गुजरात के दलितों का अकेलापन और समाज की चुप्पी भरी शांति !!

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गुजरात के उना शहर में चार दलित युवकों को अर्धनग्न कर जिस स्पोट्स यूटिलिटि व्हीकल से बाँधा गया है वह हमारी अर्थव्यवस्था की रफ़्तार का प्रतीक है. महिंद्रा के ज़ाइलो की कीमत साढ़े आठ लाख से साढ़े दस लाख के बीच है. इसी ज़ाइलो से बाँध कर दलित युवकों को शहर में अर्धनग्न कर घुमाया गया और उन्हें लाठी से मारा गया. बार बार मारा गया. गाँव में मारा गया. फिर शहर में लाकर मारा गया ताकि शहर भी देखे.

आप अगर सुन सकते हैं तो लाठी की फटाक फ़टाक आवाज़ को सुनिये. आप अगर बार बार सुन सकते हैं तो दिन रात सुनिये. पूरा हफ्ता सुनिये. पूरा महीना सुनिये और हो सके तो यही करते करते पूरा साल निकाल दीजिये. दलित युवकों की पीठ पर बरसती लाठियों की आवाज़ बता रही है कि वे तमाम सदियाँ और दस्तूर अभी ज़िंदा है जिनमें दलित कभी ज़िंदा नहीं था. फ़टाक फ़टाक की हर आवाज़ दलित स्वाभिमान को कुचल रही है. दलित की पीठ की कोई कीमत नहीं. उसके स्वाभिमान सम्मान की कोई कीमत नहीं. उसकी नागरिकता की कोई कीमत नहीं। कीमत उस ज़ाइलो एस यू वी की है जिस पर एक भी लाठी नहीं लगती है.

चार दिनों से उनकी पीठ पर बरसती लाठियों की आवाज़ गूँज रही है मगर हमारा समाज उसे संगीत समझकर झूम रहा है. क्या ये लड़ाई अकेले दलीत की है? क्या उन युवाओं की पीठ पंचायत का चबूतरा है जहाँ कोई भी दबंग बैठकी लगाकर जम गया? वो लाठी बता रही है कि हमारे बीच क्रूरता मौजूद है. हमारी चुप्पी बता रही है कि हम उस क्रूरता से सहमत हैं और दलित की पीठ लात और लाठी के लिए बनी है. क्या ये तस्वीर काफी नहीं है कि ग़ैर दलित समाज अपने भीतर की इस धार्मिक और सांस्कृतिक क्रूरता के ख़िलाफ़ चित्कार उठे. चिल्ला उठे कि अब हमसे भी नहीं देखी जाती हमारी क्रूरता. क्या उसे दलितों से पहले सड़कों पर नहीं उतर आना चाहिए था?

भारत आज़ादी का सत्तर साला जश्न मनाने जा रहा है. प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी से कहा है कि वे तिरंगा सप्ताह मनायें. गली गली में तिरंगा रैली निकालें. किसके लिए तिरंगा की रैली निकलेगी? कब तक हम ऐसे राष्ट्रवादी आयोजनों की आड़ लेकर इन सवालों से बचेंगे. कब तक हम आँख में आँख मिलाकर बात नहीं करेंगे कि आज भी दलित को वो जगह नहीं मिली. संविधान से उसे अधिकार और संरक्षण नहीं मिला होता तो आज़ाद भारत का समाज उनके साथ क्या करता, गुजरात की घटना प्रमाण है कि उसके बाद भी जो हो रहा है उससे ज़्यादा क्रूर होता. उन्हीं सूमो और ज़ाइलो में तिरंगा लगाकर लोग घूमेंगे और अचानक ऐसे किसी लम्हों में उसकी लाठी दलित की पीठ में घुसेड़ भी देते हैं. जब तक ये अंतर नहीं मिटेगा हम तिरंगा हाथ में लेकर उसका सम्मान नहीं कर पायेंगे.

आप लोकतंत्र के नौटंकीबाज़ सोशल मीडिया को खंगाल कर देखिये. वहाँ जातिवाद और संप्रदायवाद किस कदर ज़िंदा है. सब अपने जातिवाद को बचाने के लिए तिरंगे और राष्ट्रवाद का सहारा ले रहे हैं. हम अपने पूर्वाग्रहों के गुलाम लोग हैं. हम अपने भीतर की नफ़रतों के ग़ुलाम लोग हैं. हम आज़ाद नहीं है.

क्या किसी को इस शहर में शर्म आती है? आती है तो आज़ाद भारत का आज़ाद समाज बताये कि वो क्यों नहीं निकला सड़कों पर इस हिंसा के ख़िलाफ़. सिर्फ दलित ही क्यों निकलते हैं दलित हिंसा के ख़िलाफ़. मीडिया भले गुजरात में प्रदर्शनों को जितना व्यापक बता ले मगर हकीकत यही है कि इस व्यापकता में भी दलितों का अकेलापन झलक रहा है.

लोकसभा में 131 अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसद हैं. इन सांसदों ने भी दलितों को अकेला छोड़ दिया है. ये सभी नाम तो बाबा साहब का लेते हैं मगर बाबा साहब जिनका नाम लेते थे, बस उनका ही नाम नहीं लेते. ये अपनी पार्टी और नेता का नाम लेते हैं मगर उस समाज का नाम नहीं लेते जिनके लिए बाबा साहब संसद में इन्हें बिठा गए हैं. नाम लेते तो इन सौ से अधिक दलित आदिवासी सांसदों के कलेजे पर भी हर लाठी के निशान मिलते. ये भी संसद की सीढ़ियों पर चीख़ते चिल्लाते. बोलते देश को कि देखो हमको ठीक से, हम तुम्हीं हैं, तुम्हीं हम हो. हमारी पीठ, तुम्हारी पीठ है. हमें अपना समझो. संविधान और सरकारों से इंसाफ़ माँगते मगर ये सांसद भी चुप रहे. सब चुप रहे.

गुजरात के दलितों ने गाय का अंतिम संस्कार मना कर वो काम किया है जिसे बहुत पहले करना चाहिए था. बाबा साहब ने बहुत पहले कह दिया था कि अगर इस काम से अछूत समझे जाते हैं तो हम ये काम नहीं करेंगे. किसी भी कीमत पर इन्हें ये काम बंद कर देना चाहिए था. इन गौ रक्षकों से कहना चाहिए कि तुम संभालो अपनी लाठी और अपनी गाय. क्रूरता और उस पर चुप्पी की भी हद होती है. शहर शहर हमारी गायें प्लास्टिक खा रही हैं. गौ चर यानी गायों के चरने की ज़मीन पर किनका क़ब्ज़ा है. ये अभी साफ हो जाए इस देश के सामने. आपको पता चलेगा कि इन्हीं गौ रक्षकों की राजनीतिक जमात के लोगों का क़ब्ज़ा है. गाय की ज़मीन खा गए. अब गाय के नाम पर दलितों को मार रहे हैं.

दलितों की पीठ पर आज़ाद भारत की मानसिक ग़ुलामी की लाठी बरस रही है. गुजरात के कुछ दलित युवकों ने ज़हर पी कर आत्मविलोपन करने का प्रयास किया है. उन्हें खुदकुशी का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए. उन्हें समाज, संसद और सरकार से सवाल करना चाहिए. गुजरात ही नहीं बिहार से लेकर यूपी तक क्यों है हमारे ख़िलाफ़ इतनी नफ़रत. क्यों हैं हमारी पीठ से इतनी चिढ़ कि दस लाख की कार वाले अपनी कार की पीठ बचाते रहे, हमारी पीठ पर लाठियाँ बरसाते रहें.

(साभार एनडीटीवी)

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