भारतीय प्रजातंत्र का खेल

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भारतीय प्रजातंत्र का यह अजब खेल है कि एनडीए एवं यूपीए दोनों ने ही दलित समाज के व्यक्ति को अपना राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है. एनडीए ने भाजपा के वरिष्ठ नेता/कार्यकर्ता, दो बार के राज्यसभा सांसद एवं बिहार के वर्तमान गवर्नर रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार घोषित किया है. दूसरी ओर यूपीए ने कांग्रेस की चार बार की लोकसभा सांसद एवं लोकसभा की पूर्व स्पीकर मीरा कुमार को उम्मीदवार बनाया है. याद रहे कि मीरा कुमार बाबू जगजीवन राम की पुत्री हैं, वही बाबू जगजीवन राम जिन्होंने सन् 1977 में कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया था.

वर्तमान समय में दो बड़े गठबंधन आखिर किसी दलित को राष्ट्रपति का उम्मीदवार क्यों बना रहे हैं, यह समझना बहुत कठिन है. हमें यह भी जान लेना चाहिए कि यूपीए की उम्मीदवार मीरा कुमार को बसपा की अध्यक्ष एवं वर्तमान में बहुजन समाज की मुख्य नेता मायावती का भी समर्थन मिल रहा है.

भाजपा ने दलित समाज के व्यक्ति को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार क्यों बनाया है, यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं लगता. हम सभी जानते हैं कि भाजपा भरसक प्रयास कर रही है कि किसी तरह से 2019 तक दलितों को बड़ी संख्या में अपनी ओर कर लिया जाए. विशेष कर उत्तर प्रदेश में. उसके लाख चाहने और दिखावा करने के बाद भी दलित उससे जुड़ नहीं रहा है. दूसरा, एक दलित को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बना कर भाजपा विपक्षियों एवं दलितों का मुंह बंद करना चाहती है ताकि उसे कोई दलित विरोधी न कह सके. तीसरी ओर, भाजपा उन दलितों का भी मुंह बंद करना चाहती है जो वर्तमान भाजपा की केंद्र एवं राज्यों की सरकारों में प्रभावी भागेदारी मांग रहे हैं. आज का दलित दिखावे के प्रतिनिधित्व से संतुष्ट नहीं है. वह चाहता है कि वह भी मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, केंद्र में रेलवे, वित्त, उद्योग आदि मंत्रालाय का मंत्री बने ताकि देश की नीति का निर्धारण कर सके.

भाजपा द्वारा एक दलित को अपनी ओर से राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाने की जो सबसे बड़ी वजह जानकार बताते हैं, वह है वर्तमान समय में दलितों में भाजपा की केंद्र एवं राज्य सरकारों के प्रति आक्रोश को शांत करना. कहीं न कहीं भाजपा को यह अहसास हो गया है कि दलित भाजपा एवं उसकी सरकारों के काम-काज से विरक्त हो रहे हैं. टूट रहे हैं. दलितों पर अत्याचार की बढ़ती घटनाओं ने उनके युवाओं को ज्यादा नाराज किया है. यह गुस्सा सोशल मीडिया पर ज्यादा दिखाई देता है. और साथ ही साथ सड़कों पर भी. इस दौरान भाजपा की सरकारों एवं दल ने दलितों को प्रताड़ित ही नहीं किया, बल्कि लज्जित भी किया है. सभी जानते है कि हैदराबाद में रोहित वेमुला के साथ क्या हुआ. जब उसकी मां ने न्याय के लिए गुहार लगाई तो भाजपा की केंद्र सरकार ने उन्हें उनकी जाति और पति को लेकर और भी लज्जित किया. ऊना में सरेआम गौ रक्षकों ने जिस प्रकार दलितों को रस्सी से बांधकर पीटा वह किसी भी प्रजातंत्र के लिए शर्मनाक वाक्या है, पर गुजरात की सरकार ने मुजलिमों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं की, जब बसपा अध्यक्ष मायावती ने संसद में और ऊना के दलितों ने सड़क पर हंगामा किया तब कहीं जाकर सरकार जागी, परंतु आज भी उन दलितों को न्याय नहीं मिला.

इसके बाद भाजपा के लीडरों की दलितों के प्रति वैमनस्यता तब सामने आई, जब उत्तर प्रदेश में उनके दल के लीडर ने बहुजन समाज की शीर्ष नेता मायावती पर ही अपशब्दों से हमला कर दिया. जब एक बार फिर दलितों ने संसद से सड़क तक हंगामा किया तो भाजपा ने दिखाने भर के लिए उस नेता को अपनी पार्टी से निकाला परंतु दूसरे ही क्षण उसकी पत्नी को दल में पद देकर एवं उत्तर प्रदेश विधानसभा में टिकट एवं मंत्रीपद देकर दलितों को लज्जित किया. उधर भाजपा के अध्यक्ष ने दलितों के साथ स्नान कर और कुछ दलितों के साथ खाना खाकर दलितों को कैमरे पर यह बताने की कोशिश की कि देखो आप कितने ‘निम्न’ हो फिर भी हम आपके साथ स्नान एवं खान-पान कर रहे हैं. ऊधर भाजपा के एक शीर्ष कैबिनेट मंत्री ने दलितों की तुलना कुत्ते से कर दी और उस पर कोई भी कार्यवाही नहीं हुई.

सर्वोपरि दलितों पर अत्याचार और लज्जित करने की घटना, एक बार पुनः उत्तर प्रदेश में हुई, जहां पर सहारनपुर में दलितों पर खुलेआम अत्याचार हुए और जब वहां के युवाओं ने उसके खिलाफ गुहार लगाई तो उनके ही खिलाफ केस दर्ज कर उनको जेल भेज दिया गया. इसी कड़ी में बांदा में जब दलितों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मिलने वाले थे तो वहां के दलितों को शैम्पू और साबुन देकर और नहाकर आने के लिए कहा गया. उपरोक्त सभी घटनाएं दलितों को एक ओर प्रताड़ित करती है और दूसरी ओर लज्जित. ऐसी स्थिति में आज का दलित यह सोच रहा है कि वो जाए तो जाए कहां. शायद इस गुस्से और विरक्ति का भान प्रधानमंत्री को भी है, और इसीलिए उन्होंने कहा कि आप मेरे दलित भाईयों को मत मारिए, मुझे मार लिजिए. पर दलित इस बयान से नाखुश है, क्योंकि उसको यह लगता है कि जब देश का प्रधानमंत्री विवश हो कर के न्याय दिलाने की जगह अपने ऊपर हमले को आमंत्रित करे तो दलितों के लिए क्या न्याय बचता है?

इस सामाजिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में रामनाथ कोविंद को प्रत्याशी बनाकर भाजपा यह जताना चाहती है कि देखो, हम दलितों का कितना ख्याल रखते हैं. हम उन्हें राष्ट्रपति तक बना रहे हैं. परंतु शायद भाजपा यह भूल रही है कि आज का दलित समाज उसकी चालों को भली भांति समझ रहा है. आज का दलित यह जानता है कि यद्यपि राष्ट्रपति का पद बहुत बड़ा है लेकिन वह दलितों के लिए कुछ नहीं कर सकता. उसे तो कैबिनेट की सलाह पर ही काम करना होता है. और वह यह जानता है कि कैबिनेट में दलितों की भागेदारी न के बराबर है. दलितों के पक्ष में निर्णय कैसे लिए जाएंगे आने वाले राष्ट्रपति के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती होगी.

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