यह कोई इकलौता न्यूज पेपर नहीं है जिसने ब्राह्मण परिवारों की कई पीढ़ियों को, उनमें से भी ज्यादातर पुरुषों को नौकरी दी है. ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहां, किसी ब्राह्मण रिपोर्टर को उसी जिले या शहर में पोस्टिंग दी गई जहां उसके परिवार की पहले की पीढ़ी वाले उसी प्रकाशन के लिए रिपोर्टर हुआ करते थे.

उदाहरण के लिए एक मंदिर नगर में तीसरी पीढ़ी के रिपोर्टर की कहानी मुझे खुद उस रिपोर्टर से ही पता चली. उसे अपने पुरखों की परंपरा का निर्वाह करने का गर्व था. उसने काफी शेखी बघारते हुए कहा कि उसके परिवार की पहुंच दिल्ली तक है. उसने मुझसे कहा, ‘अगर आप स्पेशल दर्शन या पूजा कराना चाहते हैं, तो बस मुझे कॉल कीजिएगा. उसने अखबार के मालिक के बारे में बेहद चैंकाने वाली बात बताई, ‘वे जब भी यहां तीर्थ के लिए आते हैं, तो मेरे घर पर ही ठहरते हैं. वे काफी शुद्ध लोग हैं और बाहर खाना पसंद नहीं करते हैं (क्योंकि आपको नहीं पता बाहर किसके हाथ का छुआ खाना खाना पडे).’

कोई ये बात पक्के तौर पर नहीं कह सकता है कि आखिर रिपोर्टरों के तौर पर इतने ब्राह्मणों की बहाली कैसे होती है?

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ऐसा नहीं है कि दलित या आदिवासी अंग्रेजी पत्रकारिता के किले को तोड़ने में इस कारण अक्षम हैं क्योंकि वे अंग्रेजी नहीं बोल सकते, या फिर वे खराब पत्रकार हैं. भारत में मुख्यधारा का कोई भी समाचार संस्थान आसानी से इस बात की गवाही दे सकता है कि भारत में खराब पत्रकारों की कोई कमी नहीं है. अंग्रेजी अखबारों में रिपोर्टरों द्वारा फाइल की गई कच्ची कॉपियों की अगर जांच की जाए, तो यह तथ्य सामने आएगा कि ज्यादातर रिपोर्टर अंग्रेजी का एक अच्छा सही वाक्य तक नहीं लिख सकते हैं.

अगर आपको यह बात बढा-चढ़ाकर पेश की गई लग रही है, तो उन्हें टीवी न्यूज पर लाइव देखिए या उन्हें सोशल मीडिया पर फॉलो कीजिए, जहां कोई सब-एडिटर उनके लिखे को संपादित और दुरुस्त नहीं करता है.

पहली नजर में यह जानकर झटका लग सकता है कि भारतीय न्यूजरूमों में जहां स्पष्ट आरक्षण विरोधी माहौल पाया जाता है, मेरिट/योग्यता को इस कदर नजरंदाज किया जाता है. लेकिन यह उस आर्थिक व्यवस्था के बिल्कुल अनुरूप है, जिसमें आज भी पूंजी आमतौर पर विरासत में मिलती है और हितों का टकराव एक सामाजिक-आर्थिक मौका है, जिसमें क्लाइंट परिवार बन जाता है और परिवार क्लाइंट बन जाता है.

हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जिसमें जब एक रेड्डी जज, खुलेआम दलितों का कल्तेआम करने वाले रेड्डी लोगों को बरी कर देता है, तो हमें कोई समस्या नहीं होती, लेकिन जब एक दलित जज यह शिकायत करता है कि ऊंची जाति के जज उसके साथ भेदभाव कर रहे हैं, तो यह हंगामाखेज और न्यायालय की अवमानना बन जाता है.

इस देश में आज भी एक मुस्लिम रिपोर्टर को राष्ट्रीय सुरक्षा की बीट की जिम्मेदारी देना असहज करने वाली स्थिति है, लेकिन जब एक ब्राह्मण रिपोर्टर एक मरनासन्न ब्राह्मण कला रूप को प्रोमोट करता है और इसे बचाने में लगे ब्राह्मण कलाकार को ‘अगुआ’ और ‘उस्ताद’ कह कर पुकारता है, तब यह अवार्ड जीतने लायक पत्रकारिता बन जाती है.

श्वेत पुरुष अमेरिकी पत्रकारिता

जून, 2011 में जब मैं बोस्टन (अमेरिका) में एक थिंक टैंक द्वारा आयोजित ‘न्यूजरूम में विविधता’ विषय पर पैनल डिस्कशन में भाग ले रहा था, तब श्रोताओं में से एक श्वेत व्यक्ति ने मुझ पर चिल्लाते हुए कहा, ‘श्वेत, पुरुष अमेरिकी पत्रकारों के कारण ही दुनिया मैल्कम एक्स और रोज़ा पार्क्स के बारे में जानती है. वह श्वेत मुझपर इसलिए गुस्सा था क्योंकि मैंने उस साल, ठीक पिछले हफ्ते हुए रिपोर्टरों और संपादकों के एक सम्मेलन को, जिसमें 1,000 अमेरिकी खोजी पत्रकार जमा हुए थे, श्वेत पुरुषों की कभी न खत्म होने वाली परेड करार दिया था.

उस क्रोधित श्वेत पुरुष को देखकर जिसने बाद में अपना परिचय एक पत्रकार के तौर पर कराया, यह सोचने पर विवश हो जाना पड़ा कि अमेरिकी न्यूजरूमों में किसी अफ्रीकी अमेरिकी पत्रकार का बिना लोगों की नजरों में गड़े दाखिल हो जाना कितना मुश्किल होता होगा.

लेकिन यह अमेरीकियों की बात है, जो न सिर्फ ज्यादा संपन्न हैं बल्कि किसी औसत भारतीय की तुलना में सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से आगे हैं.

यह किसी भी तरह से इसलिए नहीं है कि उन्होंने हमारे यहां अस्पृश्यता समाप्त किए जाने से पहले अपने यहां दासप्रथा समाप्त कर दी या इसलिए कि उन्होंने हमारे यहां किसी दलित या आदिवासी या मुस्लिम के प्रधानमंत्री बनने से पहले एक अश्वेत को अपना राष्ट्रपति चुना. नस्लीय अल्पसंख्यकों पर खासकर अश्वेतों पर हमला आज भी वहां के जीवन की एक डरावनी मगर अक्सर घटित होने वाली सच्चाई है. और हां, अब डोनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति हैं.

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लेकिन यह नहीं सोचा जा सकता कि किसी अश्वेत को अमेरिका में सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश करने से रोका जाएगा और वहां के अखबार इस पर चुप्पी साध लेंगे. भारत में तो आज भी चुने हुए प्रतिनिधि और सेलेब्रिटीज तक, अगर वे ऊंची जातियों के नहीं हैं, कुछ खास मंदिरों में दाखिल नहीं हो सकते. अगर आप दलित हैं, तो बेंगलुरू के आसपास के ज्यादातर गांवों में आप न बाल कटवा सकते हैं, न चाय खरीद सकते हैं. लेकिन आप यह सच्चाई नहीं जान पाएंगे, क्योंकि अंग्रेजी अखबारों को लगता है कि यह सब जानने में आपकी कोई दिलचस्पी नहीं है. भारतीय मीडिया की जाति के सामाजिक बहिष्कार या अलगाव के से जुड़े रोज के और बोरियत से भरे किस्सों में कोई दिलचस्पी नहीं है.

कई अन्य चीजों की तरह अमेरिकी पत्रकारिता भी हमारी पत्रकारिता की तुलना में ज्यादा विकसित है. काफी पहले 1978 में, अमेरिकन सोसाइटी ऑफ न्यूजपेपर एडिटर्स (एएसएनई) ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित करते हुए अमेरिकी न्यूजरूमों में अल्पसंख्यकों की ज्यादा भागीदारी की मांग की थी. तब से लेकर अब तक एएसएनई, विविधता अनुपात पर सख्त निगरानी रखता है और शोषित तबकों के इच्छुक पत्रकारों को सहायता और ट्रेनिंग असिस्टेंस मुहैया कराता है.

उनके 2016 के एक सर्वेक्षण ने यह उजागर किया कि सर्वे किए गए 737 संस्थानों में न्यूजरूम संपादकों का 13 फीसदी और कुल संपादकीय टीम का 17 फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यकों का था. तीन दशक से भी पहले जब उन्होंने शुरुआत की थी, तब 4 फीसदी से भी कम अमेरिकी पत्रकार अल्पसंख्यक समुदायों से थे.

भारत में जहां ज्यादातर संपादक यह तक मानने को तैयार नहीं होते कि न्यूजरूम की बनावट में समस्या है, वहां अगर आप न्यूजरूम की विविधता को लेकर किसी सर्वे का हवाला दें, तो वे उखड़ जाते हैं और उलटे जातिवाद का आरोप मढ़ देते हैं या मेरिट के विनाश पर उच्च-जातीय भाषण पिला देते हैं.

अमरिकी पत्रकारिता एक और शानदार परंपरा पर नाज कर सकती है, और वह है ब्लैक प्रेस. यानी अफ्रीकी अमेरीकियों का, उनके द्वारा और उनके लिए समाचार के संस्थान. ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ (अश्वेतों के जीवन का भी महत्व है) आंदोलन के दौरान उनकी ताकत देखने लायक थी.

अश्वेत स्वामित्व और अश्वेत द्वारा प्रकाशित पहले अखबार ‘फ्रीडम्स जर्नल’ का पहला अंक वाशिंगटन डीसी के म्यूजियम की एक प्रमुख दीवार की शोभा बढ़ा रहा है. इसके संपादक, सैम्युएल कॉर्निश और जॉन रस्सवर्म ने 16 मार्च, 1827 को छपे इसके पहले अंक में एक यादगार घोषणा की थी:

‘बहुत हुआ जब दूसरे हमारी तरफ से बोलते रहे हैं. बहुत हुआ जब हमारे अस्तित्व से बेहद नजदीक से जुड़ी चीजों की गलत प्रस्तुति से लोगों को ठगा जाता रहा है…अब हम अपनी लड़ाई खुद लड़ना चाहते हैं.’

काश, मेरे पास ये लाइनें 2011 में होती, तो मैं बोस्टन के उस श्वेत व्यक्ति पर इसे दे मारता, जिसे इस बात में कुछ भी गलत नजर नहीं आया कि दुनिया ने मैल्कम एक्स और रोज़ा पार्क्स को श्वेत पुरुष पत्रकारों की निगाहों से जाना.

एक अछूत की निगाहों से

कोई यह आरोप नहीं लगा रहा है कि सारे श्वेत पत्रकार नस्लवादी होते हैं या सारे ब्राह्मण पत्रकार जातिवादी होते हैं. इस बात में कोई शक नहीं कि भारतीय जाति व्यवस्था के बारे में कुछ सबसे बेहतरीन कमेंटरी, रिपोर्ताज और अकादमिक कार्य ब्राह्मण पत्रकारों और बुद्धिजीवियों द्वारा किए गए हैं. लेकिन वैसे तमाम लोगों के लिए जो भारतीय न्यूजरूमों में प्रणालीबद्ध सामाजिक बहिष्कार का बचाव उन ऊंची जातियों के पत्रकारों को सामने रखकर करते हैं, जिन्होंने जाति पर महत्वपूर्ण काम किया है, मेरे मन में स्वाभाविक रूप से आया एक जवाब है, ‘दुनिया यह जानना चाहती है कि यह दुनिया एक अछूत की निगाह से कैसी दिखाई देती है.’

यह सवाल दलित कैमरा के संस्थापकों के सूत्रवाक्य या पंचलाइन, ‘दलित कैमरा: थ्रू अनटचेबल्स आईज.’ (दलित कैमरा: अछूतों की निगाह से) से प्रभावित है.

एसीजे की विविधता परियोजना को समर्थन देने वालों ने यह उम्मीद नहीं की है कि इससे लाभान्वित होने वाले सभी दलित और आदिवासी जाति, सांप्रदायिकता और गरीबी पर रिपोर्टिंग को अपना कॅरियर बनाएंगे.

उम्मीद बस ये है कि वे सब भी उस सत्ता, प्रतिष्ठा और अंतरराष्ट्रीय पहुंच में हिस्सेदारी करेंगे, जो भारत में अंग्रेजी पत्रकार होने के नाते मिलती है.

उनके पीछे ऐसे परिवार और पूरे समुदाय हैं, जिन्हें यह उम्मीद है कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब उनका कोई बच्चा प्रधानमंत्री के प्रेस कांफ्रेंस को कवर करेगा, भारतीय क्रिकेट टीम के साथ हवाई यात्रा करेंगे, शाहरुख खान से उनके घर में इंटरव्यू करेंगे, बिल्कुल नई आई मर्सिडीज की टेस्ट ड्राइव करेंगे, विदेशों में सैर करने जाएंगे, घर महंगे उपहार लेकर आएंगे या अपनी जान-पहचान के बल पर पुरस्कार पाएंगे या मोटी स्कॉलरशिप झटकेंगे.

वे सात, जिनका नाम नहीं लिया जाएगा, उन्हें अच्छाई या भक्ति के बोझ के तले दबे बिना, वहां सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करानी है. सारे खराब अंग्रेजी रिपोर्टर ब्राह्मण या सवर्ण ही हों, यह कतई अच्छी बात नहीं है.

साभारः द वायर हिंदी से, खबर में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

(सुदीप्तो मंडल एक खोजी पत्रकार हैं, जो मुख्यतौर पर दक्षिण भारत से जाति, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग करते हैं. वे दलित रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला की मौत और आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन, जिससे वेमुला जुड़े थे, के 25 वर्षों के इतिहास पर एक किताब लिख रहे हैं. यह लेख मूल रूप से अलजज़ीरा में अंग्रेजी में छपा था.)

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