बड़े दलित नेताओं को समाज की नहीं, अपने परिवार की चिंता

संविधान में सभी लोगों के लिए समान अवसर और न्याय की व्यवस्था है. इसी संविधान ने अनुसूचित जाति/ जन जाती को सरकारी शिक्षा, नौकरी और चुनावों में आरक्षण दिया. पिछड़ों को भी 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया. लेकिन आजादी के 70 वर्षों बाद भी सामाजिक समानता, शिक्षा और रोजगार के मामले में दलितों की क्या स्थिति है?

देश में आजकल आरक्षण पर बहस छिड़ी है. आरक्षण की समीक्षा की बात आरएसएस प्रमुख ने भी उठाई है. यह सब तो ठीक है, पर इस पर भी बात होनी चाहिए कि क्या आरक्षण का पालन सही ढंग से किया गया है? कितने अत्याचार हुए है दलितों पर आजादी के बाद और कितना न्याय मिला? आखिर दलितों पर अत्याचार क्यों बढ़ रहे हैं? दलित नेताओं सहित उनके कार्यों की भी समीक्षा होनी चाहिए.

आज दलित वर्ग को आरक्षण की जरूरत नहीं होती, अगर दलितों पर अत्याचार नहीं होते, शिक्षा,रोजगार के क्षेत्र में समानता मिलती. आर्थिक विषमता दूर होती. दलितों की आबादी बढ़ रही है पर रोजगार के अवसर घट रहे हैं. निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग दलितों की रही है.

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देश के स्थापित दलित नेताओं ने अपने निजी स्वार्थ, सर्वजन नेता बनने की ललक और परिवार को राजनीत में स्थापित करने में लगे हैं. निजी क्षेत्र में आरक्षण के मुद्दे को कभी भी स्थापित दलित नेताओं ने आंदोलन में तब्दील नहीं किया. देश की कुल आबादी में 20.14 करोड़ दलित हैं. इनके सामने गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा और रोजगार बड़ी समस्या है. जबकि लगातार आरक्षण में कटौती का प्रयास किया जा रहा है. आरक्षण की बदौलत कुछ ही दलित रोजगार पा सके हैं.

देश के 31 केंद्रीय विवि अनुसूचित जाति के मात्र 26 और अनुसूचित जनजाति के 9 प्रोफेसर हैं. जेएनयू में प्रोफेसर नहीं है एससी के 69 लेक्चरर के और 29 अजजा के पद रिक्त हैं. बीएचयू में एससी के 43 और एसटी के 25 शिक्षकों के पद रिक्त हैं. केंद्र सरकार के 99 सचिवों में एक भी अनुसूचित जाति के नहीं हैं. 200 अतिरिक्त सचिवों में मात्र 2 हैं. दलितों को राष्ट्रीय स्तर पर निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग को आंदोलन के माध्यम से रखना होगा.

अमर आजाद, पटना विश्वविद्यालय
दैनिक भास्कर से साभार

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