दलित साहित्य बेचने वाले के साथ हिंदूवादी संगठनों ने की मारपीट

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छतरपुर (एमपी)। राकेश कुशवाहा छतरपुर के महाराजा गोर्वमेंट कॉलेज के गेट नंबर चार के सामने दलित दस्तक पत्रिका, दास प्रकाशन और सम्यक प्रकाशन की पुस्तकें और अन्य दलित साहित्य और पत्रिकाए बेचते हैं. उनका दलित साहित्य और पत्रिका बेचना हिंदूवादी संगठनों को रास नहीं आ रहा था. इसलिए हिंदूवादी संगठन आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और भाजपा के लोगों ने राकेश कुशवाहा से मारपीट की. इतना ही नहीं उन लोगों ने दुकान के मालिक को भी धमकी देकर उनसे दुकान खाली करवाने को भी बोला.

हिंदूवादी संगठनों ने पुलिस को बुलाकर उसपर सामाजिक व्यवस्था बिगाड़ने का आरोप भी लगाया. छतरपुर कोतवाली के सीनियर इंस्पेक्टर आरएन पटेरिया उसे मारते-पीटते थाने लेकर गए. राकेश कुशवाहा ने दलित दस्तक को बताया कि एसआई ने उन्हें जातिसूचक गालियां दी और उन्हें दुकान बंद करने की धमकी देकर जेल में बंद कर दिया. 24 घंटे के बाद ही पुलिसवालों ने कुशवाहा की जमानत स्वीकार की.

राकेश कुशवाहा कॉलेज के सामने एक किराए की दुकान चलाते है और दुकान के पीछे ही उनका घर है. दुकान पर वह सिर्फ दलित साहित्य की किताबें और पत्रिकाएं ही बेचते हैं. लेकिन भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी का कार्यकर्ता अचल जैन, आरएसएस का अमित तिवारी और भाजपा के कार्यकर्ता भरत साहू और जयप्रकाश उसकी दुकान पर आकर तोड़फोड़ करने लगे और दलित साहित्य न बेचने की धमकी देने लगे. जब राकेश ने विरोध किया तो उसके साथ मारपीट की.

इस मामले पर सम्यक प्रकाशन के संस्थापक शांति स्वरूप बौद्ध का कहना है कि दक्षिणपंथी लोग किताब लिखने वालों को कुछ नहीं बोलते, क्योंकि उनसे लड़ना उनके बस की बात नहीं है. लेकिन ये लोग गरीब विक्रेताओं को परेशान करते हैं और उनके साथ मारपीट करते हैं. ललई सिंह यादव जब सच्ची रामायण लेकर आएं तो हिन्दूवादी संगठनों ने इस किताब को बैन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी, लेकिन वो हार गए. हालांकि आज भी वे इस तरह के साहित्य को बेचने वाले गरीब अम्बेडकरवादियों को परेशान करते रहते हैं. यह घटना भी इसी तरह की घटना है. दलित दस्तक ने भी इस घटना की निंदा की है.

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