जयंती विशेषः ब्राह्मणवाद के विध्वंसक थे रामस्वरूप वर्मा

भारत के सबसे बडे़ प्रान्त उत्तर प्रदेश के जनपद कानपुर देहात के गौरी करन गाँव में 22 अगस्त 1923 को एक साधारण किसान परिवार में रामस्वरूप वर्मा का जन्म हुआ. उनके पिता वंशगोपाल और माता का नाम सुखिया था. मा-बाप अपने बेटे रामस्वरूप को उच्च शिक्षा ग्रहण करवाना चाहते थे. वो पढ़ने में मेधावी भी थे. उन्होंने उस जमाने में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम०ए॰ और आगरा विश्विद्यालय से एल॰एल॰बी॰ की डिग्री प्राप्त की, जब शूद्रों के लिए शिक्षा का दरवाजा बन्द था. किन्तु ब्रिटिश हुकूमत के कारण शूद्रों और महिलाओं की शिक्षा का रास्ता प्रशस्त हो रहा था जिसका लाभ माननीय रामस्वरूप वर्मा को मिला. उन्होंने उर्दू, अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत भाषा की शिक्षा ग्रहण की. पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने तीन विकल्प थे. पहला विकल्प प्रशासनिक सेवा में जाना, दूसरा वकालत करना तथा तीसरा विकल्प था राजनीति के द्वारा मूलनिवासी बहुजनों व देश की सेवा करना.

वर्मा जी ने आई॰ए॰एस॰ की लिखित परीक्षा भी उर्त्तीण कर ली थी किन्तु साक्षात्कार के पूर्व ही वे निर्णय ले चुके थे कि प्रशासनिक सेवा में रहकर वे ऐशो आराम की जिन्दगी तो व्यतीत कर सकते हैं पर उन ब्राह्मणवाद से आच्छादित मूलनिवासी बहुजन समाज में व्याप्त भाग्यवाद, पुर्नजन्म, अन्धविश्वास, पाखण्ड, चमत्कार जैसी धारणा से निजात नहीं दिला सकते. इसलिए सामाजिक चेतना और जागृति पैदा करने के लिए उन्होंने 1 जून 1968 को सामाजिक संगठन ‘अर्जक संघ’ की स्थापना की. मा॰ रामस्वरूप वर्मा में राजनैतिक चेतना का प्रार्दुभाव डॉ॰ अम्बेडकर के उस भाषण से हुआ, जिसे उन्होंने मद्रास के पार्क टाउन मैदान में 1944 में शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन द्वारा आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में दिया था.

रामस्वरूप वर्मा पर डॉ॰ अम्बेडकर के उस भाषण का भी बहुत ही प्रभाव पड़ा जिसे उन्होंने 25 अप्रैल 1948 को बेगम हजरत महल पार्क में दिया था. डॉ॰ अम्बेडकर ने कहा था, ‘जिस दिन अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग एक मंच पर होंगे उस दिन वे सरदार बल्लभ भाई पटेल और पंडित जवाहर लाल नेहरू का स्थान ग्रहण कर सकते हैं.’ रामस्वरूप वर्मा ने एस॰सी॰, एस॰टी॰ एवं ओ॰बी॰सी॰ के सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए ही अर्जक संघ की स्थापना की.
आजाद भारत का प्रमुख दल कांग्रेस थी. विरोधी दल के रूप में डॉ॰ राममनोहर लोहिया की समाजवादी पार्टी थी. डॉ॰ लोहिया कांग्रेस के विरोधी दल के रूप में उभार पर थे. मूलनिवासी बहुजन समाज कांग्रेस के साथ था. 52 प्रतिशत अन्य पिछडे़ वर्ग का वोट हासिल करने के लिये डॉ॰ लोहिया ने नारा दिया, ‘संसोपा ने बाँधी गाँठ सौ में पावें पिछड़े साठ’ इस नारे ने पिछड़ों को समाजवादी आन्दोलन से जुड़ने का रास्ता साफ किया. मा॰ रामस्वरूप वर्मा संसोपा से जुड़ गये. वर्मा जी गांव में पैदा हुए थे. गांव की हर तस्वीर उनके सामने रह़ती थी. समाजवादी प्रचार करते रहे हैं जो समाजवादी होता है वह जातिवादी नहीं हो सकता और जो जातिवादी होता है वह समाजवादी नहीं हो सकता.

माननीय रामस्वरूप वर्मा सम्पूर्ण क्रान्ति के पक्षधर थे. उनकी सम्पूर्ण क्रान्ति में भ्रान्ति को कोई स्थान नहीं था. वर्मा जी के अनुसार- जीवन के चार क्षेत्र होते हैं. राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक. इस चारो क्षेत्रों में गैरबराबरी समाप्त करके ही हम सच्ची और वास्तविक क्रान्ति निरूपित कर सकते हैं. रामस्वरूप वर्मा निःसन्देह डॉ॰ राम मनोहर लोहिया के राजनैतिक दल संसोपा से जुड़े थे, किन्तु लोहिया जी के साथ वर्मा जी का वैचारिक मतभेद था. लोहिया गान्धीवादी थे, वर्मा जी अम्बेडकर वादी. लोहिया के आर्दश मर्यादा पुरूषोत्तम राम और मोहन दास करमचन्द गांधी थे, जबकि रामस्वरूप वर्मा के आदर्श भगवान बुद्ध, फूले, अम्बेडकर और पेरियार थे. रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि पूरे देश में जहां-जहां अर्जक संघ के कार्यकर्ता हैं वे बाबा साहेब डॉ॰ अम्बेडकर के जन्मदिन को चेतना दिवस के रूप में मनायें और मूल निवासी बहुजनों को चैतन्य करने के लिए 14 अप्रैल 1978 से 30 अप्रैल तक पूरे महीने रामायण और मनुस्मृति का दहन करें. अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं ने रामस्वरूप वर्मा के आदेशों का पालन करते हुए रामायण और मनुस्मृति को घोषणा के साथ जलाया.

रामस्वरूप वर्मा संसोपा से सन् 1957 में कानपुर के रामपुर क्षेत्र से चुनाव लड़े और विधान सभा के सदस्य चुने गये. इसके बाद 1967, 1969,1980,1989, और 1991 में सदस्य विधान सभा के चुनाव में विजयी रहे. माननीय वर्मा जी के तर्क के सामने विधान सभा में शासक जातियों की घीघी बंध जाती थी. सन 1967 की संबिदा सरकार में वर्मा जी डॉ॰ लोहिया की पार्टी संसोपा से जीतकर उ॰प्र॰ विधान सभा में पहुंचे. वर्मा जी ने उ॰प्र॰ विधानसभा में एक ऐसा बिल पेश किया कि धर्म के नाम पर सार्वजनिक भूमि पर मन्दिर और मजार बनाकर सरकारी भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है. सड़कों के किनारे व बीच में धर्म स्थल बनाया जा रहा है. इसे रोकने की आवश्यकता है.

मूलनिवासी बहुजन समाज के विधायक जहां एक तरफ बिल का समर्थन कर रहे थे तो ब्राह्मण विधायक परेशान थे. वर्मा जी रामायण जलाने को लेकर भी चर्चा में रहें. 1978 में 14 अप्रैल से 30 अप्रैल तक रामायण जलाने का काम हुआ. चेतना जागृति के नाम पर पर्चे बांट कर रामायण और मनुस्मृति जलाई गई थी.

उन्होंने कहा कि आगे जब फिर अवसर आयेगा तो फिर जलायेंगें. तर्क दिया गया कि गांधी जी ने जब असहयोग आन्दोलन किया तो उन्होंने कहा था विदेशी कपड़ों का विरोध करो तो मान्यवर कपड़े तो सभी को हानि नहीं करते. रामस्वरूप वर्मा के तर्क सुनकर उनके विरोधी भी बंगले झांकने लगते थे. उनके समर्थक विधान सभा के अन्दर और बाहर यत्र तत्र सर्वत्र निडर और निर्भीक थे. उनके अनुयायियों ने ही उत्तर प्रदेश विधान सभा में रामायण के पन्ने फाड़े. बाहर रामायण और मनुस्मति को जलाकर राख कर दिया.

इतना ही नहीं वर्मा जी ने उत्तर प्रदेश के सरकारी और गैरसरकारी पुस्तकालयों में बाबा साहेब डॉ॰ अम्बेडकर का साहित्य रखवाया, जिसके कारण मूलनिवासी बहुजनों में स्वाभिमान जागने लगा. तत्पश्चात शासक जातियों ने बाबा साहेब द्वारा लिखित- ‘जातिभेद का उच्छेद’ और ‘धर्म परिवर्तन करें’ दोनों पुस्तकों को जप्त करने का आदेश जारी कर दिया. शासनादेश के विरोध में माननीय रामस्वरूप वर्मा ने मा॰ ललई सिंह यादव से हाईकोर्ट इलाहाबाद में याचिका दायर की. ललई सिंह यादव ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से दोनों पुस्तकों को बहाल करवाया.

वर्मा जी ने नारा दिया था, ‘मारेंगे मर जायेंगे हिन्दू नहीं कहलायेंगे.’ लोहिया से मतभेद होने के बाद उन्होंने संसोपा को छोड़ दिया और चौ॰ महाराज सिंह भारती, बाबू जगदेव प्रसाद, प्रो॰ जयराम प्रसाद सिंह जैसे बहुजन समाज के शुभचिंतकों से सम्पर्क कर 7 अगस्त 1972 को शोषित समाज दल की स्थापना की और नारा दिया-
”देश का शासन नब्बे पर नहीं चलेगा नहीं चलेगा.
सौ में नब्बे शोषित हैं नब्बे भाग हमारा है.“
शोषितों का राज, शोषितों के लिए शोषितों के द्वारा होगा.

मा॰ रामस्वरूप वर्मा का मानना था सामाजिक चेतना से ही सामाजिक परिवर्तन होगा और सामाजिक परिवर्तन के बगैर राजनैतिक परिवर्तन सम्भव नहीं. अगर येन केन प्रकारेण राजनैतिक परिवर्तन हो भी गया तो वह ज्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं होगा. रामस्वरूप वर्मा सामाजिक सुधार के पक्षधर नहीं थे. वे सामाजिक परिवर्तन चाहते थे.

माननीय रामस्वरूप वर्मा ने कभी भी सिद्धान्तो से समझौता नहीं किया. उन्होंने सिद्धान्तहीन राजनीति नहीं की. 19-8-1998 को उनका परिनिर्वाण हो गया.

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