आजादी के संघर्ष के बहुजन नायक

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तमाम मामलों में एक सोची-समझी साजिश के तहत बहुजनों के इतिहास को या तो नजर अंदाज कर दिया गया या फिर उसे मिटाने की कोशिश की गई. आजादी के आंदोलन में भी यही हुआ. लेखनी पर जिनका एकाधिकार रहा उन्होंने मनचाहे तरीके से इतिहास को दर्ज किया. लेकिन अब इतिहास की परतों में से तमाम बहुजन नायक बाहर आने लगे हैं. देश की आजादी की लड़ाई के दौरान तमाम बहुजन नायक ऐसे रहें जो अंग्रेजों के सामने चट्टान की तरह खड़े रहे. दलित दस्तक ऐसे दर्जन भर नायकों को सामने लेकर आया है।

वैसे तो देश की आजादी का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 का माना जाता है लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल 1780-84 में ही बिहार के संथाल परगना में तिलका मांझी की अगुवाई में शुरू हो गया था. तिलका मांझी युद्ध कला में निपुण और एक अच्छे निशानेबाज थे. इस वीर सपूत ने ताड़ के पेड़ पर चढ़कर तीर से कई अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था. इसके बाद महाराष्ट्र, बंगाल और उड़ीसा प्रांत में दलित-आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत शुरू कर दी. इस विद्रोह में अंग्रेजों से कड़ा संघर्ष हुआ जिसमें अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी. सिद्धु संथाल और गोची मांझी के साहस और वीरता से भी अंग्रेज कांपते थे. बाद में अंग्रेजों ने इन वीर सेनानियों को पकड़कर फांसी पर चढ़ा दिया.

इसके बाद अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल 1804 में बजा. छतारी के नवाब नाहर खां अंग्रेजी शासन के कट्टर विरोधी थे. 1804 और 1807 में उनके बेटों ने अंग्रेजों से घमासान युद्ध किया. इस युद्ध में जिस व्यक्ति ने उनका भरपूर साथ दिया वह उनका परम मित्र उदईया था, जिसने अकेले ही सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा. बाद में उदईया पकड़ा गया और उसे फांसी दे दी गई. उदईया की गौरव गाथा आज भी क्षेत्र के लोगों में प्रचलित हैं.

चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने वाले दो प्रमुख नाम चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर के भी थे। उन्होंने आजादी के लिए न केवल फिरंगियों से टक्कर ली बल्कि देश की आन-बान और शान के लिए कुर्बान हो गए. क्रांति का बिगुल बजते ही देश भक्त चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर भी 26 मई 1857 को सोरों (एटा) की क्रांति की ज्वाला में कूद पड़े. वे इस क्रांति की अगली कतार में खड़े रहे. फिरंगियों ने दोनों दलित क्रांतिकारियों को पेड़ में बांधकर गोलियों से उड़ा दिया और बाकी लोगों को कासगंज में फांसी दे दी गई.

बांके चमार
इसी तरह 1857 की जौनपुर क्रांति के दौरान जिन 18 क्रांतिकारियों को बागी घोषित किया गया उनमें सबसे प्रमुख बांके चमार थे। बांके चमार को जिंदा या मुर्दा पकडऩे के लिए ब्रिटिश सरकार ने उस जमाने में 50 हजार का इनाम घोषित किया था. बांके को गिरफ्तार कर मृत्यु दंड दे दिया गया.

वीरा पासी

जलियांवाला बाग के बाद दूसरे सबसे बड़े सामूहिक नरसंहार की गवाह बनी थी रायबरेली की माटी, जहां अंग्रेजों ने सैकड़ों किसानों को घेरकर बर्बरतापूर्वक गोलियों से भून दिया था. उसी रायबरेली की धरती ने स्वाधीनता की लड़ाई में वीरा पासी जैसा नायक दिया. इस नायक ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए. इस योद्धा से खौफजदा अंग्रेजी सरकार ने वीरा पासी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया था. वीरा पासी रायबरेली क्षेत्र के राणा बेनी माधव के मुख्य सिपहसालार और अंगरक्षक थे. अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में उन्होंने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया.

बुद्धु भगत
गुमनामी में खो गए जिन शहीदों का नाम आता है, उनमें वीर बुद्धु भगत भी थे। छोटा नागपुर के वे ऐसे जननायक थे, जिन्होंने न केवल अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए बल्कि उन्हें उरांव आदिवासी इलाका छोड़ने को मजबूर भी कर दिया। इस युद्ध में उनकी बेटियां रुनिया और झुनिया ने भी अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में हि्स्सा लिया और शहीद हो गईं।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने भी न केवल बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि प्राणों की आहुति भी दी.

वीरांगना झलकारी बाई
वीरांगना झलकारी बाई ऐसी ही एक वीरांगना थीं। यह चर्चित बात है कि झलकारी बाई और लक्ष्मीबाई की सकल-सूरत एक दूसरे से काफी मिलती जुलती थी, इसलिए अंग्रेज झलकारीबाई को ही रानी लक्ष्मीबाई समझकर काफी देर तक लड़ते रहे. बाद में झलकारीबाई शहीद हो गईं लेकिन इतिहासकारों ने झलकारीबाई के योगदान को हाशिए पर रखकर रानी लक्ष्मीबाई को ही वीरांगना का ताज दे दिया.

वीरांगना ऊदादेवी
वीरांगना ऊदादेवी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। 16 नवम्बर 1857 को लखनऊ के सिकन्दरबाग चौराहे पर घटित इस अपने ढंग के अकेले बलिदान को इतिहास के पन्नों से दूर ही रखा गया. ऊदादेवी नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल की महिला सैनिक दस्ते की कप्तान थीं. इनके पति का नाम मक्का पासी था. जो लखनऊ के गांव उजरियांव के रहने वाले थे. अंग्रेजों ने लखनऊ के चिनहट में हुए संघर्ष में मक्का पासी और उनके तमाम साथियों को मौत के घाट उतार दिया था. पति की मौत का बदला लेने के लिए वीरांगना ऊदादेवी 16 नवंबर 1857 सिकंदर बाग (लखनऊ) में एक पीपल के पेड़ पर चढ़कर 36 अंग्रेज फौजियों को गोलियों से भून दिया था और बाद में खुद भी शहीद हो गईं थीं.

महाबीरी देवी वाल्मीकि
दलित समाज की महाबीरी देवी वाल्मीकि को तो आज भी बहुत कम लोग जानते हैं. मुजफ्फरपुर की रहने वाली महाबीरी को अंग्रेजों की नाइंसाफी बिलकुल पसंद नहीं थी. अपने अधिकारों के लिए लडऩे के लिए महाबीरी ने 22 महिलाओं की टोली बनाकर अंग्रेज सैनिकों पर हमला कर दिया. अंग्रेजों को गांव देहात में रहने वाली दलित महिलाओं की इस टोली से ऐसी उम्मीद नहीं थी. अंग्रेज महाबीरी के साहस को देखकर घबरा गए थे. महाबीरी ने दर्जनों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया और उनसे घिरने के बाद खुद को भी शहीद कर लिया था.

उधमसिंह

भारत के स्वाधीनता संग्राम में उधमसिंह एक ऐसा नाम है, जिसने अपने देश और समाज के लोगों की मौत का बदला लंडन जाकर लिया. उन्होंने जालियांवाला बाग के वक्त पंजाब के गवर्नर रहे माइकल ओ डायर को गोलियों से भून डाला. लेकिन इस पराक्रमी नायक को भी दलित होने की वजह से इतिहास के पन्नों में जो जगह मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिल सकी और महज खानपूर्ति की गई.

रामपति चमार
चौरी-चौरा का इतिहास खंगालने पर यह साफ हो जाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में रामपति चमार और उनके अन्य साथियों का भी उल्लेखनीय योगदान है.

सुभाष चंद्र बोस
जब सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिश सरकार को खदेडऩे के लिए 26 जनवरी 1942 को आजाद हिन्द फौज बनाई और “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दुंगा” की अपील की तो कैप्टन मोहन लाल कुरील की अगुवाई में हजारों दलित भी फौज में शामिल हो गए. यहां तक की चमार रेजीमेंट पूरी तरह आजाद हिन्द फौज में विलीन हो गई.

इसी तरह के तमाम ऐसे बहुजन नायक हैं जिनका योगदान कहीं दर्ज न हो पाने से वो इतिहास के पन्नों में गुम हो गए. उन तमाम बहुजन नायकों को दलित दस्तक की श्रद्धांजलि.

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