उत्तराखंड सरकार का स्पेशल ब्रेक एक सांप्रदायिक फैसला

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उत्तराखंड की सरकार ने एक अजीब और विवादित निर्णय लिया है. उसने प्रदेश के सभी कार्यालयों में मुस्लिम कर्मचारियों के लिए शुक्रवार के दिन दोपहर में जुमा की नमाज अदा करने के लिए कुछ समय का ब्रेक देने का फैसला किया है. शुक्रवार को दोपहर में जुमा की नमाज पढ़ी जाती है और इसे सामूहिक रूप से जिन मस्जिदों में पढ़ी जाती है उसे जामा मस्ज़िद कहते हैं. हर व्यक्ति को उपासना की स्वतंत्रता देश का संविधान देता है. लेकिन यह स्वतंत्रता भी अबाध नहीं है. सरकारी दफ्तरों का एक अनुशासन है और हर सरकारी कर्मचारी जो किसी भी जाति या धर्म का हो, वह उन नियमों और व्यवस्थाओं से बंधा होता है. कर्मचारी को जिसने भी संविधान की शपथ ली है उसे उन नियमों और व्यवस्था के अंतर्गत काम करना पड़ता है. उत्तराखंड के संदर्भ में यह तर्क दिया जा सकता है कि, वहां मुस्लिम आबादी कम हैं और कर्मचारी भी कम हैं और इनमें से कुछ अगर दोपहर के समय घंटे डेढ़ घंटे के लिए नमाज़ के लिए कार्यालय से चले भी जाते हैं तो, क्या फर्क पड़ता है? यह मान भी लिया जाय कि कोई फर्क नहीं पड़ता है तो भी यह निर्णय अनेक समस्याओं को जन्म देगा और विवाद भी बढ़ाएगा.

1. इस निर्णय का सबसे पहला दुष्परिणाम यह होगा कि, कार्यालय में सीधे तौर पर धर्म के आधार पर कर्मचारियों में मानसिक बंटवारा होगा.

2. कार्यालय के अन्य कर्मचारी भी धर्म के आधार पर ही अपनी अपनी उपासना पद्धति के अनुसार अपने अपने लिए पूजा पाठ हेतु ब्रेक मांगने लगेंगे.

जैसे किसी को शिव मंदिर जाना है तो सोमवार को, किसी को बजरंग बली का दर्शन करना है तो मंगलवार या शनिवार को या दोनों दिन ही, या किसी को गणपति का दर्शन करता है तो बुधवार को, आदि आदि, सभी अपनी सुविधा के अनुसार घंटा दो घंटा का ब्रेक मांगने लगेंगे और न मिलने पर विवाद होगा जिसका प्रभाव कार्यालय के सद्भाव और अनुशासन पर पड़ेगा.

3. अचानक धार्मिक कर्मचारियों की संख्या बढ़ जायेगी. जिसने कभी भी नियमित जुमा की नमाज भी न पढ़ी हो, और जिसने कभी शिव, हनुमान, और गणपति का दर्शन भी सोम, मंगल, शनि और बुध को न किया हो, वह भी परम आस्तिक भाव से उन घंटे दो घण्टों के लिए कार्यालय से बाहर रहेगा, जिसका असर कार्यालय की गुणवत्ता और काम काज पर पड़ेगा.

4. यह फैसला भी संविधान के समानता के अधिकार की भावना के सर्वथा विपरीत है. धर्म और जाति के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जा सकता है.

5. अगर सेवा, आवश्यक हुई तो इसका और भी विचित्र हाल होगा. चिकित्सा, बिजली, पुलिस आदि सेवाओं में पता लगा कि कोई जरूरी काम हो रहा है तभी किसी के नमाज़ का वक्त हो गया तो, उस काम का क्या होगा? यह सम्भावना भी अकल्पनीय नहीं है. यह तर्क दिया जा सकता है कि अगर कोई आपात स्थिति है तो कार्यालयाध्यक्ष ब्रेक रद्द कर सकता है. पर जहां अनुशासन का बुरा हाल होगा वहां तो लोगों की धार्मिक भावनाएं बहुत ही जल्दी आहत होने लगेंगी! इसके अतिरिक्त हो सकता है, अन्य समस्याएं भी उत्पन्न हो जाएं जिसका अनुमान मैं अभी नहीं लगा पा रहा हूं.

1947 में धर्म के आधार पर भारत बंटा जरूर था, पर हमने धर्म के आधार पर देश के शासन की पद्धति नहीं चुनी थी. पाकिस्तान ने इस्लामी गणराज्य का मार्ग चुना था, हमने नहीं. हमने एक धर्म निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य का मार्ग चुना था. तमाम विरोधों के बावज़ूद भी हम उन्हीं मूल्यों पर टिके हुए हैं. मूल संविधान की प्रस्तावना में धर्म निरपेक्ष शब्द का समावेश न होने पर भी संविधान पूरी तरह धर्म निरपेक्ष मूल्यों पर ही आधारित है. यह आदेश इस मूल भावना के विपरीत ही नहीं बल्कि प्रत्यक्षतः सांप्रदायिक है और तुष्टिकरण की ओर स्पष्ट संकेत करता है. इस आदेश से चुनाव की प्रतिध्वनि भी आप सुन सकते हैं. यह आदेश वापस होना चाहिए और उत्तराखंड के वरिष्ठ अधिकारियों को इस आदेश के संभावित खतरे और परिणामों की ओर भी सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहिए. धर्म निरपेक्ष अगर हैं तो धर्म निरपेक्ष दिखना भी चाहिए. यह फैसला निंदनीय है.

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