भारतीय मीडिया और दलित-आदिवासी प्रश्न

जब हम मीडिया में दलित मुद्दों की बात करते हैं तोसबसे पहला सवाल यही आता है कि मीडिया में दलित समाज से जुड़ा हुआ मुद्दा सामाजिक मुद्दा और देश का मुद्दा क्यों नहीं बन पाता? जबकि वंचित तबके की संख्या देश में सबसे ज्यादा है. किसी कार्यक्रम, किसी धरना-प्रदर्शन का कोई भी बैनर, जिस पर बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर या बहुजन समाज से जुड़े हुए किसी भी महापुरुष की तस्वीर लगी हो, या फिर उस पर दलित शब्द लिखा हो, वह तुरंत दलित समाज का मुद्दा बन जाता है, फिर वह देश का, समाज का मुद्दा नहीं रह जाता. आज का मीडिया इस वर्ग को इंसान के तौर पर नहीं, एक अलग किस्म के समूह के तौर पर देखता है. जैसे यह समाज इस समाज के बीच का हिस्सा नहीं है बल्कि किसी दूसरे टापू पर बसा हो. यही मीडिया की सच्चाई है. यही मीडिया का चेहरा है.

मीडिया की भाषा

मीडिया की भाषा को लेकर भी बात होनी चाहिए. आज से तकरीबन 6-7 साल पहले की एक खबर मुझे आज भी याद है. खबर दैनिक जागरण में छपी थी और उसका शीर्षक था- आदिवासी युवक की करंट लगने से मौत.. एक ऐसी खबर, जिसमें एक व्यक्ति को करंट लग जाता है और उसकी मौत हो जाती है, उस खबर में उसकी जाति का उल्लेख करना कहां तक जायज है और उसकी कितनी जरूरत है, इसका फैसला आप खुद कर लिजिए. जिस रिपोर्टर ने उस खबर को लिखा होगा और जिस संपादक ने उस खबर को संपादित किया होगा, मुझे उनकी सोच पर तरस आता है.

दलित महिला का बलात्कार, दलित को मंदिर में नहीं घुसने दिया, अम्बेडकर की रिंग टोन बजने पर दलित युवक को पीटा, दलित सांसद ने कहा… दलित मंत्री ने कहा… जब मीडिया इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करता है तो असल में वह एक खास वर्ग को यह भी संदेश दे रहा होता है कि तुम अपना काम करते रहो, तुम आराम से रहो, तुम्हें कोई दिक्कत नहीं है. तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं है. यह तुम्हारा मुद्दा नहीं है. यह देश का मुद्दा नहीं है.

इसी तरह, दबंगों ने दलित महिला से किया बलात्कार, दबंगों ने दलितों को मंदिर में घुसने से रोका, अम्बेडकर का रिंग टोन रखने पर दबंगों ने दलित युवक को पीटा.. ऐसा कह कर मनुवादी व्यवस्था की समर्थक मीडिया दलित समाज को डराने की कोशिश भी करता है. वह दलित समाज को आगाह करता है कि देख लो.. तुम विरोध करोगे तो मारे जाओगे, तुम्हारी बहन-बेटियों की इज्जत लूट ली जाएगी, इन मंदिरों में घुसने की हिमाकत मत करना… नहीं तो तुम पीटे जाओगे, ज्यादा अम्बेडकर-अम्बेडकर मत चिल्लाओ नहीं तो हम तुम्हारा भी वही अंजाम करेंगे.

मैं यह सवाल इसलिए उठा रहा हूं क्योंकि आज तक किसी मीडिया ने यह नहीं लिखा कि ब्राह्मण लड़की के साथ बलात्कार. जबकि बलात्कार की शिकार हर जाति और धर्म की महिलाएं होती हैं. ये है मीडिया का चेहरा और दलित मुद्दों को लेकर उसके काम करने का तरीका.

दलित मुद्दों को देखने का नजरिया

कुछ दिन पीछे जाइए, दिल्ली में अन्ना आंदोलन हुआ. जंतर मंतर पर दिन भर मीडिया का जमावड़ा लगा रहा. महीनों तक टीवी चैनलों और अखबारों में खबरें चलती रही. लगा जैसे बस देश सुधर गया. आंदोलन का अंजाम क्या हुआ सबके सामने है. अब बस दो महीने पीछे चलिए. ऊना की घटना के बाद गुजरात में दलितों का एक बहुत बड़ा आंदोलन हुआ. महीनों तक यह चला और आज भी चल रहा है, लेकिन मीडिया ने इस आंदोलन को कैसे दिखाया और कितना दिखाया यह आपके सामने है. मीडिया ने कभी भी जातिवाद जैसे बड़ी सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए मुहिम नहीं चलाई. अगर भ्रष्टाचार देश का नासूर बना हुआ है और उसको खतम करने को लेकर मीडिया ने दिन-रात एक कर दिया था तो क्या जातिवाद देश के लिए नासूर नहीं है और मीडिया को गुजरात और उना घटना के बहाने इस सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए आंदोलन नहीं छेड़ देना चाहिए?? जैसे उसने निर्भया मामले में और अन्ना आंदोलन के दौरान किया.

 

प्रतिनिधित्व

जिस विषय पर हमलोग बात कर रहे हैं, उससे जुड़ा हुआ एक और सवाल है, जिसको समझे बिना मीडिया के इस सारे खेल को समझा नहीं जा सकता है. वह सवाल है मीडिया में दलित/आदिवासी समाज के प्रतिनिधित्व का. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मीडिया में दलित/आदिवासी समाज का एक प्रतिशत प्रतिनिधित्व भी नहीं है. यानि इसमें पैसा एक खास वर्ग का लगा है और इसमें काम करने वाले 90 प्रतिशत लोग साधारण समाज (जिन्हें आप जनरल कैटेगरी कहते हैं) के लोग हैं. और इसमें भी 50 फीसदी से ज्यादा सिर्फ एक खास जाति के लोग हैं. यानि भारतीय मीडिया पूरी तरह से दो समुदायों का गठजोड़ है, जिसमें एक के पास अथाह पूंजी है तो दूसरा खुद को एकमात्र ज्ञानी होने का दावा करता है.

दलित/आदिवासी नायकों को देखने का नजरिया

अम्बेडकर जयंती वंचित तबके के लिए सबसे बड़ा त्यौहार है. असल में यह पूरे देश के लिए उल्लास का विषय होना चाहिए लेकिन पूरा देश नहीं मानता चलिए कोई बात नहीं. लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा बाबासाहेब को फॉलो करता हैऔर यह दिन उनके लिए बहुत अहम है. इसकी संख्या तकरीबन 30-40 करोड़ है. यह समाज भी टीवी देखता है. बावजूद इसके मीडिया में यह आज भी बैन है. मीडिया इसे सेलिब्रेट नहीं करती है. जो मीडिया करवा चौथ और भाई दूज तक की खबर पर पैकेज बनाता है, वही मीडिया बाबासाहेब की जयंती को नहीं दिखाता. आखिर क्यों?

बिरसा मुंडा की बात करते हैं. इस नायक के बारे में मीडिया क्यों चुप्पी साधे रहती है, जबकि देश का आदिवासी समाज उन्हें पूजता है. औऱ जिनकी विचारधारा पर झारखंड जैसा राज्य बनाया गया.

ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले का नाम आप लोग जानते होंगे, जिस दंपत्ति ने स्त्री शिक्षा को लेकर इतना बड़ा काम किया, मीडिया उन्हें क्यों नहीं याद करती है. दलित-आदिवासी और वंचित तबके के ऐसे सैकड़ों नायक हैं जिनका नाम लिया जा सकता है, लेकिन यह मीडिया उन्हें याद नहीं करता.

बिहार में दलितों का सामूहिक नरसंहार होता है. दर्जनों दलितों के घर जला दिए जाते हैं. मामला अदालत पहुंचता है, सालों तक इस पर बहस होती है, फैसला आता है औऱ सभी आरोपी बरी हो जाते हैं. किसी को कोई सजा नहीं मिलती. लेकिन कोई मीडिया यह सवाल नहीं उठाता कि आखिर दलितों का नरसंहार किसने किया?? अरे किसी ने तो मारा होगा उन्हें?? मीडिया इस पर बहस की जरूरत क्यों नहीं समझता??

 

स्वतंत्रता दिवस की बात करते हैं. हर साल अगस्त की 15 तारीख को देश भर में यह त्यौहार मनता है. आजादी की अनुभूति का अद्भुत नजारा होता है. टीवी चैनलों और अखबारों में अगस्त के पहले हफ्ते से ही तमाम स्पेशल रिपोर्ट की बाढ़ आ जाती है. लेकिन उस मौके पर भी इस देश का मीडिया दलित और आदिवासी समाज से जुड़े नामों को याद करने से परहेज करता है. भगत सिंह की बात होती है, गांधीजी की बात होती है, चंद्रशेखर आजाद, नेहरू तक की बात होती है, यहां तक की देश के जिन सैनिकों को परमवीर चक्र मिला होता है, उनकी भी बात होती है. होनी चाहिए, बिल्कुल होनी चाहिए.

लेकिन मेरा सवाल यह है कि तब बिरसा मुंडा की बात क्यों नहीं होती, तब 32 अंग्रजों को मार गिराने वाली ऊदा देवी पासी की बात क्यों नहीं होती, अंग्रेजों को नाकों चने चबवा देने वाला शहीद बुद्धु भगत की बात क्यों नहीं होती, वीरा पासी (50 हजार के इनामी) की बात क्यों नहीं होती, पलामू में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले निलाम्बर और पीताम्बर बंधुओं की बात क्यों नहीं होती, जिन्होंने अंग्रेजों को इतना परेशान कर दिया कि उन पर अंग्रेजों को 50 हजार का इनाम रखना पड़ा, ऐसे वीर बांके चमार की बात क्यों नहीं होती, चौरी-चौरा के नायक रमापति चमार की बात क्यों नहीं होती?? जिस तरह भगत सिंह और आजाद को हीरो बनाकर पेश किया जाता है, उधम सिंह को उतनी इज्जत क्यों नहीं मिलती. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की बात तो की जाती है लेकिन झलकारी बाई के योगदान को उस गहराई से क्यों नहीं याद किया जाता??

बाबासाहेब मीडिया की ताकत और जरूरत दोनों को समझते थे. चूंकि उस समय जो पत्र-पत्रिकाएं निकल रही थी वह वंचित समाज के मुद्दों और समस्याओं की ओर से बिल्कुल आंखें मूंदे हुए थी. आज जब यह हाल है तो आप समझ सकते हैं कि तब क्या हालात होंगे. तो भारत के वंचित समाज के मुद्दों को उठाने के लिए बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को एक अखबार शुरू करना था. अखबार का नाम था ‘मूकनायक’. अखबार के प्रचार प्रसार की बात आई. उसी समय बाल गंगाधर तिलक ‘केसरी’ नाम का अखबार निकाल रहे थे. डॉ. अम्बेडकर ने केसरी अखबार में मूकनायक के प्रकाशित होने का विज्ञापन छपवाने के लिए संपर्क किया, लेकिन तिलक ने बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा निकाले जाने वाले अखबार का विज्ञापन तक छापने से इंकार कर दिया. आप सोच सकते हैं कि केसरी जैसे अखबार जिन्होंने वंचित समाज के योग्य द्वारा दिए गए विज्ञापन को प्रकाशित नहीं किया वो दलितों के हितों से जुड़े मुद्दों को कितनी अहमियत देता होगा?

एक दूसरा उदाहरण मान्यवर कांशीराम जी से जुड़ा हुआ है. कांशीराम जी बामसेफ के बैनर तले सामाजिक तौर पर काफी सक्रिय हो चुके थे. देश भर में लोग बामसेफ से जुड़ रहे थे. बोट कल्ब पर बामसेफ का पहला अधिवेशन हुआ. देश भर से हजारों लोग इस कार्यक्रम में पहुंचे. भव्य आयोजन किया गया, लेकिन दूसरे दिन के अखबारों में इसकी एक लाइन खबर भी नहीं थी. बामसेफ से जुड़े लोगों को काफी बुरा लगा कि हमने इतना बड़ा सम्मेलन किया लेकिन इसकी कोई रिपोर्ट नहीं छपी. बामसेफ के साथियों ने कांशीराम जी से बामसेफ के आंदोलन की बात लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करने को कहा. प्रेस क्लब बुक किया गया. तारीख और समय के साथ सभी अखबार के दफ्तरों में इसकी सूचना दे दी गई. नियत समय पर कांशीराम जी और उनके एक अन्य साथी प्रेस कल्ब पहुंच गए. एक घंटा बीता, दो घंटा बीता, तीन घंटा बीता लेकिन कोई भी मीडियाकर्मी प्रेस कांफ्रेंस में नहीं पहुंचा. गजब तो यह हुआ कि प्रेस क्लब में रोज शाम को खाने-पीने के लिए मीडियाकर्मियों की भीड़ लगी रहती है लेकिन उस दिन तमाम मीडिया वाले प्रेस क्लब आए ही नहीं.

तब कांशीराम जी ने अपने सहयोगी से कहा कि मीडिया हमारी खबरों को नहीं दिखाएगी क्योंकि मनुवादी मीडिया नहीं चाहता कि हमारा आंदोलन, हमारे नायकों की कहानियां और हमारी बात दूसरों तक पहुंचे. इसलिए पहले तो मीडिया हमारी खबरों को ब्लैक लिस्टेड करेगी और जब हमारा आंदोलन बड़ा होगा तो हमें ब्लैकमेल करेगी. स्थिति आज भी बहुत नहीं बदली है. दलित/आदिवासी/मूलनिवासी वंचित समाज से जुड़ी हुई खबरों को मीडिया आज भी इसी तरह से देखता है. और मेरा मानना है कि ब्लैक लिस्टेड और ब्लैकमेल से आगे मीडिया अब इस समाज से जुड़ी खबरों को इस तरह से परोस रहा है कि इस समाज को डराया और दबाया जा सके.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर जाकर देखिए, इस समाज के लोग आए दिन अपनी मांगों और समस्याओं के लिए धरना प्रदर्शन करते हैं. जाहिर है कि सारी खबरों को दिखाना संभव नहीं है. लेकिन हरियाणा आपके बगल में है. वहां हिसार जगह है. उसी हिसार में भगाणा गांव है, वहां के दलित जातिवादी गुंडों के उत्पीड़न का शिकार होकर गांव से पलायन कर गए. उनकी बेटियों का बलात्कार किया गया. चार साल से वह इंसाफ के लिए आंदोलन कर रहे हैं. दो साल से जंतर-मंतर पर बैठे हैं. उन्हें इंसाफ दिलाने के लिए, उनका दर्द सुनने के लिए मुख्यधारा का कोई मीडिया नहीं पहुंचा. हां, जब उन्होंने उसी जंतर मंतर पर इस्लाम अपना लिया तो हलचल जरूर हुई थी. लेकिन उन्होंने वैसा क्यों किया, इस पर कितनी बहस हुई, आपको पता होगा.

हां, कुछ चैनल और कुछ पत्रकार हैं जो वंचित तबके की खबरों को लेकर कभी-कभी संजीदगी दिखाते हैं, ऐसे पत्रकारों को गालियां दी जा रही हैं और उनसे जुड़े चैनलों पर बैन लगाने की धमकियां मिल रही हैं.

इसी तरह मीडिया द्वारा दलित राजनीति को देखने का तरीका भी पक्षपाती है. जब दलित राजनीति का वाहक कोई नेता बहुजन महापुरुषों को सम्मान देने की बात करते हुए उनकी प्रतिमाएं बनवाता है और जिससे राज्य सरकार को हर दिन ठीक-ठाक आमदनी होती है, तो मीडिया इसे सामाजिक न्याय नहीं मानता बल्कि इसे पत्थर कह कर प्रचारित करता है. मीडिया सिर्फ इसी को केंद्र में रखकर प्रचारित करती है और उस सरकार द्वारा जनता के लिए किए गए अन्य कामों को नकारने की कोशिश करती है.

मेरा मानना है कि भारतीय मीडिया जातिवादी है. दलित मुद्दों के मामले में अंग्रेजी मीडिया  हिन्दी मीडिया से ज्यादा उदार है. पिछले दिनों में सोशल मीडिया के दबाव के बीच मीडिया कुछ मुद्दों को दिखाने लगा है, लेकिन मीडिया मालिकों और संपादकों को अभी अपना दिल और ज्यादा बड़ा करना होगा.

लेखक दलित “दस्तक पत्रिका” के संपादक हैं. यह लेख ईग्नू में दिए गए व्याख्यान का लिखित रूप है.

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