भारतीय लोकतंत्र: एक राजनीति कारोबार

भारतीय राजनीति में विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जन्म यूं ही नहीं हुआ, इसका कारण केवल और केवल यह है कि ब्राह्मणवाद के चलते पहले से ही वर्चस्वशाली राजनीतिक पार्टियां अलोकतांत्रिक होती जा रही हैं. इन वर्चस्वशाली राजनीतिक पार्टियों के गिरते राजनीतिक आचरण के कारण विभिन्न क्षेत्रीय दलों का न केवल जन्म हुआ अपितु उनमें से कई पार्टियां सत्ता तक भी पहुंचीं. वर्तमान राजनीतिक फलक इस बात का साक्षी है.

किंतु पिछले छह/सात दशक में पहली बार राजनीतिक अस्मिता खतरे से बाहर नजर नहीं आ रही. राजनीतिक अस्मिता ही नहीं, जातीय अस्मिता,  क्षेत्रीय अस्मिता, परिवार की या कोई और… कुछ भी तो सुरक्षित नहीं है. आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर न केवल अस्मिता की राजनीति को धता बता “आकांक्षा”  की राजनीति को खड़ा करने का सफल प्रयास किया है, अपितु राजनीतिक अस्मिता/राज-धर्म को रसातल में पहुंचा दिया है. इसका अफसोस आज तो नहीं, आगे आने वाले दिनों में मोदी के चहेतों को जरूर होगा, इसमें दो राय नहीं. भाजपा के सत्ता में आने के लगभग दो साल से ज्यादा के शासन में हुए राज्यों के चुनावों में भाजपा की जो फजीहत हुई है, इसके चलते भाजपा और इसके पैत्रिक समर्थक दलों और आर आर एस को यह तो सोचना ही होगा कि लोकसभा के चुनावों में भाजपा के हक में हुआ बदलाव महज एक बार की बात है या फिर स्थाई.

असल में सबसे बड़ी चिंता यह जताई जा रही है कि पिछ्ले कुछ दशकों से भारतीय राजनीति एक रोजगार का हिस्सा बनती जा रही है. इसका जीता जागता प्रमाण है… भारतीय राजनीति में जड़ जमाता परिवारवाद/वंशवाद. दरअसल वंशवाद अथवा परिवारवाद शासन की वह प्रणाली है जिसमें एक ही परिवार, वंश या समूह से एक के बाद एक कई शासक बनते चले जाते हैं. यह भाई-भतीजावाद की परिपाटी लोकतंत्र के लिए खतरनाक तो है ही, अधिनायकवाद को जन्म देने वाली हो सकती है. सच तो ये है कि लोकतन्त्र में वंशवाद के लिये कोई स्थान नहीं है किन्तु भारत में लोकतंत्र की शुरुआत से ही परिवारवाद की राजनीति हावी रही. प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो वंशवाद/परिवारवाद निम्न स्तर का असंवैधानिक आरक्षण है. इसे राजतंत्र/एकतंत्र का एक सुधरा हुआ रूप कहा जा सकता है. वंशवाद, आधुनिक राजनैतिक सिद्धांतों एवं प्रगतिशीलता के विरुद्ध है.

कहना न होगा कि आकांक्षा हो या फिर जातीय/क्षेत्रीय अस्मिता, दोनों ही भावनात्मक छोर की ओर ले जाती हैं. यद्यपि अस्मिता की राजनीति लोगों को ज्यादा गुणकारी लगती हैं, तथापि भारत में जातिवाद और क्षेत्रवाद का भाव लोगों को लामबन्द कर देते हैं. और वोटिंग के समय मतदाता देश तो क्या, यहां तक कि अपने निजी और सामाजिक हितों को भी ताक पर उठाकर रख देते हैं. इसीलिए जैसे-जैसे कांग्रेस राष्ट्रीय दल के रूप में कमजोर होती गई, क्षेत्रीय और जातीय दलों का उभार होने लगा. राज्य से निकलकर क्षेत्रीय दल राजनीतिक गठबंधन के चलते केंद्र की सत्ता में तक पहुंच गए. इस प्रकार कई जातीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का सशक्तीकरण हुआ… यह कोई बुरी बात भी नहीं है क्योंकि राजनीतिक समाज के निचले तबके को रास आने लगी… किंतु दुख की बात तो ये है कि समाज के निचले वर्ग की समस्याएं जहां की तहां हैं… क्योंकि यह राष्ट्रीय दलों की नाकामी रही वे क्षेत्र और जाति की अस्मिता को उचित प्रतिनिधित्व देने में नाकाम रहे. दलित और पिछड़े वर्ग से आए नेता अपने ऐशो-आराम की जिन्दगी जीने के जुगाड़ में मशगूल हैं. कहा जा सकता है कि क्षेत्रीय और जातीय दलों के उभार का सामाजिक स्तर पर इतना तो फायदा तो हुआ कि अब निचली माने वाली जातियां बिना राजनीतिक संरक्षण के भी सरकार के खिलाफ अपने अधिकारों के लिए लामबन्द होने लगी हैं. लेकिन शासन के स्तर पर इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि निचली माने वाली जातियों के राजनेता सत्ता के विमर्श और सामाजिक विकास से जैसे बाहर हो गए… कारण कि वे अपने वर्चस्वशाली राजनीतिक आकाओं के सामने मुंह न खोलने को बाध्य हैं. उसकी कीमत पूरे दलित और पिछड़े समाज को चुकानी पड़ रही है. यहां तक कि उन लोगों को भी जिनके भले के लिए इस राजनीति का दावा किया जा रहा था.

हैरत की बात है कि आम मतदाता सत्तारूढ़ दलों और गठबंधन की सरकारों से छुटकारा चाहती है. किंतु धर्म और असामाजिक गतिविधियों से जुड़े लोग अपने मंतव्य को साधने के लिए सामाजिक हितों को सूली पर चढ़ा देते हैं. आज आम मतदाता केवल इस बात से संतुष्ट होने को तैयार नहीं है कि वोट मांगने वाला उसकी जाति, धर्म या क्षेत्र का है. लेकिन राजनीतिक गुंडातत्व जाति, धर्म या क्षेत्र को ज्यादा महत्त्व देता है. आम मतदाता को लगता है कि अस्मिता की राजनीति भूमिगत हो गई है.

मतदाता अस्मिता की राजनीति की अपील करता है. वह परिवर्तन के लिए प्रयोग करने को तैयार है. शायद इसलिए कि अस्मिता की राजनीति दिन प्रति दिन खत्म होती जा रही है. आज ये कहना गलत नहीं होगा कि अस्मिता की राजनीति खतरे में है. राजनीति का चक्र अब विकास के नाम पर घूमता हुआ लग रहा है. अस्मिता की राजनीति के साथ ही गठबंधन की राजनीति के दिन भी लदते दिख रहे हैं. उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य प्रदेशों में होने वाले चुनावों के परिणामों से शायद इसके संकेत देखने को भी मिल जाए.

कहना अतिशयोक्ति न होगा कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीति ने एक कारोबार का रूप ले लिया है. राजनीति के गलियारों में परिवारवाद के खिलाफ कितनी ही भी हाय तौबा की जाती हो लेकिन भारतीय राजनीति के व्यवहार/आचरण से परिवारवाद दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है. परिवारवाद की राजनीति से कोई भी राजनीतिक दल अछूता हो, ऐसा नहीं है.

नेहरू परिवार की बेशक आज जड़े उखड़ती दिख रही हैं, किंतु दूसरे राजनीतिक दल जो आज तक नेहरू परिवार पर परिवारवाद की राजनीति का आरोप लगाते आ रहे थे, परिवारवाद की राजनीति का खुला खेल रहे हैं. अब चुनाव लोकसभा के हों अथवा राज्यों की विधानसभाओं के धरती-पकड़ नेता अपने परिवार के किसी न किसी सदस्य को आगे लाने में लगे रहते हैं. 2014 के आम चुनावों में कम से कम 15/16 राजनीतिक परिवारों के एक या उससे अधिक सदस्य मैदान में थे. इससे साफ है कि राजनीतिक घरानों के युवा/युवतियां उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी गैर राजनीतिक प्रशासनिक और अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञ बनने के चेष्टा न करके समृद्ध इलाके की राजनीति में अपने परिवार का वर्चस्व बनाये रखने के लिए राजनीतिक  व्यवस्था का अंग बनने/बनाए जाने की राह पर देखे जा सकते हैं. इसी कारण के चलते दशकों से कोई जनप्रिय राजनेता जमीन पर नहीं उभर सका.

सच तो ये है आज कोई लाल बहादुर शास्त्री और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे नेता राजनीतिक मैदान में जोर अजमाइश करें भी तो उनकी जमानत जब्त होना इसलिए लाजिम है क्योंकि भारतीय राजनीति में धर्म और धर्म के नाम पर गुण्डागर्दी ने अपने पांव जमा लिए है. हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार धर्म एक व्यक्तिगत मान्यता का विषय है किंतु धर्म के नाम पर वोट मांगना एक अपराध है. किंतु फिर भी राजनीतिक पार्टियां किसी न किसी बहाने धर्म को चुनाव मुद्दा बना ही लेती हैं. चुनाव आयोग भी इस बारे में कोई खास कदम नहीं उठा पाता. कारण है कि आयोग में भी विभिन्न मत-मतांतरों के लोग ही नियुक्त होते हैं.

नई बात जो हुई है वो है कि नेहरू परिवार से समाज के अनुसूचित/जनजातियों और तथाकथित पिछड़े वर्ग से आए राजनेताओं ने भी परिवारवाद की राजनीति में सुचारू रूप से भागेदारी निभाने का हुनर सीख लिया है. उदाहरण के लिए लालू प्रसाद यादव, सिंधिया परिवार, मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान, देवगौडा, महाराष्ट्र के पंवार, पंजाब के अमरिन्दर सिंह, पंजाब के ही प्रकाश सिंह बादल, छत्तीसगढ़ से अजित सिंह जोगी, मध्य प्रदेश से दिग्विजय सिंह, हरियाणा से  ओम प्रकाश चौटाला, हरियाणा से ही  हुड्डा परिवार, उत्तराखण्ड से हेमवती नन्दन बहुगुणा, रावत परिवार और करूणानिधि आदि नेताओं की परिवारवादी राजनीति दशकों से चल रही है. कुछ परिवार में तो राजनीति करने लायक जितने भी सदस्य हैं वे सभी किसी न किसी पद पर हैं. कुछ परिवारों ने तो 2-2 दलों में अपनी पैठ बना रखी है और हवा के रूख के हिसाब से अपने भविष्य की राजनीति को तय करते हैं. नेहरू परिवार की बहू और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कांग्रेस मे उनके ही परिवार की बहू मेनका गांधी (और उसका बेटा) अपनी जेठानी से अलग भाजपा की राजनीति करती हैं. यह और कुछ नहीं सत्ता में बने रहने का एक नायाब तरीका है. इधर रहो या उधर, रहो सत्ता में. इससे अच्छा और कोई कारोबार कम से कम भारत में तो और कुछ हो ही नहीं सकता.

मुलायम परिवार और लालू प्रसाद के परिवार के रिश्तेदार तक किसी न किसी राजनीतिक पद पर हैं. इस बार रामविलास पासवान ने भी अपने बेटे को मैदान में उतारा. उत्तर प्रदेश के गत विधानसभा चुनाव में सपा के सत्तारूढ़ होने पर मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश मुख्यमंत्री बनाए गये. लालू खुद लड़ न सके तो पत्नी को उतारा क्योंकि बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाले में सजा के कारण राजद के प्रमुख लालू प्रसाद यादव की लोकसभा की सदस्यता समाप्त हो गयी थी. बिहार में इस बार नितीश कुमार की सरकार बनी तो लालू प्रसाद के बेटे के लिए उप-मुख्यमंत्री का पद इजाद किया गया.

शरद पवार राज्यसभा में पहुंचे तो उनकी पुत्री सुप्रिया सुले बारामती से पार्टी की उम्मीदवार रहीं. उनके भतीजे अजीत पंवार पहले से ही मंत्री हैं. इसी तरह पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह अमृतसर में कांग्रेस के उम्मीदवार थे तो  उनकी पत्नी परनीत कौर पटियाला से पार्टी की प्रत्याशी थीं. एक ईमानदार राजनेता चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजीत सिंह….अब अजीत सिंह के बेटे जयंत सिंह… न जाने कितने ही ऐसे उदाहरण हैं, जो राजनीति का हिस्सा न होकर कारोबार का हिस्सा हो गया है. हाँ! बसपा की मायवती अभी तक इस आरोप से बरी ही मानी जाएंगी…. उन्होंने अपने परिवार के किसी भी सदस्य को राजनीतिक मैदान में नहीं उतारा.

भाजपा की राजनीतिक ताकत बढ़ी तो उसने भी परिवारवाद का खेल खेलना शुरू कर दिया. अब भाजपा के शीर्ष नेता भी अपने चहेते और बेटा-बेटियों को राजनीति के मैदान में उतारने में पीछे नहीं हैं. वैसे तो समूची भाजपा और आर एस एस जैसे बड़े परिवार का कोई घटक आर एस एस मुखिया के खिलाफ किसी तर्कसंगत बात को भी नहीं पूछ सकते ……मोदी जी तक भी नहीं.

और तो और जिस महाराष्ट्र में अस्मिता की राजनीति का एक लम्बा दौर चला किंतु बाल ठाकरे और शरद पवार परिवारवाद की राजनीति के अगुआ बन गए हैं. नतीजा यह हुआ कि परिवार और दल दोनों टूट गए. उद्धव ठाकरे हों या राज ठाकरे राजनीति में उनका अपना अर्जित किया हुआ कुछ नहीं है. दोनों बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत पर दावा कर रहे हैं.

हरियाणा तो न जाने कब से अपने राजनीति ‘लालों’ के लिए जाना जाता है. तीनों लाल, यद्यपि देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल अब इस दुनिया में नहीं हैं, तथापि इनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए इनके परिवार मौजूद हैं.

देवीलाल की तो चौथी पीढ़ी राजनीति से जुड़ी है. देवीलाल और बंसी लाल की पहचान जाट नेता के रूप में रही तो भजनलाल गैर जाट नेता के रूप में स्थापित रहे. सिद्धांत और विचारधारा जैसी चीजों का राजनीति में प्रवेश नितांत  वर्जित है. इसलिए राजनीतिक कारोबार को इस बात में शर्मिंदा होने जैसी कोई वजह नजर नहीं आती. जनता के रुझान को ध्यान में रखते हुए कोई भी राजनेता किसी भी पार्टी में जा सकता है. आजके जनसेवकों/राजनेताओं का यह आचरण किसी से छुपा तो नहीं है? ऐसे हालातों को देखते हुए अब कौन कह सकता है कि आज की राजनीति किसी “कारोबार” से कम है… यदि कोई कहता है कि नहीं… तो सत्ता पाने की इतनी मारामारी क्यों? तमाम के तमाम बड़े राजनीतिक दल राजनीति और धंधा एक साथ करते हैं. माननीय मुलायम सिंह के घर में मचा घमासान इस सच का सटीक प्रमाण है कि लोकतंत्र की राजनीति एक रोजगार बन गई है.

स्मरण रहे कि एक समय हुआ करता था कि जब देश की लोकसभा में 75% सांसद ब्राह्मण और बनिया वर्ग के हुआ करते थे, आज लगभग 60% सांसद अनुसूचित /जन जाति और पिछड़े वर्ग से चुनकर लोकसभा की शोभा बढ़ा रहे हैं. किंतु सांसद या मंत्री बनते ही वो ये भूल जाते हैं कि भारतीय समाज के दलित/दमित वर्ग के लिए उनका कोई दायित्व भी है. भारतीय समाज के दलित/दमित वर्ग की कमोबेश आज भी वो ही हालत है जो विगत में थी…..कुछ मोडरेट जरूर हो गई है. भेदभाव के नए तौर-तरीके… अत्याचार के तौर-तरीकों में आया नयापन राजनेताओं को “विकास” नजर आता है. आज के भारत में भाजपा सरकार के चलते जितना हिंसक अत्याचार दलितों और अल्पसंख्यकों पर हो रहा है, शायद ही कभी पहले इस दर्जे की क्रूर क्रियाएं हुई हों. किंतु सत्ता पक्ष में बैठे इस वर्ग से आए सांसदों और मंत्रियों की जुबान को जैसे लकवा मार गया हो, किसी का भी मुंह नहीं खुला. बाबा साहेब अम्बेडकर ने ठीक ही कहा था कि पालतू कुत्ता मालिक की सोटी खाकर भी केवल पूंछ ही हिलाता है… भौंक सकने की ताकत वह खो चुका होता है.

संविधान सभा में दिए गए अपने भाषण में डा. अम्बेडकर ने जिस सामाजिक लोकतंत्र की कल्पना की थी, उसे आज पूरी तरह से भुला दिया गया है. कहना अतिशयोक्ति न होगा कि आज देश की राजनीति पर भाजपा की पैत्रिक संस्था आर एस एस जैसी जड़ यानी परम्परागत संस्कृतिवादी संस्थाओं का कब्जा है. तर्क इनकी समझ से परे है और आस्था इनके खून में. संस्कृति और धर्म की आड़ में समाज विरोधी राजनीति करना इनकी आदत में सुमार है. यद्यपि समाज का बहुसंख्यक वर्ग इनकी विचारधारा को पसंद नहीं करता किंतु आज का टी आर पी पसंद मीडिया और प्रचार के दूसरे माध्यम इनकी राजनीति को शिखर पर ही रखते हैं जिसके चलते धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक मसले प्राय: इनके पक्ष में ही खड़े हो जाते हैं. धर्म और जाति केन्द्रित राजनीति भारतीय समाज के लिए एक कलंक ही है.

लेकिन लोकतंत्र में संख्याबल के जो मायने है… उसका जायजा इस बात से लिया जा सकता है कि यदि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक ओर 51 गधे और दूसरी ओर 49 घोड़े जीतकर लोकसभा में पहुँचते हैं तो सरकार 51 गधों की ही बनेगी. इस तर्क के मद्देनजर समाज का दलित/दमित वर्ग अपने आप को वर्चस्वशाली वर्गों जिनपर सवर्णों का कब्जा है और जिनका न्याय, समानता, वर्गहीन समाज और समग्र विकास में साझेदारी जैसे कामों में कोई विश्वास नहीं होता, के साथ स्वार्थपूर्ण गठबन्धन कर उनके हवाले कर देता है. और दलित और दमित समाज के तथाकथित नेता जीतने के बाद उस दलित/दमित समाज की अनदेखी कर देता है जिसके भले की दुहाई देकर वो सत्ताशीन होता है. ऐसे में विचार और सामाजिक परिवर्तन की राजनीति केवल एक सवाल बनकर रह जाती है.

लोकतंत्र में जनता को निर्णायक शक्ति माना जाता है, किंतु लोकतंत्र में जनता को अपना अधिकार दिखाने का हक पांच साल में केवल एक दिन मिलता है और राजनेताओं को जनता को लूटने का अधिकार पूरे पाँच साल के लिए मिल जाता है. अब कोई तो बताए कि लोकतंत्र में राजनीति की अस्मिता जनसेवक की नहीं….एक कारोबारी की है. यहाँ यह कहना भी तर्कसंगत ही होगा कि एक बार सत्ता में आने के बाद राजनेता जिस प्रकार जनता के धन का दुरुपयोग करते हैं…. किसी से छुपे नहीं हैं. कोई नेता अपनी औलाद को नोटों के बिस्तर पर सुलाता है, कोई अपने बेटे के द्वारा गलत पार्किंग कराने से रोकने पर पुलिस के कांस्टेबिलों को सस्पेंड करा देता है तो राजसत्ता टी. वी. चेनल पर सचाई दिखाने के लिए किसी चेनल के प्रसारण पर एक दिन के लिए रोक लगा देता है. मेरी समझ से परे है कि एनडीटीवी का प्रसारण नौ नवम्बर को ही बन्द करने के पीछे सरकार का  क्या मकसद रहा है. क्या संघ परिवार के किसी महापुरुष का जन्म दिन है उस दिन? क्या बात है कि जो टीवी चैनल सरकारी हिसाब से कुछ सच्ची… कुछ झूंठी खबरें दिखाए, उसकी वाह-वाह और जो मरने मारने की खबरों का सच उजागर करे… उसका प्रसारण बन्द. क्या खूब है लोकतंत्र की कारोबारी राजनीति. आज के इस राजनीतिक आचरण को आप क्या कहेंगे? क्या इसे अघोषित आपातकाल की संज्ञा देना गलत होगा?

लेखक तेजपाल सिंह तेज को हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार और साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. इनका संपर्क सूत्र tejpaltej@gmail.com है.

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