लखनऊ में मना 12वां डाइवर्सिटी डे

लखनऊ। भारत जैसी भीषणतम गैर-बराबरी दुनियां में कहीं नहीं है. यहां 10 प्रतिशत अल्पजन विशेषाधिकार युक्त तबकों का धन-संपदा पर 81 % कब्ज़ा है, जबकि शेष 90 प्रतिशत लोग महज 19-20 धन –संपदा पर गुजर-बसर करने के लिए मजबूर हैं. इस स्थिति को अगर बदलना है तो सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों,पार्किंग, परिवहन, फिल्म-मीडिया सहित शासन-प्रशासन इत्यादि तमाम क्षेत्रों में अवसरों का बंटवारा भारत के प्रमुख सामाजिक समूहों- सवर्ण, ओबीसी, एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों – के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में करना होगा. यह बातें 25 दिसंबर को लखनऊ के अमराई गाँव के अम्बेडकर पार्क में, शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन की लड़ाई लड़ रही बहुजन डाइवर्सिटी मिशन, दिल्ली द्वारा आयोजित, 12वें डाइवर्सिटी समारोह में जोर-शोर से उठीं.

इसमें देश के जाने-माने दर्जन भर के करीब लेखक-पत्रकार और शिक्षाविदों ने शिरकत किया जिनमें डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल, माता प्रसाद, प्रो. रमेश दीक्षित, प्रो. कालीचरण स्नेही, डॉ. प्रो. रामनरेश चौधरी, प्रो (डॉ.) एस. एन. शंखवार, शिल्पी चौधरी, फ्रैंक हुजुर, अरसद सिराज मक्की, डॉ. राजबहादुर मौर्य, डॉ. कौलेश्वर “प्रियदर्शी”, मा. सर्वेश आंबेडकर, चंद्रभूषण सिंह यादव, कॉमरेड प्रेम रंजन इत्यादि प्रमुख रहें.

इस अवसर पर सबसे पहले दिवंगत कॉमरेड प्रभुलाल के अवदानों को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि दी गयी. उसके बाद डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ इंडिया के रूप में मशहूर एच एल दुसाध की चार किताबों के साथ डॉ. कौलेश्वर प्रियदर्शी और डॉ. अनीता गौतम द्वारा लिखी पुस्तक ‘एच. एल. दुसाध: डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ इंडिया’ का विमोचन हुआ. डाइवर्सिटी डे के अवसर पर हर साल शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन के विचार में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ द इयर’ का सम्मान दिया जाता रहा है. इस बार फ्रैंक हुजूर, चंद्रभूषण सिंह यादव और डॉ. कौलेश्वर प्रियदर्शी को ‘डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ द इयर’ के खिताब से नवाजा गया.

कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन खुद बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के संस्थापक अध्यक्ष एच.एल. दुसाध ने किया. उन्होंने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि अगर मार्क्स के अनुसार दुनिया का इतिहास धन-संपदा के बटवारे पर केन्द्रित वर्ग संघर्ष का इतिहास है तो भारत का इतिहास आरक्षण पर केन्द्रित वर्ण-व्यवस्था के सुविधाभोगी अल्पजन और वंचित बहुजन के मध्य संघर्ष का इतिहास है. इस कारण ही जब मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने पर एससी/एसटी के बाद जब पिछड़ों को थोडा आरक्षण मिला, वर्ण-व्यवस्था के सुविधाभोगी वर्ग के हितैषी शासकों ने नव उदारवादी अर्थनीति को हथियार बनाकर आरक्षण को कागजों तक सिमटाने का षड्यंत्र शुरू किया.

इस अवसर पर अपनी बात रखते हुए बुन्देलखंड विश्वविद्यालय के डॉ. राज बहादुर मौर्य ने कहा कि सारी दुनिया में सामाजिक न्याय पर प्रोफ़ेसर लोग अमेरिकी विद्वान जान रावल की किताब का अनुसरण करते हैं, किन्तु मेरा मानना है कि एच.एल. दुसाध ने रावल से बहुत आगे का चिंतन कर लिया है. आज नहीं तो कल देश के बुद्धिजीवियों को दुसाध के चिंतन का समर्थन करना ही पड़ेगा. प्रोफ़ेसर कालीचरण स्नेही ने कहा कि तुम कुछ भी करो, हमें उसमें हिस्सेदारी दे दो. यहाँ तक भ्रष्टाचार में भी हमें हिस्सदारी चाहिए.

मुख्य अतिथि माता प्रसाद ने अमेरिका के कालों की भांति भारत के दलितों को सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, फिल्म- मीडिया में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए. जबतक दलित वाचितों को अमेरिका के कालों की भांति हर क्षेत्र में भागीदारी नहीं मिलती, यह देश आगे नहीं बढ़ सकता. इस बात को बार-बार अमेरिका जाने वाले भारत के हुक्मरानों को समझना चाहिए. कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने कहा कि पूरा देश दुसाध को आज डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ इंडिया के रूप जानता है. हमने डाइवर्सिटी के विषय में दुसाध से ही सीखा. उन्होंने बहुत जोर देकर कहा कि आरक्षण और डाइवर्सिटी हासिल करने के लिए बहुजन समाज को एक होना ही होगा. धन्यवाद ज्ञापन रंजन कुमार ने किया.

रिपोर्ट- कविश कुमार

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