दलित कलाकार खोल रहे हैं एकजुटता का नया मोर्चा

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दलितों को समाज में बराबरी का दर्जा दिलाने की मुहिम लिए तमाम दलित कलाकार 15 सितंबर को एक मंच पर आए. इन कलाकारों में शीतल साठे, गिन्नी माही, संजय राजौरा और सुजत अंबेडकर शामिल हैं, जिन्होंने मिलकर दिल्ली के मावलंकर हॉल में एक इवेंट किया. आर्टिकल-14: लड़ाई बराबरी की- स्टैंड अप फॉर इक्वल राइट्स\”” नामक इस इवेंट में इन सभी ने दलितों के हक की आवाज उठाई. कई दलित संगठनों और दलित स्वा‍भिमान संघर्ष के अंतर्गत काम कर रहे कई वर्कर्स एसोसिएशन के लोग भी इसका हिस्सा बने. इसमें जो कलाकार शामिल हुए उनसे मिलिए-

शीतल साठे
शीतल साठे पुणे, महाराष्ट्र से हैं. दलित अधिकारों के लिए संघर्षरत और लोक गायिका, शीतल साठे ने 17 साल की उम्र से ही संगीत के जरिए दलितों को समाज में बराबरी दिलाने की मुहिम आरंभ कर दी थी. साठे, ”कबीर कला मंच” से ताल्लुक रखती हैं. इसी से उनके पति सचिन माली भी जुड़े हैं. तीन साल पहले 2013 में उन्हें महाराष्ट्र विधानसभा के सामने से तब गिरफ्तार किया गया था जब वे आठ माह की गर्भवती थीं. साठे पर माओवादियों को सपोर्ट करने का आरोप लगता रहा है. इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए वो तीन साल बाद अपने बेटे को लेकर दिल्ली पहुंची थी.

सुजत अम्बेडकर
सुजत पेशे से ड्रमर हैं. वे बाबासाहेब अम्बेडकर के पोते हैं और दलितों के लिए आवाज उठाते रहे हैं. उन्होंने इस इवेंट का नाम \””आर्टिकल 14\””, भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 के नाम पर चुना है.

गिन्नी माही
गुरकनवाल भारती अब गिन्नी माही के नाम से जानी जाती हैं. ये जालंधर में रहती हैं, दलित हैं और दलितों को केंद्र में रखकर ही गाती हैं. वे संत रविदास और बाबासाहेब अंबेडकर को अपना आइडल मानती हैं. वे भी दलितों के अधि‍कारों की बात करती हैं. गिन्नी सोशल मीडिया पर खासी पसंद की जा रही हैं. उनके गानों में जातिवाद, वित्तीय असामनता, सामाजिक असमानता आदि प्रमुख मुद्दे होते हैं.

संजय राजौरा
नई दिल्ली में जन्मे संजय राजौरा पेशे से कमेडियन हैं. इससे पहले वे सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में दस साल तक काम कर चुके हैं और इस लाइन के इंजीनियर्स के जीवन पर काफी कॉमेडी करते हैं. इसके अलावा वे राजनीति, धर्म, समाजिक असमानता आदि विषयों पर भी काफी जोक्स सुनाते हैं.

क्या है मांग

ये सभी कलाकार लंबे समय से दलितों को समाज में एक समान अधि‍कार दिलाने की बात करते रहे हैं. इसके लिए ये अपने संगीत, गायन, लेखन आदि का सहारा लेते हैं. इनमें से कुछ पर सामाजिक असमानता बढ़ाने व माओवादियों को सपोर्ट करने के आरोप भी लगते रहे हैं.

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