भगवा कट्टरपंथ से खतरे में है दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और ओबीसी समाज

आज भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक कट्टरपंथी अपने अड़ियलपन के कारण अभी भी अपनी विधवाओं को सती करना चाहते हैं. लड़कियों की भ्रूण हत्याओं का विरोध नहीं करते. जब कभी समाज सुधार की बात होती है तो भगवाधारी हजारों की संख्या में ‘धर्म ख़तरे में है’ का नारा देकर सड़कों पर आ जाते हैं. आखिर यह स्थिति मोदी, योगी के राज्य में और भी विकराल रूप धारण करती जा रही है.

ऐसे धर्म ने और उसके बिचौलियों ने खासकर महिलाओं और बहुजन समाज का जीना हराम कर दिया है. आज देश के किसी भी कोने में दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा. देश की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अपने आपको भयभीत व डरा हुआ समझ रहा है. ऐसे में सामाजिक, आर्थिक विकास, प्रगति और शांति के मायने बहुजन समाज ने खो दिये है.

अगर हमें समतामूलक समाज की स्थापना करनी है तो ऐसी क्रूरता से बाहर निकलना ही पड़ेगा. तभी यह देश सामाजिक न्याय के पुरोधा, महानायकों के सपनों का भारत कहलायेगा. हम अपने घरों में पूजा करें, नमाज़ अदा करें कौन मना कर रहा है, पर सार्वजनिक रूप से इनको ज्यादा बढ़ावा न दिया जाए. आज सरकार सिर्फ एक ही धर्म के लोगों को व एक ही धर्म को बढ़ावा दे रही है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरासर गलत है. अंधविश्वास, पाखंडवाद की लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिये, क्योंकि ये देश धर्मनिरपेक्ष है.

धर्म, आस्था का अर्थ दूसरों को नुकसान पहचान तो बिल्कुल नहीं होता. किसी एक समुदाय की आस्था पूरे देश के संकट का कारण नहीं बन सकती. किसी भी शिक्षा संस्थान में प्रवेश या सरकारी, गैर सरकारी सेवा के लिए आवेदन या नौकरी के लिए धर्म आड़े नहीं आना चाहिए. पासपोर्ट और व्यक्तिगत दस्तावेजों में ‘धर्म और जाति’ के कॉलम को तुरंत खत्म कर दिया जाना चाहिए. जाति व धर्म के बारे में घोषणा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.

भारत सही मायनों में धर्मनिरपेक्ष देश नहीं बनेगा तब तक हम आधुनिक, वैज्ञानिक युग में प्रवेश नहीं कर सकते. गांव, क्षेत्र, जिला, प्रदेश, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर मानव समाज को धर्म से ऊपर उठकर क़ानून व संविधान को अंगीकृत कर शक्तिशाली, प्रगतिशील, मजबूत भारत बनाने में अपनी अपनी महती भूमिका निभानी चाहिए, तभी हम आने वाली पीढ़ियों के दिलों पर राज्य कर सकेंगे, अन्यथा आपके कट्टरता वाले धर्म पर आने वाली पीढ़ियां सवालों की बौछारें खड़ा करेंगी और धर्म से बाहर निकल कर इंसान बनने में रुचि लेंगी.

-अशोक बौद्ध, सामाजिक कार्यकर्ता

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