2016 में इन साहित्यकारों ने दुनिया को कहा अलविदा

Details Published on 31/12/2016 12:57:26 Written by Dalit Dastak


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नई दिल्ली। 2016 भारतीय साहित्य के लिए काफी अहम साल रहा. हर साल की तरह इस साल भी कई लेखकों की लेखन और कविओं की कविताओं ने साहित्य जगत को चार चांद लगाए, लेकिन कुछ लेखक, कवि और साहित्यकारों ने दुनिया को अलविदा कह दिया. कहते हैं एक साहित्यकार जब किसी रचना को कलम से देता है तो वह हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर हो जाती हैं. जिन्होंने हमें इस साल अलविदा कहा वो खुद भी अपनी लेखनी के जरिए रोशन हो गए, लेकिन उनकी लेखनी की कमी अब कोई दूसरा पूरा नहीं कर सकता.


साहित्यकार महाश्वेता देवी

बांग्ला की जानी मानी साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी का 90 साल की उम्र में 28 जुलाई को कोलकाता में निधन हो गया. महाश्वेता देवी को ज्ञानपीठ, पद्म विभूषण, साहित्य अकादमी और मैग्सेसे जैसे बड़े सम्मानों से नवाजा गया था. यूं तो महाश्वेता देवी बांग्ला में उपन्यास लिखा करती थीं लेकिन अंग्रेजी, हिंदी और अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद के जरिए उनके साहित्य की पहुंच काफी व्यापक स्तर पर थी. उनकी चर्चित किताबों में हजार चौरासी की मां, ब्रेस्ट स्टोरीज, तीन कोरिर शाध शामिल हैं. उनकी कई किताबों पर फिल्में भी बन चुकी हैं.


पर्यावरणविद अनुपम मिश्र

प्रसिद्ध पर्यावरणविद, जल संरक्षण कार्यकर्ता और गांधीवादी अनुपम मिश्रा का 19 दिसंबर दिल्ली के एम्स अस्पताल में 68 साल की उम्र में निधन हो गया. वे पिछले कुछ सालों से प्रोस्ट्रैट कैंसर से पीड़ित थे. मिश्र को पर्यावरण क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1996 में इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. पर्यावरणविद के रूप में मशहूर अनुपम मिश्र ने पर्यावरण के ऊपर कई किताबें भी लिखी थी. 90 के दशक की शुरुआत में अनुपम मिश्र ने ''आज भी खरे हैं तालाब'' और ''राजस्‍थान की रजत बूंदे'' लिखी थी, जो पर्यावरण पर हिंदी में अलग इतिहास बना चुकी है. अनुपम मिश्र ने गांव समाज की भाषा से लोगों को जोड़ा. वे जिस भाषा में बोलते और लिखते थे वह लोगों को भीतर तक छू जाती थी.


निदा फाजली

हिंदी और उर्दू के मशहूर शायर निदा फाजली का इसी साल 8 फरवरी को मुंबई में 78 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. ''कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता'' जैसी मशहूर गजल लिखने वाले निदा फाजली का पूरा नाम मुकतिदा हसन निदा फाजली था. दिल्ली में जन्मे फाजली के माता-पिता विभाजन के दौरान पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन फाजली भारत में ही रहे. उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया था.



विवेकी राय

भोजपुरी साहित्य के चर्चित साहित्यकार विवेकी राय का उत्‍तर प्रदेश के  वाराणसी में 22 नवंबर को निधन हो गया. विवेकी राय ने 70 से ज्‍यादा किताबें लिखी. इनमें ''सोनामाटी'', ''लोकऋण'', ''जुलूस रुका है'' और ''समर शेष है'' ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई. उनकी हर किताब में लगभग स्थानीय पात्र ही रहे. वे हमेशा निर्विवाद रहे और बड़े साहित्यकारों के साथ ही छोटे लेखकों को भी समय देने के लिए जाने जाते थे.


प्रभाकर क्षोत्रिय

हिंदी के ओलाचक, लेखक और चिंतक प्रभाकर क्षोत्रिय का 76 वर्ष की आयु में 15 सितंबर को दिल्‍ली में निधन हो गया. उन्‍होंने हिंदी की कई प्रतिष्‍ठित साहित्‍यिक पत्रिकाओं का संपादन किया इनमें, वागर्थ, ज्ञानोदय और समकालीन भारतीय जैसी पत्रिकाएं शामिल हैं. एक आलोचक के रूप महाभारत पर उन्‍होंने बेहद गंभीर कार्य किया. आलोचक और नाटककार के रूप में वे हिंदी साहित्‍य के सबसे लोकप्रिय हस्‍ताक्षर रहे. इसके अलावा हिंदी आलोचना में भी प्रभाकर श्रोत्रिय एक महत्वपूर्ण नाम रहे, हालांकि पर आलोचना के इतर भी साहित्य में उनका अहम योगदान रहा.


महिम बोरा

असम के प्रसिद्ध कवि और ''काथानीबाड़ी घाट'' जैसी प्रसिद्ध लघु कहानी के रचयिता साहित्यकार महिम बोरा का 5 अगस्त 2016 को 93 साल की उम्र में निधन हो गया. 26 जुलाई, 1924 को जन्मे महिम बोरा 1989 में डूमडूमा अधिवेशन के दौरान असम साहित्य सभा के अध्यक्ष चुने गए थे. बोरा को 2011 में पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा गया था. 2001 में उन्हें उनके उपन्यास ''एधानी माहिर हाही'' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वही 1998 में वे असम वैली लिटरेरी अवार्ड से नवाजे गए थे.


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