हिन्दुत्व से बुद्धत्व की ओर जाने से मिलेगी दलितों को मुक्ति

पदार्थ की तीन अवस्थाएं होती हैं. ठोस, द्रव और गैस. लेकिन इसके साथ ही चौथी अवस्था जिसको प्लाज्मा कहा गया है, उसको खोज लिया गया है. समुद्र की गहराई से लेकर आसमान की ऊंचाई तक, चांद से लेकर मंगल ग्रह तक विज्ञान ने कदम रख दिया है. ह्रदय प्रत्यारोपण, किडनी प्रत्यारोपण और नयी-नयी औषधियों की खोज से जीवन प्रत्यासा बढ़ी है. सूचना क्रांति, बुलेट ट्रेन से लेकर अब डिजिटल इंडिया और स्किल इंडिया की ओर हम अग्रसर हो चुके हैं. शहर स्मार्ट सिटी बनने जा रहे है. भारत अब कृषि प्रधान से कंप्यूटर प्रधान देश बनने की ओर अग्रसर है. भारत विश्व का सबसे बडा़ लोकतंत्र है और संविधान पर सबकी आस्था ही नहीं विश्वास भी है. अनेकता में एकता यहां की पहचान है, मगर मौजूदा दौर में देश में संसद से लेकर सड़क तक, शहर से लेकर गांव तक एक ही गूंज और चिल्लाहट सुनाई दे रही है. वह है दलित उत्पीड़न.

इसके तहत दलितों को मारा गया, उन्हें जिंदा जलाया गया, उनके घर जला दिये गये, दलित युवाओं को सड़क पर कार से बांधकर बेरहमी से पीटा गया आदि-आदि. इन पीड़ितों का दोष हमेशा यही होता है कि या तो ये किसी मंदिर में प्रवेश करने का गुनाह कर बैठते हैं या किसी नल या कुएं से प्यास बुझाने की गलती कर रहे होते हैं. कभी इनका दूल्हा मंदिर या ‘विदेशियों’ के गांव में घोडी़ पर बैठकर जाने का दुःसाहस कर बैठता है या हालिय ऊना शहर गुजरात की घटना की तरह मृत पशु की खाल ले जा रहे होता है जो उनके व्यवसाय और आजिविका से जुड़ी होती है.

हाल ही में उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिले में एक दलित युवक की ब्राह्मण शिक्षक ने गर्दन दराती से इसलिए काट डाली कि उसने सवर्ण की चक्की को छू डाला. देश में दलित और महिला होना जैसे अभिशाप बन गया हो. ये सच है कि जब तक सृष्टि या सूर्य है नारी भी रहेगी और शायद दलित भी रहें क्योंकि मात्र कानून बनाने से इनकी दशा और दिशा बदलने वाली नहीं है जब तक समाज अपनी मानसिकता में बदलाव न कर ले. भौतिक शास्त्र से लेकर रसायन शास्त्र ने विश्व समाज को प्रगतिशील बना दिया है, मगर समाज शास्त्र अभी भी बहुत पीछे है. हमारे पास हजारों नीति शास्त्र और धर्म ग्रंथ मौजूद हैं लेकिन हम ज्यादा अधर्मी और समाज विरोधी बनते जा रहे हैं.

इस समाज को सिर्फ और सिर्फ वोट की फसल के रूप बोया जाता है और सत्ता प्राप्ति के बाद  इस फसल को या तो रौंद दिया जाता है या काट दिया जाता है. इतना तय माना जाये कि वोट रूपी जाति के बीज को कोई भी राजनैतिक दल इतनी जल्दी मिटाना नहीं चाहेगा और न हीं हमारा हिंदू समाज इनको बराबर का दर्जा देगा क्योंकि जब दलित हैं तभी दूसरा वर्ण श्रेष्ठ बना हुआ है और श्रेष्ठ रहना भला कौन नहीं चाहेगा? देश के 16-18 फीसदी दलितों को खुद ही दलितपन से मुक्ति के लिए एक ऐसी अवस्था से गुजरना होगा जिसको रसायन विज्ञान में विलयन की संतृप्त अवस्था कहा जाता है. दलित वर्ग को संतृप्त की अवस्था प्राप्त करने के लिए उन कारकों को पहचान कर त्यागना होगा जो उनके दलितपन के प्रतीक हैं. गुजरात की ताजा घटना ने दलितों को संतृप्त अवस्था में लाने के लिए प्रेरित कर दिया है. दलित अब जाति के आधार पर थोपे गये कार्य को नहीं करेंगे और न हीं मरे जानवरों को उठाएंगे. इसके लिए एक मात्र उपाय है शिक्षित बनना, संगठित रहना और संघर्ष करना, जो बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा बताये गए सूत्र हैं.

जिस दिन वंचित/दलित हिंदुत्व से बुद्धत्व की ओर मुड़ने लगेगा, मंदिर से स्कूल की तरफ मुड़ जायेगा मंत्रों से यंत्रों की ओर देखने लग जायेगा और जाति आधारित कार्यों को त्याग कर अन्य व्यवसाय की तरफ झांकने लग जायेगा, अपने वोट के सही प्रयोग और महत्व को समझने लग जायेगा, उसी दिन से यह समाज प्रगति की ओर बढ़ने लग जायेगा और दलित बनने और कहलाने के रास्ते जब बंद हो जाएंगे तो ये दलितों की संतृप्तावस्था होगी. स्वच्छ समाज, सभ्य समाज और संवैधानिक समाज की अवधारणा के लिए दलितों को इस अवस्था को प्राप्त करने की भरसक कोशिस करनी चाहिए. हिन्दुत्व को छोड़ बुद्धत्व की ओर जाने का मार्ग ही दलितों को शोषण से मुक्ति दिला सकता है.

लेखक प्रवक्ता (भौतिक विज्ञान) हैं. अल्मोडा़ (उत्तराखण्ड) में रहते हैं. संपर्क- 7599189297

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here