ग्राउंड रिपोर्ट: ‘गाय मरे तो लोग सड़क पर, दलित मरे तो ख़ामोशी’

BBC Source

दिल्ली के हिरण कुदना इलाके में बहने वाले नाले में आसपास के घर, मोहल्लों और फ़ैक्ट्रियों का मल-मूत्र, केमिकल्स और कूड़ा जमा होता है.
पास ही सड़क से लगी खाली जगह पर निकाल कर रखा गया पुराना कूड़ा जम कर कड़ा हो चुका था.
चारों ओर फैली सड़न से सांस लेना मुश्किल था. नीतू और अजीत नाले में गर्दन तक डूबे हुए थे.

कभी-कभी मैला पानी उनकी नाक की उंचाई जाता था. उन्होंने ज़ोर से मुंह बंद कर रखा था.
एक के हाथ में बांस की खपच्ची थी. दूसरे के हाथ में लोहे का कांटा जिससे वो नाले की तली में फंसे कूड़े को खोद रहे थे.
कांटे को हिलाते ही कालिख मटमैले पानी की सतह पर तैर गई और उन्हें घेर लिया.
नीतू ने इशारा किया, “काला पानी गैस का पानी होता है. वही गैस जो लोगों की जान ले लेती है.”

“हम बांस मारकर देख लेते हैं कि वहां गैस है कि नहीं. फिर हम घुसते हैं. बंदे इसलिए मरते हैं जब वो बिना देखे घुस जाते हैं.”
दिन के 300 रुपए कमाने के लिए वो नाले में पाए जाने वाले सांप, मेढक जैसे जानवरों के लिए भी तैयार थे.
नाले से निकलकर जांघिया पहने दुबले-पतले नीतू थोड़ी देर धूप में खड़े ही हुए थे तो पसीना उनके नंगे शरीर पर लगे बदबूदार पानी और कीचड़ से मिलकर अजीब सी महक पैदा कर रहा था.
सीवर में कांच, कांक्रीट या ज़ंग लगे लोहे के कारण कई बार नीतू का पांव कट चुका था.
काले कीचड़ से सने पांव का कुछ घाव अभी भी ताज़ा था क्योंकि उन्हें भरने का मौका ही नहीं मिला.

ग़ैर-सरकारी संस्था प्रैक्सिस ने एक रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि हर साल दिल्ली में करीब 100 सीवर कर्मचारियों की मौत होती है.
वर्ष 2017 जुलाई-अगस्त के मात्र 35 दिनों में 10 सीवर कर्मचारियों की मौत हो गई थी.
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के मुताबिक उसने 1993 से अब तक पूरे भारत में हुईं करीब 1500 मौतों के दस्तावेज़ जुटाए हैं लेकिन असल संख्या कहीं ज़्यादा बताई जाती है.

लाखों लोग आज भी इस काम से जुड़े हैं. ये काम करने वाले ज़्यादातर दलित हैं. सीवर में मौतें हाईड्रोजन सल्फ़ाइड के कारण होती हैं.
सीवर में काम करने वालों को सांस, चमड़ी और पेट की तरह तरह की बीमारियों से भी जूझना पड़ता है. नीतू ने ये काम 16 साल की उम्र में शुरू किया.

दिल्ली में वो अपने जीजा दर्शन सिंह की फ़ास्ट फूड दुकान में रहते हैं.
दुकान तक पहुंचने के लिए झोपड़पट्टी की तंग गलियों से गुज़रना होता है. इन्हीं झोपड़पट्टियों में कई सीवर कर्मचारी रहते हैं.
संकरी गली के दोनो तरफ़ घर के दरवाज़े पर कहीं महिलाएं चूल्हे पर रोटी पका रही थीं तो कहीं दुकानदार सब्ज़ियों के साथ साथ मुर्गियों के अलग अलग हिस्सों को एक पटरी पर करीने से सजा कर ग्राहकों का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे.
आसपास की आबादी इतनी थी कि सांस लेने के लिए ज़ोर लगाना पड़ रहा था. कूड़े को पार कर हम दर्शन सिंह के ढाबे पर पहुंचे.

दर्शन सिंह ने 12 साल मैला साफ़ किया लेकिन पास की इमारत में दो साथियों की मौत होने के बाद उन्होंने ये काम छोड़ने का फ़ैसला किया.

उन्होंने बताया, “एक अपार्टमेंट में एक पुराना सीवर लंबे वक्त से बंद था. उसमें बहुत गैस थी. हमारे झुग्गियों में रहने वाले दो लोगों ने 2000 रुपए में उसे साफ़ करने का कांट्रैक्ट लिया. पहले जो बंदा घुसा वो वहीं रह गया क्योंकि गैस ज़बरदस्त थी. उसके बेटे ने पापा पापा की आवाज़ दी. पापा को ढूंढने वो घुसा लेकिन वापस नहीं आया. दोनो अंदर ही खत्म हो गए. मुश्किल से उन्हें निकाला गया. तबसे हमने ये काम बंद कर दिया.”

नंगे बदन काम
कानून के मुताबिक सीवर साफ़ करने का हाथ से काम आपातकाल में ही करना होता है और उसके लिए सीवर कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण देना होता है. लेकिन असल में ज़्यादातर कर्मचारी नंगे बदन सीवर में काम करते हैं.
ऐसी घटना में हर मृत के परिवार को 10 लाख की मदद दिए जाने का प्रावधान है लेकिन अखिल भारतीय दलित महापंचायक के मोर सिंह के मुताबिक इसमें कागज़ी कार्रवाई इतनी होती है कि हर व्यक्ति को ये मदद नहीं मिल पाती.
ऐसे ही एक घटना में दिल्ली के लोक जननायक अस्पताल का सीवर को साफ़ करने के दौरान 45 वर्षीय ऋषि पाल की मौत हो गई.
रविवार का दिन था. ऋषि पाल की बेटी ज्योति को पापा के एक साथी का फ़ोन आया कि वो जल्द अस्पताल पहुंचे क्योंकि पापा की तबियत खराब हो गई है.

ऋषि पाल की पत्नी और तीन बच्चे भागते अस्पताल अस्पताल पहुंचे लेकिन पता चला कि ऋषि पाल की मौत हो चुकी थी.
उनका शव एक स्ट्रेचर पर रखा हुआ था. उनके शरीर, कपड़ों पर सीवर की गंदगी अभी भी लगी थी. ज्योति ने धीमी आवाज़ में बताया, “हमें यहां आकर पता चला कि वो (पापा) कोई भी सुरक्षा उपकरण इस्तेमाल नहीं करते थे.”
नज़दीक चादर पर महिलाओं के साथ बैठीं ज्योति की मां अभी भी सदमें में थीं. साथी सीवर कर्मचारी गुस्से में थे. वो मुझे उस सीवर तक ले गए जहां ऋषि पाल की मौत हुई थी.
पास खड़े सुमित ने ऋषि पाल को बचाने की कोशिश की थी लेकिन वो खुद मरते-मरते बचे.
उन्होंने मुझे बताया, “ऋषि पाल रस्सी बांध कर (सीवर में) नीचे उतरे. मैंने उन्हें आवाज़ दी, उस्ताद क्या आप नीचे पहुंच गए? उन्होंने हाथ उठाया और वो (अचानक) वहीं गिर पड़े. मुझे लगा कि कीचड़ की वजह से उनका पैर फिसल गया है. मैंने नीचे जाने के लिए सीढ़ी पर पांव रखा. इतने में ही मुझे भी गैस चढ़ गई. मैं हिम्मत करके बाहर आया और पास ही लेट गया. उसके बाद का मुझे कुछ याद नहीं.”

पास ही खड़े एक दूसरे व्यक्ति ने कहा, “अगर ये घटना अस्पताल के बाहर कहीं हुई होती तो और लोगों की मौत हो जाती.”
कौन ज़िम्मेदार
अस्पताल के मेडिकल डायरेक्ट जेसी पासी ने मौत पर शोक जताया लेकिन ज़िम्मेदारी से इनकार किया.
वो कहते हैं, “अस्पताल के सीवर की ज़िम्मेदारी पीडब्ल्यूडी की है…. अगर सीवर कर्मचारी को सुरक्षा उपकरण नहीं दिए गए तो ये मेरी ज़िम्मेदारी नहीं.”
दिल्ली जल निगम की डायरेक्टर (रेवेन्यू) निधि श्रीवास्तव ने मौतों की जिम्मेदारी ली और कड़े कदमों का भरोसा दिलाया.
लेकिन इन वायदों पर कितना भरोसा किया जाए?
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के बेज़वाड़ा विल्सन कहते हैं, “अगर एक महीने में दिल्ली में 10 गाएं मर जाएं तो हंगामा मच जाएगा और लोग सड़कों पर निकल जाएंगे. इसी शहर में एक महीने में 10 दलित सीवर कर्मचारियों को मौत हो गई लेकिन एक आवाज़ नहीं उठी. ये चुप्पी कचोटने वाली है.”
वो कहते हैं, “कोई भी व्यक्ति दूसरे का मल-मूत्र साफ़ नहीं करना चाहता लेकिन सामाजिक ढांचे के कारण दलित ये काम करने के लिए मजबूर हैं. जब हम मंगलयान तक जाने का सोच सकते हैं तो इस समस्या से क्यों नहीं निपट पा रहे हैं.”

विल्सन के मुताबिक जहां सरकार लाखों लाख नए शौचालय बनाने की बात करती है, इन शौचालचों के लिए बनाए जा रहे पिट्स या गड्ढ़ों को साफ़ करने के बारे में कोई नहीं सोचता.
नीतू के जीजा दर्शन सिंह कहते हैं, “हम अनपढ़ हैं. हमारे पास कोई काम नहीं है. परिवार को पालने के लिए हमें ये काम करना पड़ता है. अगर हम बंद सीवर के बारे में पूछते हैं तो अफ़सर कहते हैं, आप इसमें घुसिये और काम करिए. पेट के लिए हमें करना पड़ता है.”
“कई बार हम बच्चों को नहीं बताते क्योंकि ये गंदा काम होता है. हम कह देते हैं कि हम मज़दूरी करते हैं. हम सोचते हैं कि अगर हमने उन्हें सच बता दिया तो वो हमसे नफ़रत करने लगेंगे. कुछ लोग शराब पीते हैं. मजबूरी में आंख मीच कर काम करते हैं.”
“लोग हमें दूर से पानी देते हैं. कहते हैं, वहां रखा है, ले लो. नफ़रत भी करते हैं. बहुत से लोग हमसे नफ़रत करते हैं क्योंकि ये गंदा काम है. हम अगर नफ़रत करेंगे तो हमारा परिवार कैसे चलेगा.”

विनीत खरे की रिपोर्ट बीबीसी से साभार

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