पत्रिका के पांच साल और वेब चैनल के शानदार आगाज के गवाह बनें सैकड़ों लोग

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बामसेफ, डी. एस. फोर व बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक बहुजन नायक मान्यवर कांशी राम जी अपने भाषणों में अक्सर कहते थे कि अगर बहुजन समाज के पढे-लिखे नौकरी पेशा लोग अपना थोड़ा सा पैसा, थोड़ा सा समय और थोड़ा सा दिमाग भी समाज को दे दें तो हम इस देश में बहुत बड़ा आन्दोलन खड़ा करके अपनी सरकारें बनाकर समाज के प्रत्येक हिस्से के सभी अधिकारों को सुरक्षित रख सकते हैं. कांशी राम जी के इसी फार्मूले से पाँच साल पहले शुरू हुई “दलित दस्तक” पत्रिका आज अपने लाखों पाठकों के साथ जवानी की परवान चढ़ रही है और मुख्यधारा की मीडिया से टक्कर ले रही है. विगत 24 दिसंबर को दलित दस्तक ने अपना वेब चैनल भी लांच कर दिया. दलित दस्तक नाम से शुरू हुए इस वेब चैनल को यू-ट्यूब पर देखा जा सकता है. बहुजन नायकों, बहुजन आंदोलन और तथागत बुद्ध को समर्पित एक प्रोमो के जरिए वेब चैनल को लांच किया गया. इसकी लॉन्चिंग देश के संसद भवन के पास स्थित कॉस्टीट्यूशन क्लब के मावलंकर हॉल में हुई.

देश में प्रचलित छोटे-बड़े लगभग 800 चैनलों के बीच दलित दस्तक वेब पोर्टल भी सामने है. यहां दीगर बात यह है कि सामाजिक, राजनैतिक व धार्मिक क्षेत्रों के संघर्ष में दलित-बहुजन समाज में काफी अनुभव व उदाहरण नजर आते हैं, परन्तु मीडिया के क्षेत्र में बहुजन समाज ने सही ढंग से पदार्पण भी नहीं किया है तो फिर उदाहरण का तो सवाल ही नहीं उठता, हां पत्रकारिता क्षेत्र में उदाहरण मिल सकते हैं.

इतिहास में दर्ज होने लायक इस ऐतिहासिक घटना में मुख्य अतिथि चिन्तक व विचारक आनन्द श्री कृष्ण जी थे, जबकि वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश जी व बौद्ध चिन्तक बौद्धाचार्य शान्तिस्वरूप बौद्ध विशिष्ठ अतिथि के तौर पर शामिल हुए. विचारक, चिंतक व समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की. कार्यक्रम का संचालन दलित दस्तक के संपादक मंडल की सदस्य डॉ. पूजा और मुंबई में बतौर कलाकार काम करने वाले रंगकर्मी मानवेन्द्र ने किया.

श्रोताओं और दर्शकों से खचाखच भरे दिल्ली के संभ्रान्त क्लबों में एक कांस्टीटयुशन क्लब में यू.पी, उतराखण्ड, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, झारखंड, छतीसगढ़, पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र सहित तमाम अन्य हिस्सों से भी लोग मौजूद थे. कार्यक्रम की खास बात तमाम बड़े साहित्यकारों-लेखकों की मौजूदगी भी रही. सिर्फ सोशल मीडिया और फोन के माध्यम से बात करने भर से ही बहुजन समाज के पढ़े-लिखे विद्वानों, चिन्तकों, सामाजिक-धार्मिक कार्यकर्ताओं, लेखकों इत्यादि का दिल्ली और दिल्ली के बाहर से पहुंचना कुछ ना कुछ तो दर्शा रहा था. इस विषय पर बहुत से तर्क व विचार हो सकते हैं. इन सब के बीच में एक विचार यह भी है कि ये लोग किसी मनुवादी पार्टी के विरोध में नहीं या किसी अन्य के विरोध में नहीं बल्कि अपना कुछ ना कुछ बनाने के लिए एकत्रित हुए हैं.

इस रचनात्मक व सकारात्मक सुझबुझ में दलित -दस्तक का अहम रोल नजर आता है. इस दौरान अपने वक्तव्य में बौद्धाचार्य शांति स्वरूप बौद्ध ने ‘दलित-दस्तक’ पत्रिका की शुरूआत के बारे में और पत्रिका ने कैसे बुद्ध के धर्म को पाठकों तक पहुँचाने में योगदान दिया. मुख्य अतिथि आनन्द श्रीकृष्ण ने अशोक दास को दलित दस्तक के ईमानदार एवं सफल प्रकाशन के लिए 100 में से 100 नंबर दिए. उन्होंने कहा कि अमेरिका में काले लोग जब अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे तब वे भी अपनी मीडिया के माध्यम से अपने लोगों तक आन्दोलन पहुंचा रहे थे. उन्होंने कहा कि मीडिया के बिना आन्दोलन को कभी सफल नहीं बनाया जा सकता है. वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश जी ने बताया कि वर्तमान की हिन्दुत्व से ग्रसित राजनीति के विरोध में आम्बेडकारी विचारों से प्रभावित राजनीति में ठहराव सा नजर आता है लेकिन इस सभागार में उपस्थित जोश व तेज से लबालब भरे विद्वानों, लेखकों व सामाजिक कार्यकर्ताओं को देखकर लग रहा है कि यह ठहराव जल्द ही खत्म होगा.

 अपने जोशीले सम्बोधन में उर्मिलेश जी ने कहा कि आप आज जो सुन्दर सपने देख रहे हैं, उन सपनों की कसम कि आप लोग अपनी मीडिया स्थापित करने के उद्देश्य में जरूर सफल होंगे. मीडिया में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों की भागीदारी से सम्बन्धित विभिन्न सर्वे और आंकड़ों के आधार पर कहा कि मुख्यधारा की मीडिया में आज भी इनकी भूमिका नाम-मात्र ही है. अपने छात्र जीवन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब मैं इलाहाबाद युनिवर्सिटी में पढ़ता था तो भारत और दुनिया के तमाम छोटे-बड़े लेखकों की किताबें वहाँ आस-पास में मिलती थी लेकिन डॉ. अम्बेडकर से सम्बन्धित एक भी किताब नहीं मिलती थी. मुझे गर्व है कांशी राम जी के बहुजन आन्दोलन पर जिसकी वजह से आज सैकड़ों लेखक व लाखों पाठक पैदा हुए और साहित्य भी अब मिलने लगा. और कांशी राम जी के बहुजन आन्दोलन की वजह से दफनाए गए अम्बेडकर को फिर से बाहर निकाला जा सका. उन्होंने कहा कि मुख्यधारा के मीडिया जगत ने बहुजन समाज के लोगों और उनकी नस्लों के साथ नाइंसाफी की है, दलित-दस्तक पत्रिका और दलित दस्तक वेब पोर्टल इस नाइंसाफी को रोकेगा इसलिए दलित दस्तक से जुड़ें और अपना हक सुनिश्चित करें.

कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. विवेक कुमार ने दलित दस्तक पत्रिका की विचारधारा को समझाते हुए कहा कि पिछले पांच वर्षों के अंकों के कवर पेज को देखने और अन्दर के पेजों को पढ़ने से साफ-साफ पता चल जाता है कि पत्रिका की विचारधारा समता, स्वतन्त्रता, बंधुता और न्याय जो संवैधानिक मूल्य तथा उद्देश्य भी है पर आधारित हैं. उन्होंने कहा कि जिन्होंने समाज और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में भाग लिया या प्रयास किए हैं सिर्फ उन्हीं के बारे में पत्रिका ने कार्य किया है. ‘दलित’ शब्द के बारे में उन्होंने बताया कि जब ‘दि हिन्दू’ अखबार चल जाता है तो दलित क्यों नहीं चल सकता. ‘दि हिन्दू’ को सिक्ख, ईसाई, मुस्लिम, जैन, यहूदी, पारसी, बौद्ध इत्यादि धर्म के लागे खरीद कर पढ़ सकते हैं तो दलित दस्तक क्यों नहीं पढ़ सकते. ‘दि हिन्दू’ अखबार खरीदते समय उनके दिमाग में अखबार व उसकी क्वालिटी होती है उसका धर्म नहीं. ठीक इसी प्रकार दलित-दस्तक पत्रिका खरीदते समय पत्रिका व उसकी क्वालिटी होनी चाहिए उसके वर्ग या जाति की पहचान नहीं. बहुजन आन्दोलन जो है वो एक बहुत बड़ी अवधारण है, वो बहुत बड़ी चीज है. इसको दलित-दस्तक सहारा देगा. दलित-दस्तक का उद्देश्य दलितों के इतिहास व संस्कृति तथा उनके नायकों व नायिकाओं की पुर्नस्थापना करना है. और पत्रिका ने विचारधारा के आधार पर विचारों को निर्मित करके उनको बहुजन समाज तक पहुंचाया भी है.

डॉ. विवेक ने आगे कहा कि विचारकों, बुद्धिजीवी, लेखकों, चिन्तकों, शोधार्थियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठी यह विशाल भीड़ अपने आप में यह सबूत दे रही है कि पत्रिका में छपे विचारों से लाभ ले रहे हैं और पत्रिका की क्वालिटी, दिशा, एजेण्डा इत्यादि के दुरूस्त होने का प्रमाण भी है. इस पोर्टल की विचारधारा व मूल्य वही होंगे जो ‘दलित-दस्तक’ पत्रिका के हैं.

संपादक अशोक दास ने नया प्रयोग करते हुए खुद वहां उपस्थित लोगों के बीच जाकर उनसे बात की. उन्होंने कहा कि यहां कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद हैं. सबको मंच पर बुलाना संभव नहीं है और वह खुद ही दर्शकों के बीच में पहुंच गए. उन्होंने जय प्रकाश कर्दम, डॉ. कौशल पंवार, डॉ. राजेश पासवान, राजेंद्र कश्यप, डॉ. एस.एन. गौतम सहित कार्यक्रम में मौजूद तमाम गणमान्य लोगों से पत्रिका के बारे में उनकी राय पूछी. इस दौरान तमाम पाठकों, वितरकों और प्रचारकों को भी अपनी बात रखने का मौका दिया गया. कार्यक्रम में देहरादून से अनिल कुमार और हरिदास जी के साथ दून बुद्धिस्ट सोसाइटी के सात सदस्य पहुंचे थे, तो आगरा से सोबरन सिंह और उनके साथी आए थे. कार्यक्रम में देश के तमाम हिस्सों से तमाम लोग मौजूद थे.

कार्यक्रम के अंत में पिछले पांच वर्षों के दौरान जुड़े रहने वाले वितरकों, प्रचारकों और लेखकों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया. कार्यक्रम का संचालन रंगक्रर्मी मानवेन्द्र व डॉ. पूजा राय जी ने बहुत ही सुन्दर ढंग से किया. चैनल लॉन्चिंग के बाद अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने दलित दस्तक को सैंकड़ों कारपोरेट और बाजारू मीडिया चैनलों के तूफान के बीच बहुजन समाज के लोगों के लिए दिए के समान बताया. संपादक अशोक दास ने देश भर से आए सभी मेहमानों का स्वागत किया और कार्यक्रम में आने के लिए आभार जताया.

नोट- कार्यक्रम में मौजूद नहीं रहने वाले पत्रिका के पाठक और शुभचिंतक कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट YOU TUBE पर DALITDASTAK के चैनल पर जाकर देख सकते हैं।

रिपोर्ट- विनोद कुमार

शोधार्थी

म.क. भावनगर यूनिर्वसिटी भावनगर

गुजरात

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