तीन तलाक पर अब केंद्र सरकार दिखाए अपनी नियति!

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21 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. इस फैसले में मुस्लिम समुदाय का एक प्रथा जो सदियों चली आ रही थी, उसका अंत हुआ. इस प्रथा को तीन तलाक या तलाक-ए-बिद्दत कहते हैं. अगर किसी मुस्लिम पुरूष के मुंह से 3 बार तलाक शब्द निकल जाए तो उसे तलाक मान लिया जाता है. कुरान मैं इसका कोई ज़िक्र नहीं है, यह बस एक कुप्रथा है. दुनिया में ऐसे बहुत से मुस्लिम देश हैं जहां 3 तलाक पर कानूनी रूप से रोक लगा दी गई है, लेकिन भारत मे यह प्रथा पिछले 1400 वर्षों से चली आ रही है.

भारत में तीन तलाक का मुद्दा 1978 से शुरू हुआ. इंदौर की रहने वाली शाहबानो को उनके पति मोहम्मद एहमद खान ने 1975 में घर से निकाल दिया था. लेकिन शाहबानो के 5 बच्चे थे. घर से बाहर निकालने से पहले एहमद खान दूसरी शादी कर ली थी और दोनों पत्नियों के साथ रहने लगे. एहमद खान ने शाहबानों के साथ जो 14 साथ साल बिताए थे उसने मात्र तीन बार तलाक बोल कर खत्म कर दिया और शाहबानो को बच्चों सहित घर से बाहर निकाल दिया. प्रथा के अनुसार जो मेहर होती है वह भीं देने से इंकार कर दिया.

उसके बाद शाहबानो अदालत मैं गई, फैसला भी आया लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने कानून में बदलाव कर दिया. इसे अभी तक एक गलती मानी जाती है. इसका जिक्र पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक में किया है. शाहबानो के केस से शुरू हुआ ये मामला 2015 तक आया. इसके बाद 7 और मामले प्रकाश में आए जो शायरा बानो, आफरीन रेहमान, गुलशन परवीन और अतिया साबरी ने दायर किए थे. सुप्रीम कोर्ट में ऐसे और भी कई मामले थे जिन्हे देखते हुए इन पर सुनवाई शुरू की गई और तुरंत फैसला सुनाया गया.

पांच जजों की बेंच ने 3-2 के बहुमत से यह फैसला सुनाया की तलाक असंवैधानिक हैं, रीति रही हो या फिर परंपरा, लेकिन ये कानून की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है, न्यायाधीशों के बेंच में चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर, जस्टिस कूरियन जोसेफ, जस्टिस रोहिंताम फालिमिस्ट्री, जस्टिस उदय प्रकाश ललित और जस्टिस अब्दुल नाज़ी शामिल थे. यह सभी अलग-अलग धर्म के हैं.

2011 जनगणना के अनुसार करीब 20,30,000 महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें बिना तलाक दिए घर से बाहर निकाल दिया गया. इनके सामने एक नहीं बल्कि कई सारी समस्याएं हैं, एक तो पति ने घर से निकाल दिया और अब वह अपने मां-बाप के पास भी चली जाती हैं तो वहां लावारिस बन कर रह जाएंगी. पारम्परिक रूप से लड़कियों को पराया धन माना जाता है. ये अब दूसरी शादी भी नहीं कर सकती क्योंकि यह तलाकशुदा नहीं हैं.

वृन्दावन हो, बनारस हो या फिर हरिद्वार, यहां ऐसी विधवाएं हैं जिन्हें उनके घर वालो ने भी छोड़ दिया है, क्योंकि भारत में आज भी विधवाओं को बोझ माना जाता है. अकेले वृन्दावन मैं ऐसे 4 आश्रम है जहां इन्होंने पनाह ली है और भीख मांगने को मजबूर हैं. हम सरकार से यह उम्मीद करते हैं कि जब भी वह तीन तलाक के ऊपर कानून बनाएं तो इन सभी महिलाओ के बारे में भी सोचें जिन्हे उनके पतियों ने छोड़ दिया है.

अब देखना होगा कि न्यायपालिका के फैसले के बाद केंद्र सरकार तीन तलाक पर कैसा कानून बनाती है? तीन तलाक पर सरकार द्वारा कानून बनाना एक चुनौती पूर्ण काम होगा. सरकार के तीन तलाक को कानूनी अमलीजामा पहनाया जाएगा तो सरकार के पक्ष और विपक्ष दोनों में मुस्लिम लोग और संस्थाए शामिल होगी. हालाकिं कुछ मुस्लिम संस्थाएं और धर्मगुरू न्यायपालिका के इस आदेश का विरोध कर रहे हैं. केंद्र सरकार का तीन तलाक मुद्दे पर कानून बनाना उनकी राजनीति को प्रभावित करेगा.

लेखक पत्रकार हैं

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