निकाय चुनावः हापुड़ में टिकट को लेकर बसपा में घमासान

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मान्यवर काशीराम बहुजन समाज को ज्यादा से ज्यादा सत्ता के केंद्र में पहुंचाना चाहते थे. मान्यवर को जानने वाले बताते हैं कि मान्यवर चाहते थे कि बहुजन समाज की हर जाति का काबिलियत रखने वाला नेता सांसद, विधायक और मेयर बने. लेकिन मान्यवर के मिशन को किस तरह पलीता लग रहा है, इसको एक स्थानीय (हापुड उत्तरप्रदेश) केस स्टडी से समझने की कोशिश करते हैं.

यूपी में इन दिनों निकाय चुनाव चल रहे हैं. हापुड़ नगर पालिका परिषद अबतक सुरक्षित सीट थी लेकिन हापुड़ को इस बार सामान्य कर दिया गया. एक दलित चेहरा जो पिछले कई साल से ज़मीन पर मेहनत कर रहा था, चुनाव से पहले ही शहर में लोकप्रिय हो गया था. नाम है Manish Singh. मनीष को काफी पहले आधिकारिक रूप से प्रत्याशी घोषित किया जा चुका था चूंकि सीट सामान्य हो गयी तो अब नामांकन से ऐन पहले मनीष का टिकिट काटकर किसी अनजान से चेहरे अमित अग्रवाल को टिकिट दे दिया गया. पहली बार इस शख्स का नाम सुना है.

अमित को टिकिट क्यों दिया गया ये सब जानते हैं. ये किसी से छुपा नहीं है कि बसपा में मोटी रकम के बिना टिकिट हासिल करना नामुमकिन है! पार्टी की आर्थिक हालत के लिए ज़रूरी हो सकता है. लेकिन टिकटों की बोली लगाने का ये तरीका कहाँ तक जायज़ है इस पर विचार किया जाना चाहिए. अब सवाल ये है कि क्या बसपा की नीति में दलित रिज़र्व सीट तक ही सीमित हैं? क्या सामान्य सीट पर दलित चुनाव नहीं लड़ सकता?

या युं कहें बसपा …
कुछ ऐसा ही विधानसभा के चुनावों में हुआ था. मनीष सिंह तब भी टिकिट के प्रबल दावेदार थे. उस वक़्त भी श्रीपाल नाम के एक अनजान शख्स को टिकिट दे दिया गया. मैंने श्रीपाल को खुद देखा है कि वो अपने मोबाइल में नबंर सेव करना तक नहीं जानते थे. मैं ये नहीं कह रहा कि कम पढ़े लिखे लोग नेतृत्व नहीं कर सकते लेकिन पार्टी को समझने की ज़रूरत कि सिर्फ पैसे के बल कोई कैसे नेतृत्व खरीद सकता है. श्रीपाल के टिकिट का पैमाना बस ये थे कि बड़ा ठेकेदार और पैसे वाला था. नतीजा ये हुआ कि बसपा चुनाव हार गई.

दूसरी बार मनीष का टिकिट कटा है. मनीष का टिकिट कटने का विरोध शहर का दलित और मुस्लिम समुदाय कर रहा है. मनीष का टिकिट कटने के फैसले के विरोध में कल से कई पोस्ट देख चुका हूं. मेरी लिस्ट में बसपा के कट्टर समर्थक उनसे निर्दलीय चुनाव लड़ने की मांग कर रहे हैं. पिछली बार टिकिट कटने पर भी मनीष खामोश रहे थे और इस बार भी खामोश ही नज़र आ रहे हैं.

ये सिर्फ एक मनीष की कहानी नहीं है, पता नहीं मिशन के नाम पर कब तक ज़मीन पर काम करने वालों के साथ छल होता रहेगा. लोकसभा और विधानसभा में करारी हार के बावजूद मायावती अपनी शैली में बदलाव को तैयार नज़र नहीं आती. अगर ऐसा ही चलता रहा तो दलितों की नुमाइंदगी देर सबेर किसी और दलित नेता पर शिफ्ट हो जाएगी. जो लोग बसपा को इस बिना पर समर्थन करते हैं दलितों का सशक्तिकरण किया जा रहा है, उन्हें ठहरकर सोचने की ज़रूरत है.

मेरा मानना है बसपा को सोचने की जरूरत है के वो पिपल पर है या पियुपिल पर…!

जावेद की रिपोर्ट

 

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