बाबा साहेब के ब्राह्मणीकरण की साजिश

भारत में जो भी ज्ञानी-ध्यानी लोग पैदा होते हैं…. वो किसी भी जाति में पैदा हों….. ये ब्राह्मण उन्हें अपनी संतान कहने का कोई न कोई कारण ढूंढ ही लेते हैं…. इस जन्म की बात घोषित करें या पूर्वजन्म की….. यानि कि चित भी मेरी….पट भी मेरी……ये हिन्दू को मुसलमान और मुसलमान को हिन्दू बनाने में तनिक भी देर नहीं करते…… साईं बाबा मुसलमान थे….. उन्हें अपना ईष्ट बना लिया और ……. हो गई पौबारा…. वर्ष भर में इतना दान किसी और देवता के नाम पर नहीं आता जितना साईं बाबा के मन्दिर पर आता है……और ये अधम अपने आपको उनकी कृपा पर ही छोड़ देते हैं……. यही कारण है कि भारत से कभी भी दास प्रथा जाने वाली नहीं लगती…एक कारण और भी है कि अधम समाज में पैदा हुए तथाकथित समाज सुधारक अपना पेट भरने में ही जुटे रहे और आज भी वैसा ही हो रहा है.

उल्लिखित है कि साईंबाबा जिन्हें शिरडी साईंबाबा भी कहा जाता है और जिन्हें मुसलमान जाति का बताया जाता है….. पिछले महीनों हिन्दू मठाधीशों ने साईंबाबा की जाति को लेकर काफी हौ-हल्ला भी किया था. कहा गया था वो एक फकीर थे जिन्हें उनके भक्तों द्वारा संत कहा जाता है. उन्हें भगवान कैसे माना जा सकता है किंतु हिन्दुओं के बड़े तबके ने शोर मचाने वालों की एक नहीं सुनी और साईंबाबा भगवान ही बने हुए है. कारण यह नहीं कि हिन्दू मुसलमनों के प्रति सम्मान का भाव रखते हैं, कारण ये है कि साईंबाबा बाबा के शिरडी स्थित मन्दिर में इतना चढ़ावा आता है जो कई हिन्दू देवताओं के नाम पर बने मन्दिरों में आने वाले चढ़ावे से भी कई गुना होता है. ब्राह्मण जो कभी राम-कृष्ण का भक्त हुआ करता था, अब अब साईं बाबा का पक्का भक्त बन गया है क्यूं की वो साईं के बड़ते हुए भक्तो की संख्या और उसपे चढ़ने वाले चढ़ावे के लालच को कैसे छोड़ सकता है …इसलिए अब हर मंदिर में उनकी मूर्ति स्थापित करता है, पर ये वही ब्रह्माण वर्ग है जिसने साईं को जीते-जी कभी मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया …और अब उनकी मूर्ति मंदिर में स्थापित करता है और दिन रात साईं के गुण गाने में मग्न है.

बड़े-बड़े तथाकथित दलित राजनेता पालतू कुत्ता बने रहकर कुर्सी पाने के लालच में वर्चस्वशाली राजनैतिक दलों के नेताओं न केवल तलुए चाटने पर लगे होते हैं… सत्ता में कुर्सी पाने के बाद “ब्राह्मण” हो जाते हैं. कमजोर और निरीह जनता को तो केवल मोहरा बनाए रखने का काम करते हैं. कहना न अतिश्योक्ति न होगा कि समाज के कमजोर और निरीह समाज में पैदा हुए बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद के शिकार होने से नहीं बच पाते. और जो बच जाते हैं, उनको ब्राह्मण घोषित करने के प्रयास बार-बार किया जाता रहा है. 21 अगस्त को ही उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में ब्राहमण चेतना मंच के कार्यक्रम में भाजपा के राज्यसभा सांसद शिव प्रताप शुक्ल ने अपने संबोधन में कहा, “बाबा साहेब अंबेडकर दलित नहीं थे, वो सनाड्य ब्राह्मण थे. वो पंडित दीनदयाल उपाध्याय से प्रेरित थे, उन्होंने लोगों को ऊपर उठाने का काम किया, इसलिए उन्होंने संविधान लिखा. उनका नाम अंबेडकर नहीं था उनका नाम था भीमराव, लेकिन अब उन्हें बाबा साहेब अंबेडकर कहा जाता है.” भाजपा के राज्यसभा सांसद शिव प्रताप शुक्ल का यह बयान यूं ही नहीं आया होगा अपितु इस बयान के पीछे बाबा साहेब के ब्राह्मणीकरण की बू आती है.

उन्होंने बसपा का नाम लिए बिना निशाना साधते हुए आगे कहा कि इस देश में ब्राह्मणों ने इतिहास रचा था, लेकिन आज यहां अम्बेडकर के नाम पर राजनीति होती है. जरा भी कुछ हो जाता है तो दंगे शुरू हो जाते हैं. लेकिन अंबेडकर का नाम भीमराव न कहकर बाबा साहब अंबेडकर कहने वाले लोगों से पूछना चाहता हूं कि भीमराव को उनकी प्राथमिक शिक्षा दिलाने का काम किसने किया था, उन्हें यूरोप में शिक्षा दिलाने का काम किसने किया था. भीमराव अपने नाम के आगे अंबेडकर की उपाधि लगाए थे, यह उनका नाम नहीं था… सांसद शिव प्रताप शुक्ल के इस बयान से स्पष्ट हो जाता है कि उनको बाबा साहेब के जीवन के बारे में कुछ भी पता नहीं है. जब उन्हें इतना ही पता नहीं है कि बाबा साहेब की प्राथमिक और उच्च शिक्षा दिलाने के पीछे कौन-कौन लोग रहे तो उन्हें और क्या पता होगा. उनका यह बयान हवा में पत्थर उछालने जैसा ही है. बिना सिरपैर की बयानबाजी करना ही ब्राह्मण की सबसे बड़ी खूबी है जिसके जाल में अज्ञानी लोग आराम से फंस जाते हैं.

आरएसएस और अब उसके द्वारा पोषित भाजपा का यह कोई पहला अवसर नहीं है कि जब उसने किसी न किसी के जरिए बाबा साहेब को अपने पाले में करने और अनुसूचित जातियों में फूट डालने का प्रयास किया है. इससे पूर्व भी ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ पहले भी ऐसे कार्य कर चुकी है. संघ के झंडेवालान द्वारा प्रकाशित डा. कृष्ण गोपाल द्वारा लिखित पुस्तक “ राष्ट्र पुरूष: बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर” में अनेक ऐसे झूठे प्रसंग है. जिनके कोई हाथ-पैर तो क्या कोई जमीन तक भी नहीं है. इन प्रसंगों के जरिए बाबा साहब को पूरा-का-पूरा सनातनी नेता, गीता का संरक्षक, यज्ञोपवीत कर्ता, महारों को जनेऊ धारण कराने वाले के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो बाबा साहब के प्रारंम्भिक जीवन काल के हैं. दुख तो ये है कि संदर्भित पुस्तक के रचियता ने 1929 और 1949 के बीच के वर्षों पर कोई चर्चा नहीं की है जबकि बाबा साहब का मुख्य कार्यकारी दौर वही था.

पुस्तक के लेखक ने सबसे ज्यादा जोर बाबा साहब को मुस्लिम विरोधी सिद्ध करने पर लगाया है जो दुराग्रह पूर्ण कार्य है. इतना ही नहीं, डा. कृष्ण गोपाल के मन का मैल पुस्तक के पेज 5 पर उल्लिखित इन शब्दों में स्पष्ट झलकता है– “एक अपृश्य परिवार में जन्मा बालक सम्पूर्ण भारतीय समाज का विधि-विधाता बन गया. धरती की धूल उड़कर आकाश और मस्तक तक जा पहुंची”.  इस पंक्ति का लिखना-भर ही सीधे-सीधे बाबा साहेब का अपमान करना है, और कुछ नहीं. इन पंक्तियों में पूरा का पूरा मनुवाद भरा पड़ा है.

लेखक तेजपाल सिंह तेज  एक लेखक हैं.  तेजपाल सिंह तेज को (हिन्दी अकादमी (दिल्ली) ने बाल साहित्य पुरस्कार और साहित्यकार सम्मान  से सम्मानित किया जा चुका है. इनका संपर्क सूत्र tejpaltej@gmail.com है.

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