दलितों के हक का हिसाब लेने में जुटे हैं जाधव

0
2895

1953 में महाराष्ट्र में जन्मे जाधव ने अपने बड़े भाई के मार्गदर्शन में शुरू में ही तय कर लिया था कि उन्हें पब्लिक सेक्टर में काम करना है. वजह था दलित समाज का उत्थान, जो सिस्टम में रहकर ही किया जा सकता था. इसी जुनून और जिद्द कि वजह से उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय के कुलपति का पद मिलने पर सालाना सवा करोड़ की नौकरी ठुकरा दी, ताकि दलितों से अमानवीय व्यवहार करने वाले पुणे शहर में समाजिक न्याय की मशाल जला सकें. तब उन्होंने जो किया वो इतिहास में दर्ज हो चुका है. फिलहाल वो सरकारी मंत्रालयों और राज्यों में दलित हित के फंसे हजारों करोड़ रुपयों को बाहर निकालने में लगे हैं. बीती उपलब्धियों और वर्तमान चुनौतियों पर ‘दलितमत.कॉम’ के संपादक अशोक दास ने उनसे विस्तार से बातचीत की. जाधव साहब भी सारे सवालों पर खुल कर बोलें. पेश है……

विषमता और भेदभाव को लेकर आपने काफी काम किया है. आपने इसी विषय को क्यों चुना?

– जिस बैकग्राउंड से मैं आता हूं यह विषय मेरे दिल के बहुत करीब है क्योंकि मैं एक दलित परिवार में जन्मा हूं. प्रतिकूल परिस्थिति पर काबू पाकर लगातार संघर्ष करते हुए आगे बढ़ा हूं. तो ये जो विषय है ये मेरे दिल से बहुत जुड़ा हुआ है.

योजना आयोग के सदस्य के तौर पर आपको दो साल हो गए. इस वक्त में अपने काम का आकलन आप कैसे करते हैं. क्या आप अपनी भूमिका को लेकर संतुष्ट हैं.

– बिल्कुल संतुष्ट हैं. प्लानिंग कमीशन में मेरी जिम्मेदारी बहुत विस्तृत है. यहां आने के बाद इन जिम्मेदारियों में मैं बहुत कुछ कर पाया हूं. सबसे पहले तो आपको अपनी जिम्मेदारी का अहसास करना होता है. योजना आयोग में मुझे जो जिम्मेदारी दी गई है वो बहुत ही ज्यादा है. किसी और सदस्य को इतना ज्यादा दायित्व नहीं मिला है. यहां हरेक सदस्य को कुछ विषय दिए जाते हैं जिसके संबंध में उसे हर राज्य में उन विषयों को देखना पड़ता है. उसी तरह कुछ राज्य भी दिए जाते हैं, जिनमें हर विषयों का ख्याल रखना होता है. मेरे पास चार सेक्टर हैं. इनमें पहला शिक्षा, दूसरा लेबर, इंप्लाइमेंट और स्किल डेवलपमेंट, तीसरा स्पोर्ट्स और यूथ अफेयर, चौथा जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, वो सोशल जस्टिस एंड इमपावरमेंट है. जहां तक राज्यों का ताल्लुक है मेरे पास बिहार, तामिलनाडु, गोवा साथ ही दो यूनियन टेरिटरी दादरा, नगर हवेली और दीव दमन है.

मैं सोशल जस्टिस एंड इमपावरमेंट के बारे में बताना चाहूंगा. योजना आयोग का एक काम सारे खर्च के लिए राशि का आवंटन करना है. यहां आने के बाद मैने देखा कि सोशल जस्टिस और इंपावरमेंट की जो मिनिस्ट्री है, उसके लिए जो राशि आवंटित की जाती थी वह बेहद कम थी. एकदम नाम मात्र था. मै 2009 में आया. मेरे आने से पहले 2002 से लेकर 2009 तक सामाजिक अधिकारिता एवं न्याय के लिए जो बजट था वो 1800 करोड़ से 2500 करोड़ रुपये तक पहुंचा था. मैने महसूस किया कि देश की एक बहुत बड़ी आबादी के कल्याण से संबंधित विभाग के लिए यह पैसा काफी कम था. मेरा सबसे पहला लक्ष्य इसे बढ़ाना था. क्योंकि अभी तक जो बढ़ोतरी हो रही थी वो बहुत कम हो रही थी. सब देखने के बाद जो मैने सबसे पहला मुद्दा उठाया वो ये था कि यह रकम बहुत कम है और इसमें बहुत बढ़ोतरी की जरूरत है.

मुझे खुशी है कि मेरे योजना आयोग जाने के पहले तीन महीनों में बजट के दौरान हम सोशल जस्टिस का बजट 2500 करोड़ से बढ़ाकर 4500 करोड़ रुपये तक ले गए. यानि पहले साल में ही इसके बजट में 80 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. मुझे इस बात की बेहद खुशी है. आप उस वक्त वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बजट भाषण पर ध्यान देंगे तो उन्होंने इसमें कहा था कि ‘मुझे बहुत खुशी है कि हम सामाजिक न्याय के लिए इतना ज्यादा बजट दे रहे हैं. अब हम दलित विद्यार्थियों को मिलने वाली छात्रवृति की रकम में भी वृद्धि कर सकते हैं क्योंकि अब बजट बढ़ गया है.’ मैं मानता हूं कि यह मेरी पहली उपलब्धि थी, जो बेहद महत्वपूर्ण थी.

दूसरे साल में मैने इसे 4500 से 5000 करोड़ रुपये करवाया और तीसरे साल में और बढ़वाने की कोशिश है. मैं इसके लिए क्रेडिट लेता हूं क्योंकि जो मेरे आने के पहले कई सालों में नहीं हुआ वो मैने किया तो मुझे क्रेडिट लेने का हक है. क्योंकि राशि बढ़वाने के लिए वहां टेक्निकल आधार पर बहस करनी पड़ती है. भावनात्मक भाषण का कोई मोल नहीं है. जब पैसे का आवंटन होता है तो डिप्टी चेयरमैन और तमाम लोगों के सामने तमाम तथ्यों और तकनीक रखकर तर्क देना होता है कि आखिर बढ़ोतरी क्यों जरूरी है. तब जाकर बढ़ोतरी मिल पाती है. मैने यह काम किया.

एससी/एसटी कल्याण कोष के बारे में अपनी रिपोर्ट में आपने आरोप लगाया था कि 35 साल पहले इसकी शुरुआत से अब तक इसका सही उपयोग नहीं हो पाया और तमाम धांधली हुई है.

– 1975 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी तो उन्होंने Tribal Sub Plan की शुरुआत की थी. 1979 में उन्होंने ही Scheduled Cast Sub Plan को शुरू किया. बड़ी हैरत और दुख की बात है कि इतना अरसा बीत जाने के बाद भी इस पैसे का सही इस्तेमाल नहीं हुआ था. इसमें योजना आयोग ने गाइडलाइन भी दिया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति की देश में जितनी जनसंख्या है, उनके लिए उसी हिसाब से पैसे का आवंटन किया जाना चाहिए. जैसे अनुसूचित जाति की जनसंख्या 16.2 फीसदी है तो सभी केंद्रीय मंत्रालयों को इस वर्ग के लिए बजट में कम से कम 16.2 फीसदी हिस्सा खर्च करना चाहिए. ऐसे ही जनजातियों के लिए 8.2 फीसदी है.

योजना आयोग की दूसरी गाइड लाइन के मुताबिक हर मंत्रालय को एक अलग अकाउंट बनाने का नियम है, जिसमें अनुसूचित जाति और जनजाति कल्याण का पैसा जमा होगा. यह भी साफ है कि यह पैसा किसी भी दूसरे काम में खर्च नहीं किया जा सकता. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इसके बावजूद 35 साल में केंद्र के 68 मंत्रालयों में से इस साल तक सिर्फ एक सामाजिक अधिकारिता एवं न्याय मंत्रालय को छोड़कर किसी भी मंत्रालय ने अलग अकाउंट नहीं खोला था. यहां तक की Tribal Ministry ने भी यह अकाउंट नहीं खोला था. इसके साथ ही जिन मंत्रालयों को एससी/एसटी सब प्लान के लिए जो पैसे देने थे, वहां भी उन्होंने बहुत कम सिर्फ नाम के लिए इस मद में पैसे दिए थे. जो हालत यहां केंद्र सरकार में है वही हालात राज्यों में भी है. यहां भी नियमों की अनदेखी की जा रही है. राज्यों में भी वही गाइडलाइन है कि हर राज्य अपने यहां अनुसूचित जाति एवं जनजाति की संख्या के मुताबिक उनके कल्याण के लिए राशि का आवंटन करेगा. जैसे पंजाब में 29 फीसदी दलित हैं तो वहां दलितों के कल्याण के लिए बजट का 29 फीसदी खर्च होना चाहिए. लेकिन कहीं भी इसको प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है.

हाल ही में खबर आई थी कि मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण कोष के पैसे से सड़क और बांध बन रहे हैं तो वहीं पिछले दिनों दिल्ली सरकार द्वारा कॉमनवेल्थ में इस कोष से 700 करोड़ रुपये खर्च करने की बात सामने आई थी. तो यह धांधली आखिर रुकेगी कैसे?

– आपने बिल्कुल ठीक कहा. मैने इस मुद्दे को उठाया भी थी. यहां चार समस्याएं हैं. एक समस्या यह है कि जो स्पेशल इयर मार्किंग करनी होगी है वो नहीं करते. दूसरा, अकाउंट नहीं खोलते हैं. तीसरी समस्या यह है कि एससी/एसटी समुदाय की संख्या के हिसाब से आवंटन नहीं किया जाता है. जो आवंटन होता भी है वह कई बार तमाम राज्यों में दूसरे काम के लिए खर्च हो जाता है, जैसे आपने ही मध्यप्रदेश और दिल्ली का उदाहरण दिया लेकिन इसके अलावा यह और भी बहुत से राज्यों में हो रहा है और हो रहा था. दुख की बात यह है कि इस पर कोई अंकुश नहीं है.

प्लानिंग कमिशन (योजना आयोग) में मैने इसको लेकर आवाज उठाई. तब प्रधानमंत्री डा. सिंह ने मेरी अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई और गाइड लाइन को संशोधित कर जिस तरह से इसको लागू किया जा सकता है उस हिसाब से संशोधित करने को कहा. मैने रिपोर्ट दे दिया है और वह लागू भी हो रहा है. राज्यों की जो रिपोर्ट है उसे फिलहाल तैयार कर रहा हूं. केंद्र को दी अपनी रिपोर्ट में मैने कहा कि पहले के नियम के मुताबिक सभी मंत्रालयों को बजट राशि का 16.2 फीसदी राशि इस मद में देना जरूरी था. मैने कहा कि यह ठीक नहीं है क्योंकि रक्षा मंत्रालय जैसे कुछ मंत्रालय ऐसे हैं जहां से 16.2 फीसदी लेने की जरूरत नहीं है. तो इसी तरह कुछ मंत्रालय ऐसे हैं जहां आप 16.2 फीसदी से ज्यादा ले सकते हैं. यानि ओवरऑल 16.2 फीसदी वहां पहुंचना चाहिए.

ठीक है कि आपने इस मुद्दे को उठाया. लेकिन इसका नतीजा क्या होगा, क्या इससे चीजें सुधरेंगी? गड़बड़ी को कैसे रोकेंगे?

– इस पर भी काम हुआ है. इस बार हमने सभी मंत्रालयों को चार गुटों में बांट दिया है. कुछ मंत्रालय ऐसे हैं जिनके लिए कोई बाध्यता नहीं रखी गई है. कुछ मंत्रालयों को 0 से 15 प्रतिशत, कुछ मंत्रालयों को 15 से 16.2 प्रतिशत तक और कुछ मंत्रालय ऐसे हैं जिनको 16.2 और ज्यादा की श्रेणी में रखे गए हैं. इसके लिए मैने सभी मंत्रालयों के सचिवों को बुलाकर के उनसे खुली बातचीत (Negotiation) की, कि आप क्या कर सकते हैं और क्या करेंगे. हमने उनसे कहा कि ये सारा आवंटन इसी साल से होना चाहिए और उसमें जो गैप आया था, आपसी समझौते के तहत वो 13.4 प्रतिशत आया था. हमने उनसे कहा कि यह 16.2 प्रतिशत से कम है. तो राशि में जो फर्क है उस पैसे को योजना आयोग के पास रखना चाहिए और उसको उस मंत्रालय के अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों के लिए खर्च करना चाहिए जिन्होंने अच्छा Performance किया है. इसके लिए बजट के स्टेटमेंट में योजना आयोग की ओर से Written Letter गया है. सभी मंत्रालयों ने जो वादा किया था वो आवंटन कर दिया है और उस पर अमल शुरू है. इससे काफी फर्क पर रहा है. सिर्फ एक ग्रामीण विकास मंत्रालय ने गड़बड़ी की है. उन्होंने जो माना था उसमें बदलाव कर के उसे कम किया है. मैं इसके बारे में अलग से उनसे बात कर रहा हूं. बाकी सबके काम पर हमारी नजर बनी हुई है. ऐसा होने से मंत्रालयों की तरफ से 70 हजार करोड़ रुपये ज्यादा जा सकता है.

जहां तक आपका यह सवाल था कि इसमें धांधली को कैसे रोकेंगे तो इसमें थोड़ी दिक्कत है. अगर कोई पैसे को इधर से उधर करता है तो सजा देने का कोई प्रावधान नहीं है. मैं मानता हूं कि यह होना चाहिए. लेकिन फिर भी हम दबाव बनाए हुए हैं और एक बाज की तरह नजर रखे हुए हैं. इस साल से ठीक से अमल होने लगा है. हमारा दबाव ही है कि सभी मंत्रालयों ने अपने यहां अकाउंट खोल दिया है. (खुशी में दोहराते हैं..जी हां सभी Ministries ने). उस अकाउंट में पैसे रखकर हिसाब-किताब हो रहा है. फिर भी मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इसमें एकदम से फर्क आ जाएगा. इसमें भी कठिनाइयां आएंगी. लेकिन यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि अनुसूचित जाति के लोगों को विभिन्न मंत्रालयों से पहली बार 75 हजार करोड़ रुपये मिलने जा रहे हैं.

क्या इस दिशा में कोई कोशिश हो रही है कि पैसे का गलत इस्तेमाल करने वाले लोगों की जिम्मेदारी तय हो?

– सबसे पहली बात यह है कि हमारे पास कोई Power नहीं है कि हमलोग राज्यों को Punish कर सकते हैं. लेकिन हमलोग क्या कर सकते हैं कि उनको शर्मिंदा कर सकते हैं. आप जानते हैं कि हर राज्य के मुख्यमंत्री को अपने Annual Plan (वार्षिक बजट) के लिए योजना आयोग में आना होता है. जब वो आते हैं तो आयोग में सभी के साथ उनकी बैठक होती है. पिछले साल मैने क्या किया कि सबको सिर्फ एक सवाल पूछा कि एससी/एसटी सब प्लॉन के पैसे का उन्होंने क्या किया, यह बताइए? उन्हें कोई जवाब नहीं सूझ रहा था. उनका चेहरा लाल हो गया और वो बंगले झांकने लगे. सबके सामने उन्हें शर्मिंदा होना पड़ा. तो इस तरह उनको झटका देने से काम होता है. क्योंकि कानूनी तौर पर हम उन्हें कुछ नहीं कर सकते लेकिन हम नैतिक दबाव (Moral Pressure) बना सकते हैं. इससे वो अगली बार के लिए सतर्क होते हैं (मुस्कराते हुए) क्योंकि आपको पता है राजनीतिक लोग बहुत चालाक होते हैं. हमारे इस नैतिक दबाव का प्रभाव दिख रहा है. यही हाल राज्यों में भी है. अभी मैं इसकी रिपोर्ट बना रहा हूं. जब मैं इसे दूंगा तो आप देखेंगे कि इसके बाद यह चेक एंड बैलेंस हो जाएगा. क्योंकि अगर वो नहीं करते हैं तो सार्वजनिक रूप से इन्हें शर्मिंदा होना पड़ेगा क्योंकि हम लोगों को बताएंगे कि इस राज्य ने क्या कहा था और क्या किया?

फ्रांस की सरकार ने हाल ही में आपको अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान कमांडर ऑफ दी आर्डर ऑफ एकेडमिक पॉम्स दिया है. कितना बड़ा सम्मान है यह आपके लिए?

– बहुत बड़ा सम्मान है. यह उनका सर्वोच्च नागरिक सम्मान है और यह सम्मान नेपोलियन बोनापार्ट ने सन 1808 में शुरू किया था. मैं इस बात को लेकर भी बहुत खुश हूं कि मैं यह सम्मान पाने वाला पहला भारतीय हूं. जैसे ब्रिटिश लोगों का ‘सर’ और ‘नाइटहुड’ सम्मान था, वैसे ही यह फ्रेंच लोगों का सम्मान है.

आपने अब तक 15 किताबें लिखी हैं. आपके 100 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं. इन सबमें कौन सी किताब आपके ज्यादा करीब है?

– निश्चित तौर पर मेरा जो फैमिली बायोग्राफी है वो मुझे सबसे प्यारा है. क्योंकि उसने बहुत जादू कर दिया है. आप देखिए कि वो किताब 17 भाषाओं में चली गई है. भारतीय और विदेशी भाषाओं में. ये किताब मैने सबसे पहले मराठी में लिखी थी. फिर जब मैं अमेरिका में काम कर रहा था तो इसी किताब को मैने खुद अंग्रेजी में लिखा. यह ट्रांसलेट नहीं हुआ है बल्कि इसे पूरा लिखना पड़ा क्योंकि जब मैने इसे मराठी में लिखा था तो उसमें सोशल मूवमेंट का जो ऐंगल है तो मैने Assume कर लिया था क्योंकि इस बारे में सभी लोग जानते थे. लेकिन इसी किताब को जब मैं अमेरिकन लोगों के सामने रखना चाह रहा था तो उनको क्या पता था कि Cast System (जाति व्यवस्था) क्या है? इसलिए मैने उसमें जाति व्यवस्था के ऊपर एक पूरा चैप्टर लिखा. इसलिए यह फिर से लिखी गई किताब थी.

वो कौन सा वक्त था जब आपने सोचा कि आपको अपने परिवार की कहानी लिखनी है, इसको लिखने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

– इसकी एक बहुत दिलचस्प कहानी है. मैं हमारे घर में सबसे छोटा था. जब मैं स्कूल में था तो मेरे पिता रिटायर हो गए. वो रेलवे में Class 4th Worker थे. छोटा-मोटा काम करते थे. वो कद-काठी से बहुत मजबूत थे. वो बहुत जीनियस थे लेकिन कभी स्कूल नहीं जा पाए थे. तो यह किताब असल में उनके बारे में है. हम लोग बस कहानी में मोड़ लाते हैं. किताब का मुख्य पात्र मेरा बाप है. उसका मराठी का शीर्षक भी यही है ‘मेरा बाप और हम’, ‘आमचा बाप आनू आम्ही’. तो फोकस बाप पर है. जब वो रिटायर हुए तो वो समझ नहीं पाते थे कि अपना समय कैसे बिताएं. पढ़-लिख भी बहुत कम पाते थे. तो उन्होंने घर में ही ठोक-पीट चालू कर दिया. दोपहर में सभी को सोने में तकलीफ होने लगी. लेकिन चूकि सभी उनसे डरते थे तो किसी को बोलने की हिम्मत नहीं थी. हालांकि सबसे छोटा होने के कारण मुझे थोड़ी छूट थी. मेरा उनसे एक खास रिश्ता था. सब लोग उनसे डरते थे लेकिन मैं नहीं डरता था. तब मैं 15-16 साल का था, दसवीं या ग्यारहवीं में. अब उनसे यह तो नहीं कहा जा सकता था कि आप ये सब मत करो. तो मैने एक आइडिया निकाला. मैने उनसे कहा कि आप जो हमें अपने बचपन की कहानियां सुनाते रहते हैं उसे लिखिए. वो बोले की ये कौन पढ़ने वाला है. हमें तो उस ठोक-पीट से राहत चाहिए थी तो मैने चढ़ाया कि आगे चलकर आपका लिखा आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक साबित होने वाला है.

बड़ी मुश्किल से वो राजी हुए. फिर मैने उन्हें पेपर-वगैरह लाकर दिया और कहा कि आप लिखो. हमें तो खुशी हुई कि हमें अब उस ठोक-ठाक से राहत मिलेगी लेकिन वो Born Writer निकले. वो लगातार 10 बरस तक लिखते रहे. सबेरे उठ कर लिखना शुरू करते तो फिर लिखते जाते. तब मैं इतना Immature (अपरिपक्व) था कि मैने कभी पढ़ा नहीं कि वो क्या लिखते हैं. परिवार में हममे से किसी ने नहीं पढ़ा. दस बरस बाद मैं अमेरिका चला गया पीएचडी के लिए तो जाते वक्त मैने उनका लिखा हुआ सब इकठ्ठा करके रख दिया. पढ़े बगैर रख दिया कि देखा जाएगा बाद में. 1981 को मैं बाहर चला गया, 86 में वापस आया पीएचडी करके. वो किताब ढ़ूंढ़ी, नहीं मिली, छोड़ दिया. 1991 में पिताजी का देहांत हो गया. उनके नहीं रहने के बाद एक दिन मुझे अचानक याद आया कि उन्होंने किताबें लिखीं थी उसका क्या हुआ. फिर मैने सारा घर छान मारा और वो निकाला. ऐसे ही एक शाम को मैं वो पढ़ने लगा. मैं पूरी रात पढ़ता रहा और पूरी रात रोता रहा. क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी कहानी अपने स्टाइल में लिखी थी. मैं बड़ा खुश हो गया और पूरा पढ़ने के बाद मैने सोचा कि इस पर कोई किताब आनी चाहिए. तो दूसरे दिन सुबह मुझे यह भी एहसास हो गया कि मैं अपने पिताजी की लिखाई का मूल्यांकन कैसे कर सकता हूं. किसी और को भी यह कहना चाहिए कि इसमें दम है. तो मैं मुल्कराज आनंद जी के पास चला गया. मुल्कराज आनंद जी बहुत बड़े साहित्यकार थे. पंडित नेहरू के साथ के थे. उन दिनों मैं उनके साथ कुछ टीवी प्रोग्राम कर रहा था डिस्कशन के. तो मैं उनके पास एक नोट लेकर गया और फ्रीलांस मराठी का अंग्रेजी में ट्रांसलेट कर के बताया. वह बहुत खुश हुए. उन्होंने कहा कि देखो भाई, तुम अर्थशास्त्री हो. फिलहाल अपने अर्थशास्त्र को भूल जाओ और किताब लिखो.

फिर क्या हुआ कि मैं पिताजी का लिखा लेकर बैठ गया. उसमें क्या हुआ था कि उन्हें जैसे-जैसे याद आया था उन्होंने लिखा था. इसकी वजह से इसमें कई दोहराव था. और सबसे गड़बड़ बात यह थी कि उन्होंने 1949 तक ही लिखा था. उसके बाद का जो वक्त था, जो सफलता थी जिसमें मैं अमेरिका गया था उन्होंने वो सब नहीं लिखा था. क्योंकि जब मैं अमेरिका चला गया तब तक उनकी आंखें थक गई थी और कोई टोकने वाला नहीं था कि आप लिखिए तो उन्होंने छोड़ दिया था. तो मैने क्या किया कि जो मेरे पिता का लिखा था उसे दुरुस्त कर के एक चैप्टर स्कीम बनाया. हालांकि किताब की भाषा हूबहू वही रखी, जिस भाषा में पिताजी ने लिखा था. उसका फायदा यह हुआ कि हाल ही में उस किताब पर किसी ने पीएचडी किया है. सब बहुत अविश्वसनीय है. तो 49 तक की कहानी मैने अपने पिता से ली बाकी उसके बाद की कहानी अपनी मां के साथ बैठकर के, अपने भाईयों के साथ बैठ कर के 1991 तक लेकर आया. इस किताब में शुरुआत में मैने, मेरे और मेरे पिता के बारे में लिखा. उनका जो प्रभाव मेरे ऊपर था, उनसे जो मेरे संबंध थे उसे लिखा. बीच में का सारा उनका लिखा हुआ था. उसके बाद जो है वो जो मैने 49 से 91 तक सबसे बात करके लिखा है वो है. तो इस तरह 2 दिसंबर 1993 को यह किताब सामने आया. इस किताब ने इतना जादू कर दिया कि मराठी साहित्य के इतिहास में यह पहली किताब थी जिसका पहले ही दिन पूरा संस्करण बिक गया. क्योंकि मैने रेडियो पर इस किताब को खुद पूरा पढ़ा था. हर दिन 20-20 मिनट पढ़ता था. इससे यह इतना लोकप्रिय हो गया था. इस कारण जब यह किताब आई तो लोग इसे खरीदने के लिए बेचैन हो गए. आप जानकर हैरत में पड़ जाएंगे कि अभी तक इस किताब के 150 (Edition) संस्करण आ चुके हैं. इसका साइज कम- ज्यादा है इसलिए इसे अभी 35 वां संस्करण बताया गया है लेकिन इसका एक संस्करण एक-एक लाख का है.

इसके बाद किताब पर जैसे-जैसे लोगों की प्रतिक्रिया आती गई मैं इसमें नए Chapter जोड़ता गया. कुछ लोगों ने शिकायत किया कि मैने अपनी मां के बारे में नहीं लिखा है तो मैने इसमें अपनी मां के बारे में एक चैप्टर लिखा. और फिर अपनी दादी के बारे में लिखा. मेरी बेटी ने अपने वक्त का लिखा है. तो मराठी में यह बढ़ता गया है. अंग्रेजी में मैने इसे अमेरिका में रहते हुए 1998 से 2002 तक लिखा. और आपको पता है कि इसकी सबसे अधिक कॉपी किस भाषा में बिकी है? (मेरी ओर सवाल उछालते हैं, फिर कहते हैं) कोरियन भाषा में. क्या आप यकीन करेंगे कि पिछले चार सालों में कोरिया में इस किताब की हजारों कॉपियां बिकी है. जब मैं कोरिया गया था पिछले दिनों तो लोग मुझे रास्ते पे हाथ मिला रहे थे जैसे मैं कोई नेशनल हीरो हूं.

इस किताब पर 4-5 पीएचडी हो चुकी है. 20 एमफिल डिग्री मिल चुकी है. अब तो इस किताब के ऊपर किताब लिखने की तैयारी है. (Excited होते हुए बताते हैं) जो सबसे दिलचस्प बात है वो यह कि इस पर जल्दी ही फिल्म बनने जा रही है. नाना पाटेकर इसके निर्देशन (director) हैं और साथ ही मेरे पिता का रोल करने वाले हैं. वो इस फिल्म में मुख्य भूमिका में है. मेरी मां का रोल सोनाली कुलकर्णी (सीनियर) करेंगी. मेरी भूमिका और बाकी लोगों की भूमिका कौन करेगा यह अभी तय नहीं हुआ है. हम आशा कर रहे हैं कि ए.आर रहमान इसमें (Music) संगीत देंगे. य़ह बड़े बजट की फिल्म होगी. यह फिल्म चार भाषाओं में बनाने की योजना है. मराठी और हिंदी में ओरिजनल रहेगा. जबकि अंग्रेजी और कोरियन में इसे डब किया जाएगा.

पिछले दिनों आपका नाम राज्यसभा के लिए काफी चर्चा में रहा था. तो क्या आप सक्रिय राजनीति में भी आएंगे?

– हां-हां, आएंगे. क्यों नहीं आएंगे. लेकिन हां, मैं राजनीति में सही वक्त पर जाऊंगा. समय-समय की बात है. जैसे मैने 31 साल रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में गुजारा है. अभी तो कोई जरूरत नहीं है. अभी मैं अच्छा काम कर रहा हूं. योजना आयोग के सदस्य के तौर पर मुझे केंद्रीय राज्यमंत्री की रैंक हासिल है.

आप सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (National Advisory Committee) के भी सदस्य हैं. यहां आपकी भूमिका क्या है?

– जैसा की आपको पता है कि मैं योजना आयोग का सदस्य भी हूं. यह पहली बार है कि कोई व्यक्ति योजना आयोग और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC), दोनों का सदस्य है. एनएसी में मैने जो सबसे महत्वपूर्ण बात उठाई है वो घूमंतू और विमुक्त जातियों के बारे में उठाया है. ये हमारे देश में ऐसे लोग हैं, जिन तक अभी तक स्वतंत्रता पहुंची ही नहीं है. इस समुदाय के तमाम लोगों को आम नागरिकों को मिलने वाले मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखा गया हैं. पहले ये Criminal Tribes थे तो इनको कंटीली तारों के अंदर रहना पड़ता था. पंडित नेहरू ने 1952 में सोलापुर में जाकर वो वायर काट कर इनको मुक्त किया. इनको घुमंतू और विमुक्त जातियां कहते हैं. इन जातियों के बारे में पिछले 60 वर्षों में कई रिपोर्ट आ गए है. लेकिन कुछ काम नहीं हुआ है. तो मैने इस मुद्दे को उठाया है और काफी काम किया है. मैने इस पर एक नेशनल कांफ्रेंस की थी जहां विमुक्त समाज के सारे नेताओं को बुलाया था. इसके आधार पर मैने एक रिपोर्ट बनाया है. अभी सोनिया गांधी भारत वापस आ गई हैं, एनएसी की जो अगली बैठक होगी उसमें ये रिपोर्ट उनके सामने रखेंगे.

पिछले दिनों लोकपाल का मुद्दा काफी छाया रहा था. दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले तमाम चिंतकों और विचारकों ने इसका विरोध किया था. कहा था कि यह दलितों के हित के खिलाफ है. आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

– इस बारे में खुले तौर पर कोई राय देना मैं उचित नहीं समझता. लेकिन मेरा यह मानना है कि किसी तरह से संविधान के बाहर जाकर इस प्रकार से मुद्दे उठाना गलत बात है. इससे मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूं.

इस मुकाम तक पहुंचने के बाद अपने बचपन को, अपने संघर्ष के दिनों को कैसे याद करते हैं. जीवन में सबसे अधिक मुश्किल दौर कौन सा था?

– संघर्ष तो निरंतर चलता रहता है. फिर भी मुड़कर पीछे देखता हूं तो खुशी होती है कि मैं इतना दूर आ गया हूं. इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं किसी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता. देखिए, जो प्रतिकूल परिस्थिति को काबू कर के आगे आता है उनमें दो तरह के लोग होते हैं. एक प्रकार के लोग ऐसे होते हैं कि अच्छा, मुझे ये भुगतना पड़ा, मैं अभी बताता हूं सबको. जो दूसरे किस्म के लोग होते हैं वो उसे स्वीकार करते हैं और उन्हें अपनी जिंदगी में जो कठिनाइयां आई थी वो उनके जैसे दूसरों लोगों को न आए, इसके लिए सक्रिय रूप से कोशिश करते हैं. मेरा स्वभाव वो है. बाकी वो गालियां देने से कुछ हासिल होने वाला है नहीं.

अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?

– यह बताना बहुत मुश्किल काम है. अब देखिए, मैने 15 किताबें लिखी हैं. सौ से अधिक शोध पत्र लिखे हैं. मैंने सरकार के तकरीबन 40 बहुत ही महत्वपूर्ण रिपोर्ट लिखे है. 60-70 आर्टिकल लिख चुका हूं. पिछले 10 सालों में 10 मेमोरियल लेक्चर दिया है. तकरीबन 35 बार मुख्य वक्ता के तौर पर अपनी बात रख चुका हूं. तो मैने जहां भी काम किया, जो भी काम किया मैं जितना बेहतर कर सकता हूं मैने किया.

पुणे यूनिवर्सिटी के कुलपति के तौर पर अपने प्रयोगों से आप काफी चर्चित रहे थे. जरा उस दौर के बारे में बताइए?

– पुणे यूनिवर्सिटी का कुलपति बनने के बाद मैने सिर्फ 33 महीने में वहां पूरा परिवर्तन कर के दिखाया. यह बहुत बड़ी उपलब्धि है. मिसाल के लिए मैं आपको बताना चाहूंगा कि पुणे विश्वविद्यालय में मैने ‘समर्थ भारत अभियान’ नाम से एक अभियान शुरू किया. हमने 500 कॉलेज के प्रिंसिपल को बताया की हर एक कॉलेज एक गांव को गोद ले और वहां तीन साल में पूरा परिवर्तन कर के बताए. बच्चों ने जो काम किया वो अविश्वसनीय था. जिस निर्मल ग्राम की बात होती है, मेरे बच्चों ने 200 गांवों को बिना एक रुपये सरकारी खर्च के निर्मल गांव बनाकर दिखाया. राष्ट्रपति इसको लेकर बहुत खुश हुई थीं और उन्होंने खुद पुणे में आकर 160 गांवों के लोगों को पुरस्कार दिया था. मैने पौधे लगाने का प्रोग्राम किया था. 7 लाख पौधे लगाए गए और उनमें से 80 फीसदी बचे रहे. एक महत्पूर्ण प्रोग्राम मैने स्किल डेवलपमेंट को लेकर चलाया. गांव से आने वाले जो गरीब-दलित बच्चे और बच्चियां हैं, ये लोग इंटरव्यूह में जाते हैं तो फेल हो जाते हैं. इसका कारण यह नहीं है कि उनके पास जानकारी नहीं होती बल्कि यह इस वजह से होता है क्योंकि उनके पास Finish नहीं होता, Polish नहीं होता है. वहीं जो अपर मिडिल क्लास वाला बच्चा होता है वो 10 मिनट में बाजी मार जाता है. जबकि आप उसको स्क्रेच करोगे तो पता चलेगा कि उसमें कुछ नहीं है. तो मैनें क्या किया कि उनके लिए पंद्रह दिन का ट्रेनिग प्रोग्राम चलाया, इससे 3 लाख बच्चों का फायदा हुआ.

मैने यह व्यवस्था किया कि अगर कोई स्टूडेंट काम मांगता है तो उसे हर दिन तीन घंटे का काम मिलना चाहिए. हर घंटे के लिए 12 रुपये से बढ़ाकर 20 रुपये किया. इससे वो हर दिन 60 रुपये कमा पाते थे. मैं दर्जनों ऐसे छात्रों को जानता हूं जो पैसे बचाकर घर भी दिया करते थे. इसके अलावा मैने देवदासी (देह व्यापार में लिप्त औरत) के बच्चों के लिए स्कॉलरशिप शुरू किया. रिटायर लोगों के लिए पुणे विश्वविद्यालय से पी.एचडी की व्यवस्था की. यह प्रोग्राम काफी लोकप्रिय रहा था. हालांकि बाद में बंद हो गया था.

आपने चीजों को बहुत नीचे के स्तर पर भी देखा है और अब शीर्ष स्तर से भी देख रहे हैं, तो दोनों जगहों से देखने में क्या फर्क है, क्या देखने का नजरिया बदल जाता है?

– इस बात पर मैं एक घटना बताना चाहता हूं. एक दिन मैं और मेरा बड़ा भाई जो आईएएस था हम दोनों 15वीं मंजिल पर खड़े थे. मुंबई में, उसके घर पे. (भाई के बारे में बताते हैं ‘वो हमारे टीम (परिवार) का कैप्टन था. उसको बहुत सहना पड़ा था’) और मैं ऊपर से देख रहा था तो उसने कहा कि You know the advantage of standing so high is that you have much wider perspective about what you going down there. I was little boy and you know what is my answer, that is true however people look much smaller than what they are if you are looking for the top. You know, this is the different of the attitude. तो आप जब नीचे के नजरिए से देखते हैं उसमें और ऊपर के नजरिए से देखते हैं उसमें, फायदा भी है और नुकसान भी है. इसलिए आपको सतर्क रहना होगा.

(तकरीबन 45 मिनट की बातचीत हो चुकी है. उनकी एक और मीटिंग है. वो टोकते हैं कि अब खत्म करना चाहिए. इसी बीच मैं कुछ सवाल और करता हूं)

इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद तमाम मूल्यों को बनाए रखते हुए उतरदायित्वो को निभाना कितना मुश्किल है?

– कोई मुश्किल नहीं है. यदि आपके दिमाग में बातें साफ हैं तो. आप एक मूल्य देखिए. मेरे भाई ने जो सिखाया था. हमारे दिमाग पर उन्होंने जो असर डाला था उसका एक बिंदू यह था कि हमने तय कर लिया था कि हम प्राइवेट सेक्टर के लिए काम नहीं करेंगे, हम पब्लिक सेक्टर के लिए काम करेंगे. इसमें ज्यादातर मैने यही किया. 31 साल तक रिजर्व बैंक में काम किया. हां, जब मैं अमेरिका में गया और वहां मैने अपनी पी.एचडी खत्म की. इसमें मुझे संबंधित सारे अवार्ड मिले. वो अब भी रिकार्ड है जो टूटा नहीं है. तो तब मेरे पास 15-16 नौकरियों के ऑफर थे. मैने सबको छोड़ दिया और 5वें दिन भारत में लौट आया. यह मूल्य (Value) का सवाल है. क्योंकि मैं यह विश्वास करता हूं कि आपके मां-बाप और मातृभूमि का कोई विकल्प नहीं हो सकता. तो यह वैल्यू ही था कि मैं वापस आ गया. हां, मैने सिर्फ एक बार प्राइवेट सेक्टर में जो नौकरी की Advisor Chief economic counselor for Afghanistan, आपको पता है मुझे कितने पैसे मिलते थे, मुझे एक साल में 1 करोड़ 25 लाख रुपये मिलते थे. मैं काबुल में था. लेकिन इसी बीच मेरी बीवी ने मुझे फोन किया एक दिन और पूछा कि आप वाइस चांसलर बनना चाहते हैं. मैं चौकते हुए पूछा, वाइस चांसलर, कौन सी यूनिवर्सिटी में? मेरी बीवी ने कहा पुणे यूनिवर्सिटी. सुनने के बाद मैने 20 सेकेंड में हां कर दिया, क्योंकि पुणे एक ऐसी जगह है जहां दलितों को काफी सहना पड़ा है. दलितों के साथ यहां बहुत अमानवीय व्यवहार हुआ है. मैने कहा कि ऐसी जगह का ‘पोप’ बनकर जाने में सामाजिक न्याय है. तो मैने सवा करोड़ रुपये की नौकरी छोड़ के सलाना छह लाख रुपये देने वाली नौकरी की. तो इस तरह 95% पे-कट लेकर मैं पुणे यूनिवर्सिटी चला आया.

तमाम लोगों ने यहां तक की घर में भी कुछ लोगों ने कहा कि यह मूर्खता है. तो मैने उनसे कहा कि ये अगर पागलपन है तो ऐसे पागलपन मैं बार-बार करुंगा. ये मूल्य का सवाल है. तो मुझे लगता है कि आपके विचार में स्वच्छता है तो इसमें कोई बाधा नहीं आएगी.

आप योजना आयोग और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) दोनों के सदस्य हैं. आने वाले वक्त में आप सबसे बड़ी समस्या क्या देखते हैं? दलित समाज के लिए भी और सर्व समाज के लिए भी.

– मुझे लगता है कि सबको अच्छी शिक्षा मिलना उनके भविष्य के लिए सबसे जरूरी है. शिक्षा का नहीं होना ही हर चीज की जड़ में है. जब डा. अंबेडकर ने यह कहा था कि शिक्षा, एकता और संघर्ष, तो यह कोई चुनावी नारा नहीं था. यह बहुत बड़े समाज की आत्मप्रतिज्ञा थी. हरेक शब्द महत्वपूर्ण था और मुझे लगता है कि वही सबसे बड़ा चैलेंज है. अगर उनको अपने पहले की आर्थिक स्थिति से बाहर आना है, अपनी जिंदगी में कुछ कर दिखाना है तो उसके लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा प्राप्त करना और अच्छा स्किल डेवलपमेंट हासिल करना यह सबसे बड़ी चुनौती है.


इस इंटरव्यूह पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए आप ashok.dalitmat@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

अशोक दास

अशोक दास

बुद्ध भूमि बिहार के छपरा जिले का मूलनिवासी हूं।गोपालगंज कॉलेज से राजनीतिक विज्ञान में स्नातक (आनर्स) करने के बाद सन् 2005-06 में देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान, जेएनयू कैंपस दिल्ली’ (IIMC) से पत्रकारिता में डिप्लोमा। 2006 से मीडिया में सक्रिय। लोकमत, अमर उजाला, भड़ास4मीडिया और देशोन्नति (नागपुर) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया। पांच साल तक कांग्रेस, भाजपा सहित तमाम राजनीतिक दलों, विभिन्न मंत्रालयों और पार्लियामेंट की रिपोर्टिंग की।
'दलित दस्तक' मासिक पत्रिका के संस्थापक एवं संपादक। मई 2012 से लगातार पत्रिका का प्रकाशन। जून 2017 से दलित दस्तक के वेब चैनल (www.youtube.com/c/dalitdastak) की शुरुआत।
अशोक दास

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here