अगर तिरंगा फहराना ही देशभक्ति है तो संघ पंद्रह साल पहले ही देशभक्त हुआ है

15 अगस्त को मदरसों पर तिरंगा फहराने संबंधी योगीजी का हालिया आदेश सिर-आंखों पर है. उन्हें पूरी तसल्ली हो जाए इसलिए तिरंगा फहराने की वीडियो रिकॉर्डिंग कराने में भी हमें कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए.

आखिर देशभक्ति मापने का जो पैमाना उन्होंने तैयार किया है उस पर खरा उतरना हमारा फर्ज है. लेकिन इस प्राथमिक सहमति के बाद क्या हमें योगीजी सहित सभी नवदेशभक्तों को प्रसिद्ध नागपुर केस नंबर 176 की याद दिलाने की इजाजत है? आखिर जब पैमाना बनाया ही गया है तो क्यों न हम सब उस पर खड़े होकर अपनी-अपनी देशभक्ति माप लें?

अगस्त 2013 को नागपुर की एक निचली अदालत ने वर्ष 2001 के एक मामले में दोषी तीन आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया था. इन तीनों आरोपियों बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी का जुर्म तथाकथित रूप से सिर्फ इतना था कि वे 26 जनवरी 2001 को नागपुर के रेशमीबाग स्थित आरएसएस मुख्यालय में घुसकर गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा फहराने के प्रयास में शामिल थे.

राष्ट्रप्रेमी युवा दल के यह तीनों सदस्य दरअसल इस बात से क्षुब्ध थे कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर भी आरएसएस के दफ्तरों में कभी तिरंगा नहीं फहराया जाता.

सवाल यह है कि जिस भवन पर यह युवक तिरंगा फहराना चाहते थे वो कोई मदरसा नहीं था. वो तो आरएसएस का राष्ट्रीय मुख्यालय था जिसकी देशभक्ति पर आज कोई भी सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता. तब फिर क्या वजह थी कि संघ इस कोशिश पर इतना तिलमिला गया कि तीनों युवकों पर मुकदमा दर्ज हो गया और 12 साल तक वो लड़के संघ के निशाने पर बने रहे.

यह भी पूछना लाजमी है कि नागपुर की अदालत में यह मुकदमा दर्ज होने के बाद 2002 में आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा झंडा फहराने का निश्चय क्यों किया गया? क्या इसलिए कि आरएसएस यह समझ गया था कि इस मुकदमे का हवाला देकर उसकी देश के प्रति निष्ठा पर सवाल खड़े किये जायेंगे? या इसलिए कि भगवा झंडे के बजाय तिरंगे से जुड़ी जनभावनाओं का सहारा लेकर उसे अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाना आसान लगने लगा था?

क्या यह कहा जा सकता है कि अगर तिरंगा फहराना ही देशभक्ति है तो आरएसएस तो अभी जुम्मा-जुम्मा पंद्रह साल पहले ही देशभक्त हुआ है. अगर ऐसा नहीं है तो क्या 2002 के पहले तिरंगा भारतीय राष्ट्र का राष्ट्रध्वज नहीं था या फिर आरएसएस खुद अपनी आज की कसौटी पर कहें तो देशभक्त नहीं था?

जिस देश में आधुनिक संदर्भ में झंडे का इतिहास तकरीबन सौ साल पुराना हो, वहां देशभक्ति के मामले में इतनी लेट लतीफी पर यह सवाल तो बनता है.

इसके पहले ऐसा सिर्फ दो बार हुआ था. पहला 15 अगस्त 1947 को और दूसरा 1950 में तब जब सरदार पटेल ने गांधीजी की हत्या में संलिप्तता के मामले में संघ पर लगा प्रतिबंध हटाने के पहले तिरंगे को राष्ट्रध्वज मानने के लिए गोलवलकर को मजबूर किया था.

क्या किसी देशभक्त को तिरंगा फहराने के लिए या उसे अपना राष्ट्रध्वज फहराने के लिए मजबूर करना पड़ता है? जैसे आज संदेहास्पद रूप से देशद्रोही लोगों को झंडा फहराने के लिए देशभक्त सरकार मजबूर कर रही है.

अगर नहीं तो क्या वजह थी कि गोलवलकर को तिरंगे को राष्ट्रध्वज मानने के लिए सरदार पटेल को ‘मजबूर’ करना पड़ा? दरअसल यह मजबूरी ही वो गुत्थी है जिसे सुलझाने में समूचा संघ परिवार हाल-फिलहाल लगा हुआ है.

मजबूरी यह है कि आज भी इस देश में आपको अपनी राष्ट्रभक्त सिद्ध करते हुए बताना पड़ेगा कि भारतीय स्वाधीनता संघर्ष में आपने क्या और कितना बलिदान दिया?

भले ही पिछले सात दशकों से दिन-रात गांधी-नेहरू के बहाने पूरी आज़ादी की लड़ाई को बदनाम करने में कोई कोर-कसर न छोड़ी गयी हो, अभी भी आम भारतीय की जनचेतना में यह देशभक्ति की सबसे पहली कसौटी है.

भले ही पिछले कई दशकों में सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे कद्दावर कांग्रेसी नायकों को चुराकर अपना बनाने के प्रयास किये गए हों, लोग पूछते हैं कि आपने आज़ादी की लड़ाई में कहां-कहां और कितनी बार जेल काटी?

मजबूरी यह है कि आज भी एक आम भारतीय को तिरंगा हाथ में लेकर देश के नाम पर भावुक किया जा सकता है क्योंकि तिरंगा भारत की स्वतन्त्रता और संप्रभुता का सबसे महान प्रतीक है. भारत की संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को जिस तिरंगे को अंगीकार किया था वो दरअसल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के झंडे का संशोधित संस्करण था.

राष्ट्रध्वज पर प्रस्ताव को रखते हुए नेहरू जानते थे कि आरएसएस और हिंदू महासभा जैसे सांप्रदायिक दल झंडे की सांप्रदायिक व्याख्या करने का प्रयास करेंगे. इसलिए पहले की व्याख्याओं से इतर वो तिरंगे के तीनों रंगों की एक धर्मेतर व्याख्या करना चाहते थे ताकि सांप्रदायिक दल इसकी आड़ में अपना विभाजनकारी एजेंडा आगे न बढ़ा सकें.

क्योंकि तिरंगे झंडे के खिलाफ आरएसएस और हिंदू महासभा के नेता आग उगलते घूम रहे थे.

आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर एक आम सभा को संबोधित करते हुए साफ़ कहा था कि ‘सिर्फ और सिर्फ भगवा ध्वज ही भारतीय संस्कृति को पूरी तरह प्रतिबिंबित करता है’ . ‘हमें पूरा यकीन है’, उन्होंने आगे कहा था, ‘अंततः पूरा देश भगवा ध्वज के सामने ही अपना सिर झुकाएगा.’

इसी तरह, हिंदू महासभा के नेता वीडी सावरकर ने संविधान सभा में कहा था कि ‘भारत का प्रतीक सिर्फ भगवा-गेरू रंग ही हो सकता है.’ उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर किसी झंडे में ‘कम से कम एक पट्टी भी भगवा नहीं होगी, हिन्दू उसे अपना झंडा नहीं मानेंगे.’

सवाल उठता है कि जब केसरिया रंग झंडे में पहले से ही मौजूद था, सावरकर और गोलवलकर आदि उस रंग की अलग व्याख्या क्यों करना चाहते थे? या अगर वो अलग व्याख्या करना चाह ही रहे थे तो उसमें गलत क्या था?

सबसे बड़ी समस्या यह थी कि हिंदू महासभा और आरएसएस उसी ढर्रे पर सोच रहे थे जिस पर चलकर मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के नाम पर पाकिस्तान बना लिया था. उनकी देश की परिभाषा बेहद संकुचित थी जिसमें पाकिस्तान बन जाने जैसे ही खतरे छुपे हुए थे.

उनका भगवा भारत के अन्य सभी अल्पसंख्यकों के ऊपर हिंदुओं के प्रभुत्व का हामी था जिसमें ईसाई और मुसलमान सहित सभी गैर हिंदू दोयम दर्जे के नागरिक बन जाने थे.

बहरहाल, सावरकर के हिसाब से हिंदुस्थान (हिंदुस्तान नहीं, हिंदू और स्थान की संधि) का ‘आधिकारिक झंडा सिर्फ़ और सिर्फ़ कुण्डलिनी और कृपाण के साथ भगवा ध्वज ही हो सकता था.’ साथ ही उन्होंने साफ़ घोषित कर दिया कि ‘हिंदू किसी भी कीमत पर वफादारी के साथ अखिल हिंदू ध्वज यानी भगवा ध्वज के सिवा किसी और ध्वज को सलाम नहीं कर सकते.’

इसी तर्ज पर गोलवलकर ने चेताया था कि ‘यह (तिरंगा) कभी भी हिंदुओं के द्वारा न अपनाया जायेगा और न ही सम्मानित होगा’. उनके मुताबिक़ ‘तीन का शब्द तो अपने आप में ही अशुभ है और तीन रंगों का ध्वज निश्चय ही बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा और देश के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा’.

यही वजह है कि आरएसएस कभी भी तिरंगे को भारतीय राष्ट्र का ध्वज नहीं मानता. आज़ादी के बाद भी आरएसएस और हिंदू महासभा ने खुद को विभाजन और भगवा ध्वज को राष्ट्रध्वज न मानने की वजह से उत्सवों से दूर रखा.

जब तक आरएसएस देश की राजनीति के मुख्य विमर्श से दूर रही, तिरंगे और भारतीय स्वाधीनता संघर्ष को लेकर उसकी राय का कोई बड़ा महत्त्व न रहा. लेकिन एक बार राजनीतिक परिदृश्य पर हावी होते ही उसने देश का रुख समझ न सिर्फ तिरंगा बल्कि स्वाधीनता संघर्ष को लेकर अपनी आपत्तियों को भी कालीन के नीचे सरका देने में भलाई समझी.

इसीलिए यह नवदेशभक्त हर जगह तिरंगे को उसके विचार, भावना और प्रतीकात्मक महत्त्व से ज्यादा उसकी लंबाई-चौड़ाई और ऊंचाई पर ध्यान देते हैं. वो लोगों को इतनी बार तिरंगा दिखा देना चाहते हैं कि लोगों को यकीन हो जाए कि वो ही इस देश में इकलौते देशभक्त हैं. यह उनके भीतर का भय और आत्मविश्वासहीनता है जो उन्हें हद से ज्यादा दिखावटी बनाती है.

अब चूंकि तिरंगे को लेकर खुद आरएसएस का इतिहास भी कोई साफ-सुथरा नहीं है, इसलिए उसे और उसके द्वारा नियंत्रित सरकारों को भी आत्मसुधार का प्रयास करना चाहिए.

अगर आपके पास इस बात के पुख्ता सबूत है कि कुछ मदरसे तिरंगे को अपना राष्ट्रध्वज नहीं मानते तो आपका फर्ज है कि आप उनको ऐसा करने के लिए मजबूर करें. लेकिन साथ ही यह प्रार्थना भी है कि तिरंगा फहराने और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग करने का आदेश आरएसएस के दफ्तरों को भी दिया जाए तो ही देशभक्ति की भावना के साथ पूरा न्याय होगा.

यह लेख सौरभ बाजपेयी का है. (लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के संयोजक हैं)

साभारः द वायर

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