गांधीजी की चलती तो संविधान सभा नहीं पहुंच पाते डॉ. अम्बेडकर

यह आम धारणा है कि गांधी की कृपादृष्टि के कारण ही डॉ. अंबेडकर का संविधान सभा में प्रवेश सम्भव हो सका था. इतना ही नहीं यह भी प्रचारित है कि गांधी ने ही उन्हें स्वतंत्र भारत का पहला कानून मंत्री बनवाया था. इस धारणा को अधिकांश दलित बुद्धिजीवियों ने भी अपना रखा है बल्कि मैं तो यह कहना पसंद करूंगा कि लगभग सभी दलित इस धारणा के शिकार हैं क्योंकि इस धारणा के प्रतिवाद में किसी दलित द्वारा लिखा गया कोई भी लेख पढ़ने को तो नहीं मिला लेकिन पुष्टि में लिखा लेख जरुर पढ़ने को मिला. यह दुखद स्थिति है. गांधी का डॉ. अंबेडकर के प्रति वितृष्णा की सीमा तक विरोध जग-जाहिर है. गांधी जीवनपर्यन्त दलित-विरोधी वर्ण-व्यवस्था की पैरोकारी करते रहे. वह डॉ. अंबेडकर का विरोध ही इसीलिए करते थे क्योंकि वह वर्ण-व्यवस्था का सम्पूर्ण विनाश चाहते थे. गांधी की ज़िद्द डॉ. अंबेडकर के मिशन की राह में सबसे बड़ी बाधा थी. वर्ण-व्यवस्था को अक्षुण्ण रखने का सीधा तात्पर्य जातिगत श्रेष्ठता के वर्चस्व को बनाये रखना था. डॉ. अंबेडकर इसी वर्चस्व को समाप्त करना चाहते थे. गांधी के साथ पूरा हिन्दू समाज उनके जीवन में भी खड़ा था और आज भी खड़ा है. अंबेडकर के साथ पूरा दलित समुदाय उनके जीवन में भी नहीं था और आज भी नहीं है. यह दलित समुदाय की विडम्बना है. वे हिन्दुओं की मानसिक दासता की बेड़ी को काटना ही नहीं चाहते. उन्होंने गांधी की दलित-मसीहा की दुष्प्रचारित छवि को मान्यता दे रखी है. यह उनकी वैचारिक दरिद्रता का सबूत है.

वे सवाल करने की, जिज्ञासा करने की, आलोचना व आत्मालोचना करने की ज़रूरत नहीं समझते, इसीलिये अपनी तर्क-शक्ति को कुंठित कर रखा है. दूसरी तरफ, हिन्दू बुद्धिजीवियों ने दलित-विरोधी गांधी को सुनियोजित ढ़ंग से महिमामंडित करने का अभियान चला रखा है. वे उनकी दलित-मसीहा की छवि गढ़ने में सफल भी हो रहे हैं. इस लेख का उद्देश्य इसी धूर्तता का पर्दा फ़ाश करके पाठकों और उनके माध्यम से जनसामान्य को वास्तविकता को बताना है.

प्रायः सम्पूर्ण बौद्धिक जगत अब तक इस तथ्य से भिज्ञ हो चुका होगा कि गांधी के बाद महानतम भारतीय के चयन हेतु आउटलुक पत्रिका, सीएनएन-आईबीएन और टीवी चैनल 18 ने सम्मिलित रूप से एक सर्वेक्षण कराया था. इसमें डॉ. अंबेडकर महानतम भारतीय चुने गए थे. आउटलुक के उस अंक में पक्ष-विपक्ष में कई लेख थे. अंग्रेजी वाले अंक में सुधीन्द्र कुलकर्णी का भी “The Theology of Intolerance” शीर्षक से एक लेख था. इस लेख में गांधी का महिमामण्डन इस वाक्य के द्वारा किया गया हैः- It is a glowing tribute to the large-hearted and visionary leadership of Gandhiji that he prevailed upon Nehru and other senior Congress leaders to give an important responsibility to Ambedkar in drafting the Constitution and also to include him in independent India””””s first government as law minister. (page 58)

इसे हिन्दी में इस प्रकार अनुवाद किया जा सकता है-’’यह विशाल-हृदय और स्वप्नदृष्टा गांधीजी का अनुपम उपहार है कि उन्होंने नेहरू तथा अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को राजी करके अंबेडकर को संविधान-निर्माण की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी तो दिलवायी ही, स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में कानून मंत्री के रूप में शामिल भी करवाया.’’ उक्त लेख को पढ़कर मैंने ई-मेल के माध्यम से सुधीन्द्र कुलकर्णी को यह पत्र भेजकर उनसे उनके कथन के अभिलेखीय साक्ष्य की मांग की. पर अनुस्मारक देने के बाद भी सुधीन्द्र कुलकर्णी ने मेरे पत्र का उत्तर नहीं दिया. पत्रिका के उक्त अंक पर पाठकीय प्रतिक्रिया जानने के लिये जब मैने इन्टरनेट पर पता लगाने का प्रयास किया तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ. कुलकर्णी के लेख के विरोध में अनेकानेक पाठकों ने पत्र लिखे थे. उन्हीं में से दो पत्रों का अनुवाद/भावानुवाद यहाँ उदधृत किया जा रहा है.

पहला पत्र जो श्री संजीव भंडारकर ने मुम्बई से लिखा है, उसका आशय निम्नवत हैः-

कुलकर्णी की विचारधारा का कोई भी नेता/विचारक गांधी के बाद महानतम भारतीय की चयन सूची के शीर्ष 1000 लोगों में भी अपना नाम नहीं दर्ज करा सका. इसी कुंठा और हताशा के कारण वह डॉ. अंबेडकर पर अपना विष वमन कर रहे हैं. कुलकर्णी को यह सोचकर अपने आंसू पोंछना चाहिये कि जब नेहरू, पटेल, मंगेशकर, तेंदुलकर जैसे दिग्गज कहीं के नहीं रहे तो गोलवरकरों/हेडगेवारों/सावरकरों आदि का क्या हश्र होता? डॉ. अंबेडकर को प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) का अध्यक्ष बनाने में गांधी/नेहरू/पटेल की भूमिका का प्रचार आधुनिक भारत के इतिहास का सबसे बड़ा झूठ है. पैट्रिक फ्रेंच ने अपनी पुस्तक में इस तथ्य को बहुत स्पष्टता से रेखांकित किया है कि 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन से लेकर भारत की आजादी तक महात्मा का एक सूत्री एजेण्डा यह सुनिश्चित करना था कि कांग्रेस और ब्रिटिश डॉ. अंबेडकर को नेपथ्य में ढकेलकर किसी भी तरह मुख्यधारा में प्रवेश न करने दें. मुझे ऐसे किसी दृष्टान्त अथवा प्रगति की जानकारी नहीं है जिससे यह पता चल सके कि आज़ादी से लेकर अपनी मौत तक डॉ. अंबेडकर के लिये महात्मा का हृदय परिवर्तित हुआ हो.

दूसरा पत्र बेंगलुरु से नवीन ने लिखा था. इस पत्र के द्वारा उन्होंने बड़े विस्तार से संबंधित प्रकरण पर बिन्दुवार चर्चा करके झूठ का पर्दाफ़ाश किया है. इतना ही नहीं पत्र की समाप्ति में उन्होंने गांधी के पक्षकारों को उन्हें गलत साबित करने की चुनौती भी दी है. इसका भावानुवाद यहां दिया जा रहा हैः-

“संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर के शामिल होने को हमेशा गांधी का उनके झूठे प्यार से जोड़कर प्रचारित किया जाता है. भारतीय जनता पार्टी के ब्राह्मणीय मानसिकता से ग्रस्त पूर्वाग्रही प्रवक्ता एवं राजनीतिक प्रचारक यह भी दुष्प्रचार करते रहते हैं कि डॉ. अंबेडकर प्रारूप समिति के मात्र अध्यक्ष थे. संविधान निर्माण में उनका कोई योगदान नहीं है. इन झूठों को शायद यह भी पता नहीं है कि अध्यक्ष का मूलभूत दायित्व क्या होता है और वह इसका निर्वहन कैसे करता है. रामचन्द्र गुहा सरीखे कुछ स्वनामधन्य इतिहासकार डॉ. अंबेडकर को अपनाना तो चाहते हैं लेकिन बिना किसी साक्ष्य के इस पूर्वाग्रह का त्याग करने को तैयार नहीं हैं कि गांधी के कारण ही डॉ. अंबेडकर संविधान सभा में प्रवेश पा सके थे.”

इसके बाद उनके द्वारा घटनाक्रमों को जिस प्रकार सूचीबद्ध किया गया है, वे इस प्रकार हैं:-

1. कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य उत्पन्न राजनीतिक गतिरोध को समाप्त करने में जब कैबिनेट मिशन को सफलता नहीं मिली तो जुलाई 1946 में ब्रिटिश भारत के अधीन प्रान्तीय विधान सभाओं के चुनाव कराये गये. इन विधान सभाओं द्वारा संविधान सभा के लिये 296 सदस्यों का चुनाव किया गया. इस संख्या का निर्धारण लगभग दस लाख की आबादी के पीछे एक सदस्य का अनुपात था. संविधान सभा की शेष सीटों को देसी राजे-रजवाड़ों के प्रतिनिधियों के नामांकन से भरा जाना था.

2. इस चुनाव में कांग्रेस और वामपंथियों ने गठजोड़ करके डॉ. अंबेडकर और उनके ’शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन’ को चुनाव में हरा दिया. सरदार पटेल के निर्देश पर प्रधानमंत्री बी.जी. खेर के नेतृत्व में कांग्रेस ने यह सुनिश्चित किया कि डॉ. अंबेडकर बाम्बे से चुनकर संविधान सभा में जाने न पायें.

3. लेकिन बंगाल के नामशूद्रों ने इस खतरे को भांप लिया और हमारे महान नेता महाप्राण जोगेन्द्र नाथ मंडल (मुकुन्द बिहारी मलिक के सहयोग से) जो जैसुर और खुलना (अविभाजित बंगाल) से नामित हुए थे, ने अपनी सीट से इस्तीफा देकर डॉ. अंबेडकर के लिये 296 सदस्यीय संविधान सभा में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया.

4. डॉ. अंबेडकर पांच स्थान्तरणीय मत (Transferable votes) पाकर अविभाजित बंगाल विधान सभा से विजयी हुए. (जीत के लिये न्यूनतम चार मतों की ज़रुरत थी) इसलिये यह कहा जाता है कि डॉ. अंबेडकर को वोट देने वालों में एंग्लो इंडियन सदस्य, कुछ निर्दलीय दलित और सम्भवतः मुस्लिम लीग के सदस्य थे.

5. ‘शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन’ के सदस्य के रूप में संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर एकमात्र दलित प्रतिनिधि थे.

6. डॉ. अंबेडकर का बंगाल से कोई विशेष सम्पर्क नहीं था फिर भी वह वहां से चुनाव लड़ने के लिये बाध्य हुए क्योंकि उन्हें उनके गृहप्रान्त से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला.

7. दलितों के अधिकारों और प्रतिनिधित्व को लेकर डॉ. अंबेडकर और कांग्रेस के बीच 1940 के पूरे दशक में तीखी झड़पें चलती रहीं. डॉ. अंबेडकर कांग्रेस के कटु एवं असमर्पणकारी आलोचक थे क्योंकि उनका मानना था कि इस पार्टी की अनेक नीतियां दलितों और आदिवासियों के हित में नहीं हैं.

8. इस वैमनस्य के बावजूद एक बार संविधान सभा में पहुंच जाने के बाद राष्ट्रीय घोषणा-पत्र तैयार करने के लिये डॉ. अंबेडकर ने कांग्रेसजनों के साथ मिलकर काम किया. संविधान सभा के लिये कांग्रेस से नामित अधिकांश सदस्यों का संविधान सम्बन्धी ज्ञान अत्यन्त सीमित था. कांग्रेस ने उनका चुनाव मात्र इसलिये किया था क्योंकि वे कांग्रेसी थे और पूर्व में जेल की सज़ा काट चुके थे.

9. डॉ. अंबेडकर का व्यावसायिक दृष्टिकोण, संविधान का उत्कृष्ट व विशद ज्ञान और एक अखंड व शक्तिशाली भारत को देखने की चाहत ने कांग्रेसी सहित अनेक सदस्यों को प्रभावित किया. इसके चलते काग्रेस और डॉ. अंबेडकर के बीच के रिश्ते थोड़ा बेहतर हुए.

10. लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेसियों के मन में उनके प्रति द्वेष-भावना बनी रही जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्वी बंगाल के विभाजन के समय देखने को मिला.

11. विभाजन के लिये तय नीति के अनुसार पाकिस्तान/पूर्वी बंगाल प्रान्त के जिस निर्वाचन क्षेत्र में मुसलमानों की आबादी 50 प्रतिशत से अधिक हो उसे पाकिस्तान/पूर्वी बंगाल को दिया जाना था. जैसुर और खुलना जिसका प्रतिनिधित्व डॉ. अंबेडकर कर रहे थे, में मुसलमानों की आबादी 48 प्रतिशत तथा हिन्दुओं/अधिसंख्यक दलितों की आबादी 52 प्रतिशत थी. विभाजन की नीति के अनुसार इसे भारत में रहना चाहिये था लेकिन कांग्रेस ने कुत्सित चाल चलकर इसे पूर्वी बंगाल को दे दिया, जिसके कारण तकनीकी रूप से डॉ. अंबेडकर पाकिस्तानी संविधान सभा के सदस्य बन गये. डॉ. अंबेडकर ने पूर्वी बंगाल की सीट से इस्तीफा दे दिया. उनका कहना था कि उनके अधिकतर लोग भारत में रहते हैं, इसलिये उनका पाकिस्तानी संविधान सभा में रहने का कोई मतलब नहीं है. जैसुर और खुलना को पूर्वी बंगाल को देने के बाद कांग्रेस मुस्लिम बहुल क्षेत्र मुर्शिदाबाद को इस थोथी दलील के आधार पर भारत में लेने के लिये अड़ गयी कि वह सम्पन्न है तथा यहां से होकर गंगा बहती है, जिससे भविष्य में सिंचाई परियोजनाओं के विकास में मदद मिलेगी. आज मुर्शिदाबाद पश्चिम बंगाल का हिस्सा है.

12. सवाल यह उठता है कि मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद को लेकर और हिन्दू बहुल जैसुर व खुलना को देकर क्या हम समृद्धिशाली हो गये?

13. मुर्शिदाबाद कभी सिल्क का फलता-फूलता औद्योगिक केन्द्र हुआ करता था और नवाबों के शासन काल के अधीन अठारहवीं सदी में बंगाल की राजधानी था, लेकिन आज इस जिले में सम्पूर्ण भारत की तुलना में गरीबों की संख्या सब से अधिक है. भारत की ग्रामीण आबादी का लगभग 1.47 प्रतिशत भाग पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में आबाद है. जिले में लगभग तीस लाख लोग तथाकथित गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने को अभिशप्त हैं. यह इस जिले की ग्रामीण आबादी का 56 प्रतिशत है और पूरे देश में सब से अधिक है. जबकि खुलना, जिसे बंगला देश को दे दिया गया था, आज वहां का तीसरा सबसे बड़ा जिला और एक बड़े व्यावसायिक धुरी के रूप में स्थापित है. निश्चित रूप से भारत के लिये यह एक बुरा सौदा साबित हुआ.

14. डॉ. अंबेडकर ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता से मुलाकात करके उन्हें अपने प्रति किये गये अन्याय से अवगत कराया. ब्रिटिश सरकार ने इस मुद्दे को बहुत गम्भीरता से लिया क्योंकि यह विभाजन के लिए निर्धारित नीति का उल्लंघन था. ब्रिटिश सरकार ने नेहरू को सूचित किया कि या तो जैसुर और खुलना को भारत में रहने दिया जाय अथवा डॉ. अंबेडकर को विभाजित भारत के किसी अन्य स्थान से संविधान सभा में भेजने की व्यवस्था की जाय अन्यथा इस मुद्दे का हल निकालने में समय लग सकता है और इससे विभाजन की प्रक्रिया भी विलम्बित होगी. चूंकि यह मामला सीधे-सीधे मुस्लिम लीग के साथ तय किये गये विभाजन की नीति से धांधलेबाजी का था, कांग्रेस को यह भांपने में देर नहीं लगी कि पहले से ही खूनी हिंसा से ग्रस्त विभाजन की प्रक्रिया पर इससे और बुरा असर पड़ेगा.

15.कांग्रेस की योजना मावलंकर को संविधान सभा का अध्यक्ष बनाने की थी. मावलंकर संविधान सभा के सदस्य नहीं थे. कांग्रेस ने पुणे निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित सदस्य न्यायविद जयकर से इस्तीफा ले लिया ताकि मावलंकर को उनकी जगह संविधान सभा में भेजा जा सके.

16. लेकिन जैसुर और खुलना सहित वहां से निर्वाचित डॉ. अंबेडकर के साथ किये गये अन्याय को लेकर ब्रिटिश सरकार की गम्भीर चिन्ता और उससे विभाजन प्रक्रिया पर मुस्लिम लीग के साथ पैदा होने वाले खतरे का भान कांग्रेस को हो चुका था.

17. पाकिस्तान-विभाजन को लेकर कांग्रेस का अनुभव सुखद नहीं था. तमाम हाथ-पांव मारने के बाद भी उसे मुस्लिम लीग के सामने मुंह की खानी पड़ी थी और वह भारत-विभाजन को रोक नहीं पायी थी. इसलिये वह नहीं चाहती थी कि अनुसूचित जातियों/जनजातियों के पृथक प्रतिनिधित्व को लेकर उसके सामने ’पूना समझौता’ के पूर्व की स्थिति पुनः उत्पन्न हो जाये. डॉ. अंबेडकर जैसे शक्तिशाली आलोचक का सामना करना उसके लिये आसान नहीं था. इस समस्या के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिये डॉ. अंबेडकर को किसी निर्णायक प्रक्रिया से जोड़ना अपरिहार्य हो गया था.

18. कांग्रेस के अन्दर कुछ ऐसे सदस्य थे जो संविधान सभा के 1946 के कार्यकाल में डॉ. अंबेडकर के साथ काम कर चुके थे और उनके व्यावसायिक दृष्टिकोण, संविधान पर उनके गहरे और विस्मयकारी ज्ञान से चमत्कृत थे और संविधान-निर्माण में उनके साथ काम करना मनोनुकूल समझते थे.

ऐसे में जब कांग्रेस किसी संविधान-विशेषज्ञ के लिये दूसरे देशों की तरफ देख रही थी, डॉ. अंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘स्टेट्स एण्ड माइनारिटीजः व्हाट आर देयर राइट्स ऐण्ड हाउ टू सिक्योर देम इन द कांस्टीट्युशन ऑफ फ्री इंडिया’ की रचना भारत के संयुक्त गणराज्य के संविधान के रूप में की थी. इसे वह संविधान सभा को उपलब्ध कराना चाहते थे लेकिन इसके पूर्व ही यह पुस्तक की शक्ल से सभी कांग्रेस सदस्यों के पास पहुंच चुकी थी. उन्होंने डॉ. अंबेडकर के काम की सराहना की और उनके उत्कृष्ट ज्ञान के कायल हो गये. हमारे संविधान की बुनियाद में आज यही पुस्तक है. दूसरी तरफ संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर की अपरिहार्यता और एक अत्यन्त उपयोगी सदस्य के रूप में उनकी आवश्यकता को सभी समझने लगे थे. उनको अहसास हो चुका था कि डॉ. अंबेडकर के ज्ञान का लाभ प्राप्त किये बिना संविधान निर्माण का काम आगे नहीं बढ़ सकता. भारत स्वतंत्र तो हो सकता है लेकिन गणतंत्र नहीं बन सकता. ऐसी स्थिति में 30 जून 1947 को राजेन्द्र प्रसाद ने बाम्बे के प्रधानमंत्री बी.जी. खेर को पत्र लिखकर संविधान सभा के लिये डॉ. अंबेडकर का चुनाव सुनिश्चित करने का निर्देश दिया. इस पत्र के द्वारा प्रसाद ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि संविधान पर उत्कृष्ट ज्ञान के कारण यह सुनिश्चित करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर की सदस्यता को बनाये रखा जाय.

सम्बन्धित पत्र इस प्रकार है- ‘अन्य बातों के अलावा हमने यह (भी) अनुभव किया है कि संविधान सभा और विभिन्न समितियों जिनमें उन्हें नियुक्त किया गया, दोनों जगह डॉ. अंबेडकर के काम का स्तर इतने उच्च कोटि का रहा है कि हम उनकी सेवाओं से स्वयं को वंचित नहीं कर सकते. जैसा कि आपको पता है वह बंगाल से चुने गये थे और उस प्रान्त के विभाजन के कारण अब वह संविधान सभा के सदस्य नहीं रहे. मेरी प्रबल इच्छा है कि वह संविधान सभा के अगले सत्र जो 14 जुलाई से शुरू होने जा रहा है, की कार्यवाही में हिस्सा लें.’

राजेन्द्र प्रसाद के अतिरिक्त सरदार पटेल जिन्होंने 1946 में बाबासाहेब के प्रवेश को अवरुद्ध किया था, ने भी बहुत गम्भीरता से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि बाबासाहेब अंबेडकर संविधान सभा में बने रहें. उसी दिन जिस दिन प्रसाद ने खेर को पत्र लिखा था, पटेल ने खेर से टेलीफोन पर बात करके डॉ. अंबेडकर का चुनाव सुनिश्चित करने के लिये शीघ्र कार्यवाही करने को कहा था. दूसरे दिन पटेल ने मावलंकर से यह कहकर उन्हें सांत्वना देने का प्रयास किया कि डॉ. अंबेडकर के चुनाव पर जल्द से जल्द कार्यवाही किये जाने की ज़रूरत थी और चूंकि एक ही सीट रिक्त थी इसलिये आपका चुनाव नहीं हो सका. पटेल ने मावलंकर को बताया कि यहां (संविधान सभा में) सभी लोगों का यह मानना है कि डॉ. अंबेडकर का रवैया बदल गया है और वह समिति के एक उपयोगी सदस्य रहे हैं. उन्होंने मावलंकर को समझाया कि उनके चुनाव की कोई बहुत जल्दी नहीं है और वादा किया कि अति शीघ्र एक सीट खाली होने वाली है और कांग्रेस इस पर उनके चुनाव की व्यवस्था करेगी. पटेल ने 3 जुलाई 1947 को मावलंकर को पत्र लिखकर अपने पूर्व कथन की पुष्टि करते हुए कहा- ‘हर व्यक्ति अंबेडकर को चाहता है.’ इस प्रकार कांग्रेस और अंबेडकर के बीच चल रही सन्धि-प्रक्रिया उस समय पूर्णता को प्राप्त हुई जब अंबेडकर सदस्य के रूप में संविधान सभा में लौटे और उनका जोरदार स्वागत हुआ.

लेकिन यह विचार सर्वस्वीकृत नहीं है कि डॉ. अंबेडकर के संविधान सभा में प्रवेश के पीछे गांधी की कोई भूमिका नहीं है. माउण्टबेटन ने बिना मांगे ही नेहरू को मंत्रिमण्डल गठन के लिये मंत्रियों की सूची के कई विकल्प दिये थे. इन्हीं में से किसी एक सूची में डॉ. अंबेडकर का नाम सुखद आश्चर्य की तरह हो सकता है. लेकिन उन्होंने यह कहीं नहीं प्रकट किया कि किसकी सम्मति से अंबेडकर को कैबिनेट स्तर का मंत्रिपद दिया गया. (इसका स्पष्ट कारण यही हो सकता कि चूंकि जैसुर-खुलना को लेकर कांग्रेस द्वारा विभाजन-नीति की धज्जी उड़ाये जाने पर ब्रिटिश सरकार द्वारा गम्भीर चिन्ता व्यक्त की गयी थी और इसलिए उसे पता था कि अंबेडकर का नाम प्रकट होने पर वह कड़ा विरोध करेगी.)

वैलेरियन रोड्रिग्ज ने अपनी पुस्तक ‘द एसेंशियल राइटिंग्स ऑफ बी.आर. अंबेडकर’ की भूमिका में इस विषय पर चर्चा करते हुए कहा है कि डॉ. अंबेडकर के प्रति गांधी की सदाशयी भूमिका की अभी तक कोई पुष्टि नहीं हुई है. धनंजय कीर का विश्वास है कि सरदार पटेल, एस.के. पाटिल, आचार्य डोंडे और नेहरू के सामूहिक प्रयास से डॉ. अंबेडकर मंत्रिमंडल में लिये गये थे. नेहरू द्वारा गांधी के सामने सूची प्रस्तुत करने पर उन्होंने उसका औपचारिक अनुमोदन भर किया था. इस औपचारिक अनुमोदन का आधार अंबेडकर के प्रति प्रेम न होकर यह रणनीति थी कि गन्ने के रस की तरह चूस कर उन्हें खुज्जी की तरह फेंक दिया जाये जैसा कि 1952 और 1954 के लोकसभा चुनावों में उनके साथ किया गया.

29 अगस्त 1947 को संविधान निर्माण के लिये एक समिति का गठन किया गया और डॉ. अंबेडकर को इसका अध्यक्ष चुना गया. इस समिति के एक सदस्य टी.टी. कृष्णामचारी का यह कथन ध्यान देने योग्य है- ‘यद्यपि प्रारूप समिति में सात सदस्य थे, (लेकिन) एक ने इस्तीफा दे दिया उसकी जगह दूसरा नामित हो गया. एक सरकारी कामों में अत्यधिक व्यस्त रहता था. बीमारी के कारण दो सदस्य दिल्ली से बहुत दूर (बाहर) रहते थे. परिणामस्वरूप डॉ. अंबेडकर को संविधान-निर्माण के बोझ को अकेले ही उठाना पड़ा. उन्होंने जो कार्य किया वह प्रशंसनीय है.’ विधि मंत्री के रूप में डॉ. अंबेडकर ने 4 नवम्बर 1948 को संविधान सभा के समक्ष संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया.

गांधी और डॉ. अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक दर्शन समान नहीं थे, दोनों कभी भी एक दूसरे के विचारों से सहमत नहीं हो सके. गांधी और कांग्रेस ने कभी भी डॉ. अंबेडकर के प्रति प्रेम का प्रदर्शन नहीं किया जिसकी पुष्टि संविधान निर्माण के बाद की एक घटना से होती है. 1952 में डॉ. अंबेडकर ने उत्तरी मुम्बई की लोक सभा सीट से चुनाव लड़ा था और अपने पूर्व सहायक एन.एस. काजोलकर से हार गये थे. कांग्रेस ने दलील दी कि डॉ. अंबेडकर सोशलिस्ट पार्टी के साथ थे, जिसने उन्हें धोखा दिया जबकि वास्तविकता यह थी कि हिन्दू कोड बिल के मुद्दे पर इस्तीफा देकर डॉ. अंबेडकर ने 1952 का लोकसभा का चुनाव लड़ा था और कांग्रेस ने उपजाति का कार्ड खेलकर उनके पूर्व सहायक एन.एस. काजोलकर को उनके खिलाफ खड़ा करके उन्हें चुनाव हरवा दिया.’ यह मामला यहीं पर नहीं रुका. बाद में कांग्रेस के समर्थन के बिना डॉ. अंबेडकर राज्य सभा के लिये चुन लिये गये. दुबारा 1954 में भंडारा सीट से लोक सभा का उपचुनाव लड़े और कांग्रेस ने उन्हें फिर हरवा दिया.

निष्कर्ष

डॉ. अंबेडकर के प्रति कांग्रेस और गांधी के तथाकथित प्रेम के खंडन के प्रमुख बिन्दु.

गांधी क्या कर रहे थे जब …

(1) 1946 में कांग्रेस ने संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर का प्रवेश बाधित कर दिया था. यदि गांधी के मन में डॉ. अंबेडकर से संविधान तैयार करवाने की योजना होती तो उन्हें इतने घटिया तरीके से न हरवाया जाता. संविधान तैयार करने का काम कोई बच्चों का खेल नहीं था और कांग्रेस/गांधी के पास निर्विवाद रूप से इतनी समझ तो थी ही कि जिस गुरुतर दायित्व को साकार करने के लिए 1946 में संविधान सभा का गठन किया गया था उसके लिये एक सुयोग्य, सक्षम तथा दक्ष व्यक्ति की आवश्यकता थी. फिर किसलिये कांग्रेस ने 1946 में बाबासाहेब का प्रवेश बाधित किया?

(2) जब डॉ. अंबेडकर योगेन्द्रनाथ मंडल और बंगाली नामशूद्र की मदद से संविधान सभा में पहुंच गये, तो गांधी/कांग्रेस ने उनकी सदस्यता को फिर से बाधित करने के लिये गंदा खेल खेला. आजादी के बाद विभाजन-नीति का मखौल उड़ाते हुए बाबासाहेब के प्रतिनिधित्व वाले जैसुर और खुलना को पूर्वी बंगाल को दे दिया और उसके बदले मुर्शिदाबाद को ले लिया जो आज सम्पूर्ण भारत में सबसे गरीब जिला है. क्या गांधी जैसुर और खुलना को जो आज बंगला देश की व्यावसायिक धुरी है, उसे इसलिये देने को तैयार हो गये थे ताकि बाबासाहेब संविधान सभा में प्रवेश करने से वंचित हो जायें? क्या देश महत्वपूर्ण था अथवा दलितों को प्रतिनिधित्व से वंचित रखने का पूर्वाग्रह, जैसा कि 1932 में पूना समझौते के समय किया गया गया था?

(3) यदि विभाजन-नीति का विधिसम्मत पालन करते हुए 50 प्रतिशत से अधिक हिन्दू आबादी वाले जैसुर-खुलना क्षेत्र जिनका प्रतिनिधित्व डॉ. अंबेडकर कर रहे थे, को भारत में शामिल कर लिया जाता तो आजादी के बाद कम्युनिस्ट शासित बंगाल में कराये गये लाखों नामशूद्रों का नरसंहार रोका जा सकता था.

(4) आज़ादी के मात्र दो महीने पहले जून 1947 में न्यायविद जयकर का पुणे निर्वाचन क्षेत्र में इस्तीफा लेकर मावलंकर को संविधान सभा का अध्यक्ष बनाने की कांग्रेसी योजना न होती.

(5) कांग्रेस/गांधी की योजना के अनुसार संविधान सभा का अध्यक्ष मावलंकर होते, चाहे कांग्रेस लॉबी का कोई अन्य सदस्य चाहे कोई विदेशी विशेषज्ञ, लेकिन इतना तय है कि 2 जून 1947 तक इस पद के लिए कांग्रेसी/गांधी की सूची में डॉ. अंबेडकर के नाम का कहीं कोई अता-पता नहीं था.

तथ्य

(1) कांग्रेस संविधान-निर्माण के लिए किसी विदेशी विशेषज्ञ की तलाश में थी और इसके उच्चजातीय चमचे मनु का संविधान लागू करवाना चाहते थे इसलिये संविधान सभा को नेतृत्व प्रदान करने के लिए वे कभी डॉ. अंबेडकर को पसंद कर ही नहीं सकते थे. डॉ. अंबेडकर ने देश को उत्कृष्ट संविधान दिया लेकिन हमेशा की तरह अनुसूचित जाति/जनजाति को भरमाने के लिए गांधी को उनका मसीहा बताया जा रहा है. इसे कुत्सित सौदेबाजी से प्रेरित राजनीति के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है?

(2)कांग्रेस ने डॉ. अंबेडकर के प्रति अपने वास्तविक प्रेम का प्रदर्शन 1952 और 1954 के लोक सभा चुनाव में किया था, जब उपजाति का राजनैतिक खेल खेलकर डॉ. अंबेडकर को हरवा दिया था. यदि कांग्रेस के मन में उनके लिए प्रेम था तो उनके विरुद्ध ऐसी चाल क्यों चली गयी? स्पष्ट है कि कांग्रेस का डॉ. अंबेडकर के प्रति कभी कोई लगाव नहीं था. उसने केवल डॉ. अंबेडकर के उत्कृष्ट ज्ञान का प्रयोग संविधान निर्माण में किया था. यह इस बात से भी पुष्ट होता है कि उन्हें 1990 के पहले तक भारत रत्न से सम्मानित भी नहीं किया गया था.

(3) यदि किसी व्यक्ति ने डॉ. अंबेडकर की सहायता की थी तो वह महाप्राण जोगेन्द्र नाथ मण्डल और बंगाल के नामशूद्र थे. जिन्होंने जैसुर-खुलना सीट से इस्तीफा देकर डॉ. अंबेडकर का संविधान सभा में प्रवेश सुनिश्चित किया था. उनके इस बलिदान का बदला स्वतंत्र भारत में ब्राह्मणीय और कम्युनिस्ट व्यवस्था में शासित प्रदेश बंगाल में लाखों नामशूद्रों का नरसंहार करके लिया गया. हमको इतिहास के पृष्ठ में गुम इस महान नेता के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए.

संपर्क- 9415303512, E-mail: smoolchand12@gmail.com

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