हिन्दू धर्म ग्रंथ और महिला सम्मान का प्रश्न

प्राचीन काल से लेकर आज के समय तक एक उपमा जो स्त्रियों के लिए हमेशा दी जाती है, वह है कि सीता-सावित्री की तरह बनो. इस उपमा में सीता या सावित्री के व्यक्तित्व की ऊंचाईयों और गहराईयों को समझने की बात नहीं होती. यहां तो यह इसलिए कहा जाता है कि उनकी नजर में सीता और सावित्री अपने कुल के आदर्शों को ढोने वाली और अपने पति का अनुसरण करने वाली स्त्रियां थीं. हिन्दू धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करें तो पता चलेगा कि शुरू से ही स्त्रियों के साथ छल होता आया है.

जब भी कभी कोई निर्णायक मोड़ आया तो सजा स्त्रियों को ही मिली. जिस प्रचलित कहानी के पात्र के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा बताया जाता है; उस भारत की माता यानी शकुंतला से राजा दुष्यंत ने प्रेम किया और गंधर्व विवाह भी किया. लेकिन अपने राज्य जाकर उन्हें भूल गए. जब शकुंतला उनके पास अपना हक मांगने पहुंची तो वह एक अंगूठी, जिसे दुष्यंत ने शकुंतला को निशानी के तौर पर दी थी के ना होने पर उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया. यह कैसा प्रेम था कि सिर्फ एक अंगूठी के ना होने पर राजा दुष्यंत ने अपनी प्रेमिका/पत्नी को पहचाना तक नहीं.

इसी प्रकार हिन्दू धर्मग्रंथों में प्रचलित कहानी के मुताबिक इंद्र ने जब छल से अहिल्या के साथ संबंध स्थापित किया तो अहिल्या के ऋषि पति ने उन्हें पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया,. जबकि इंद्र को मिली सजा कुछ ही दिनों में माफ हो गई. क्या ये पुरूष-स्त्री के बीच का पक्षपात नहीं था? अहिल्या के साथ छल इंद्र ने किया था लेकिन सजा सिर्फ अहिल्या को क्यों? क्योंकि वह एक स्त्री थी? सीता जो हमेशा अपने पति के साथ खड़ी रहीं, उनके साथ वनवास गईं, राम से बदला लेने का निमित्त बन रावण द्वारा हर ली गईं. मात्र एक प्रजा के कहने पर राम ने उन्हें गर्भवती अवस्था में वन में छोड़ दिया. बाद में अपने पुत्रों का अपना होने का प्रमाण भी मांगा. ऐसे में राम से अच्छा तो रावण था जिसने सीता को उनकी इच्छा के विरुद्ध छुआ तक नहीं.

एक खास वर्ग के लोग राम को मर्यादा पुरुषोतम कहते हैं तो क्या उस वर्ग के सभी पुरुषों को अपनी स्त्रियों के साथ राम के जैसा ही व्यवहार करना चाहिए. लक्ष्मण जिन्होंने भातृ प्रेम की मिसाल स्थापित की, उन्होंने अपनी पत्नी के साथ क्या किया. भाई का फर्ज निभाने में वह पति का फर्ज भूल गए. महाभारत की नायिका द्रौपदी के साथ जो हुआ वो सर्वविदित है. क्या वह कोई वस्तु थीं, जिसे कुंति ने कहा कि सभी भाईयों में बांट लो. क्या पत्नी भी कोई बांटने की चीज है? इस तरह के कई उदाहरण हिन्दू धर्म ग्रंथों में भरे मिलेंगे, जहां आदर्श स्थापित करने के नाम पर स्त्रियों के साथ पक्षपात हुए. मगर इन सबके बावजूद इन स्त्रियों के जीवन चरित्र को हम गहराई से अध्ययन करें तो पाएंगे कि चाहे इनके साथ कितने भी पक्षपात हुए हों, इनका अपना एक अलग व्यक्तित्व था. इन्होंने तभी तक सहा जब तक इनके आत्म सम्मान को ठेस नहीं पहुंची थी. जब इनके आत्म सम्मान को ठेस पहुंचाने की बात हुई, इन्होंने बगावत की. उन्होंने एक पुरुष प्रधान समाज में अपनी गरिमा, अपनी पहचान को बनाए रखा.

द्रौपदी का चरित्र हमेशा विद्रोहीणी का रहा और ये सर्वविदित है कि महाभारत में युद्ध की जड़ में द्रौपदी ही थी. इसी तरह जब राम ने सीता के चरित्र पर ऊंगली उठाते हुए उनके पुत्रों का उनके होने का सबूत मांगा तो बजाए सबूत देने के सीता ने धरती में समा जाना बेहतर समझा. यह उनके चरित्र की दृढ़ता ही थी कि उन्होंने राम को मांफी भी मांगने का अवसर नहीं दिया. ये सारे पात्र काल्पनिक हैं या यथार्थ यह एक अलग तर्क है मगर जिन स्त्रियों का उल्लेख किया गया उन्होंने यह साबित किया कि स्त्री चाहे जिस काल में भी हो उसके लिए अपने आत्म सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं होना चाहिए.

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