हम सबके डॉ. अम्बेडकर

Details Published on 01/07/2016 18:10:24 Written by Anand Shrikrishna


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मध्‍य प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर से 23 किमी. की दूरी पर मुंबई-आगरा मार्ग पर महू छावनी है. इसी महू छावनी की एक बैरक में 14 अप्रैल, 1891 को डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्‍म हुआ था. उस समय डॉ. अम्बेडकर के पिता श्री रामजी राव ब्रिटिश सेना में सूबेदार मेजर के पद पर तैनात थे. डॉ. अम्बेडकर के सम्‍मान में मध्‍य प्रदेश सरकार ने महू का नाम बदलकर डॉ. अम्बेडकर नगर कर दिया है. यहां पर 14 अप्रैल को देश विदेश से अनेकों लोग डॉ. अम्बेडकर के प्रति आभार और श्रद्धासुमन अर्पित करने आते हैं.

 

 डॉ. अम्बेडकर अकेले ऐसे महापुरूष हैं जिनका जन्‍म महोत्‍सव समारोह 14 अप्रैल से शुरू होकर जून तक चलता है. इस दिन की खुशी भारत के कोने-कोने में ही नहीं बल्कि अमेरिका, कनाडा, ब्रि‍टेन, फ्रांस, जापान, नेपाल, वर्मा, श्रीलंका सहित अनेक देशों में बहुत ही हर्ष और उल्‍लास से मनाया जाता है. इस वर्ष एक कार्यक्रम संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के भवन में भी आयोजित किया जा रहा है.   बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर एक महान संविधानविद्, शिक्षाविद, राष्‍ट्र भक्‍त, समाज सुधारक, दर्शन शास्‍त्री, पत्रकार, अर्थशास्‍त्री थे. इन सबसे भी अधिक वे एक आदर्श विद्यार्थी थे और आजन्‍म आदर्श विद्यार्थी बने रहे. उन्‍होंने अर्थशास्‍त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, समाज शास्‍त्र और कानून के अलावा  चित्रकला, मूर्तिकला, तबला वादन, वाइलिन वादन, संगीत कला, पाक कला, पाली भाषा में भी दक्षता हासिल की थी. उन्‍हें अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, मराठी, हिन्दी, पाली और फारसी भाषाओं में दक्षता हासिल थी. बाबासाहेब ने अपने जीवन काल में तमाम पदों पर रहते हुए देश के हर वर्ग के लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए अनेक काम किया. उन्होंने श्रमिकों के लिए कानून बनवाया, देश के किसानों की बेहतरी के लिए प्रयास किया, महिलाओं के हक की आवाज उठाई, नौकरीपेशा लोगों के सहूलियत की बात की और उनके अधिकारों के लिए लड़कर उन्हें अधिकार भी दिलवाया. लेकिन यह इस देश का दुर्भाग्य है कि डॉ. अम्बेडकर जैसे महान व्यक्तित्व द्वारा किए गए इन कामों से लोग आज भी अंजान हैं. डॉ. अम्बेडकर के जीवन के कई आयाम थे, जिन्हें हर किसी को जानने की जरूरत है.

 

 

विद्यार्थियों के लिए आदर्श

डॉ. अम्बेडकर उच्‍च शिक्षा ग्रहण करना चाहते थे, किंतु इसके लिए उन्‍हें बड़ा संघर्ष करना पड़ा और समय-समय पर अन्‍याय का सामना करना पड़ा. जब हम उनके शिक्षा काल की ओर देखते हैं तो हमें उनकी अप्रतिम निष्‍ठा के सामने नत-मस्‍तक होना पड़ता है. बड़ौदा के शासक सयाजीराव गायकवाड द्वारा दी गई छात्रवृत्ति से उन्‍होंने एलफिन्‍स्‍टन कालेज, बंबई में बी.ए. में 3 जनवरी 1908 को प्रवेश लिया. अंग्रेजी साहित्‍य तथा फारसी भाषा उनकी बी.ए. की डिग्री के विषय थे. बी.ए. करने के बाद महाराजा सयाजीराव गायकवाड ने उन्‍हें उच्‍च शिक्षा के लिए अमेरिका जाने का अवसर दिया और तीन वर्ष (15 जून, 1913 से 14 जून 1916) के लिए 11.5 पाउण्‍ड प्रतिमाह की छात्रवृत्ति स्‍वीकृत की. वे उच्‍च शिक्षा के लिए 12 जुलाई, 1913 की दोपहर में न्‍यूयार्क बंदरगाह पर उतरे. डॉ. अम्बेडकर ने कोलम्बिया विश्‍वविद्यालय से एम.ए. किया और 2 जून, 1915 को अपने शोध ‘एशियन इंडियन कामर्स’ पर डिग्री प्राप्‍त की. एक वर्ष बाद जून 1916 में उनके शोध ‘नेशनल डिविडेण्‍ड फॉर इण्डिया: ए हिस्‍टोरिकल एण्‍ड एनालिटिकल स्‍टडी’ को कोलम्बिया विश्‍वविद्यालय में पीएच.डी. के लिए स्‍वीकृत किया गया. 9 मई, 1916 को डॉ. ए.एन. गोल्‍डेनर्जर द्वारा जो नृवंश सेमीनार आयोजित किया गया, उसमें डॉ. अम्बेडकर ने एक विद्वान के रूप में ‘कास्‍ट्स इन इंडिया: देयर मेकेनिज्‍म, जेनिसिस एण्‍ड डेवलपमेंट’ (भारत में जातियां: उनकी व्‍यवस्‍था उद्भव और विकास) शीर्षक पत्रक पढ़ा. यह पत्रक ‘इंण्डियन एण्‍टीक्‍यूरी’, मई 1917, खण्‍ड-12 में प्रकाशित हुआ तथा उनका पीएच.डी. शोध प्रबंध नए शीर्षक ‘इवोल्‍यूशन ऑफ प्रोविन्शिलय फाइनान्‍स इन ब्रिटिश इण्डिया’ पी.एस. किंग एण्‍ड कम्‍पनी ‘लंडन ने प्रकाशित किया और इसकी प्रति कोलम्बिया विश्‍वविद्यालय को भेजी गई. उसके बाद; 8 जून, 1927 को विश्‍वविद्यालय ने उन्‍हें तद्नुसार उपाधि प्राप्‍त की. इस प्रकार उन्‍होंने तीन वर्षों (जुलाई 1913 से जून 1916) में कोलम्बिया विश्‍वविद्यालय से दो उपाधियां हासिल की. महान इच्‍छाशक्ति, समर्पण और अध्‍यवसाय से उन्‍होंने यथार्थ में तीन वर्ष में अपना अध्‍ययन पूरा कर लिया. शोधार्थियों के लिए यह एक उदाहरण है जो कि विदेशों में अपनी शोध अपेक्षित समय में पूरी करना चाहते हैं.

 

कोलंबिया विश्वविद्यालय में रहते हुए डॉ. अम्बेडकर 16 से 18 घंटे प्रतिदिन पढ़ाई करते थे. पुस्तकों से उनको खास लगाव था जो उनके जीवन के अंत तक बना रहा. एक दिन होटल में वह खाना खाने पहुंच गए. खाना खाने के लिए जब उन्होंने हाथ बढ़ाया तब उन्हें ध्यान आया कि खाने के पैसों से तो वे रास्ते में किताब खरीद लाए हैं और उनकी जेब में पैसे नहीं है. वो बगैर खाना खाए अपने कमरे पर लौट आए और दो दिनों तक भूखे रहे क्योंकि उन्होंने जो किताब खरीद ली थी उसकी कीमत उनके दो दिन के खाने के बराबर थी. उनका महीने के खर्च का बजट न बिगड़ने पाए इसलिए वे दो दिन तक भूखे ही रहकर पढ़ाई करते रहे.

 

कोलंबिया विश्वविद्यालय के बाद डॉ. अम्बेडकर ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई कर सन् 1921 में डॉक्टर ऑफ साइंस की डिग्री हासिल की. ग्रेज इन से कानून की पढ़ाई कर सन् 1923 में बैरिस्टर की डिग्री हासिल की. भारतवर्ष लौटने के बाद भी वे पढ़ते रहे और लिखते रहे. 6 दिसंबर 1956 को डॉ. अम्बेडकर ने अंतिम सांस ली और अंतिम सांस लेने से पहले वे अपनी कालजयी कृति ‘‘भगवान बुद्ध और उनका धम्म’’ पूरा करके गए. डॉ. अम्बेडकर ने शिक्षा पर बहुत जोर दिया. उनके अनुसार शिक्षा को हर व्यक्ति की पहुंच के अंदर लाया जाना चाहिए.

 

 

भारतीय रिजर्व बैंक स्थापित करने में योगदान

डॉ. अम्बेडकर एक जाने माने अर्थशास्त्री थे. जून 1916 में अम्बेडकर ने पी॰ एच॰ डी॰ के लिए थीसिस प्रस्तुत की जिसका शीर्षक था 'नेशनल डिविडेंड फॉर इंडिया; ए हिस्टोरीक एंड एनालिटिकल स्टडी'. अर्थशास्त्र में डी॰ एस॰ सी॰ के लिए मार्च 1923 में उन्होंने अपनी थीसिस 'द प्रोब्लेम ऑफ द रूपी–इट्स ऑरिजिन एंड इट्स सोल्यूशंस' प्रस्तुत किया. इस थीसिस को लंदन की पी एस किंग एंड कंपनी ने दिसम्बर 1923 में 'द प्रोब्लेम ऑफ द रूपी' के नाम से प्रकाशित किया. पुस्तक की भूमिका मशहूर अर्थशास्त्री प्रोफेसर कैनन ने लिखकर डॉ. अम्बेडकर की भूरि भूरि प्रशंसा की. इस पुस्तक में डॉ अम्बेडकर ने मुद्रा समस्या का अत्यंत विद्वतापूर्ण विवेचन किया है. डॉ. अम्बेडकर के अनुसार टकसाल बंद कर देने से मुद्रास्फीति तथा आंतरिक मूल्य असंतुलन दूर हो सकता है. उनका कहना था कि सोना मूल्य का मापदंड होना चाहिए और इसी के अनुसार मुद्रा में लचीलापन होना चाहिए. डॉ अम्बेडकर का निष्कर्ष था कि भारत को स्वर्ण विनिमय मानक की मौद्रिक नीति अपनाने से बहुत नुकसान हुआ है. उनका निष्कर्ष था कि भारत को अपनी मुद्रा विनिमय दर स्वर्ण विनिमय मानक की जगह स्वर्ण मानक अपनाना चाहिए जिस से की मुद्रा विनिमय दर में बहुत अधिक उतार चढ़ाव न हो और सट्टेबाजी को अधिक बढ़ावा न मिले.

 

मौद्रिक नीति के विषय में उन्होंने जे. एम केन्स जैसे नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री से भी टक्कर ली जो कि स्वर्ण विनिमय मानक के पक्षधर थे. रुपए के संबंध में यह पुस्तक अब तक लिखी गयी सभी पुस्तकों से श्रेष्ठ थी. पुस्तक की समीक्षा करते हुए 'द टाइम्स' (लंदन) ने लिखा; 'यह पुस्तक अति श्रेष्ठ रचना है, अंग्रेजी की शैली सुगम है. अपने विषय में उनकी सम्पूर्ण पैठ है'. द इकनोमिस्ट (लंदन) ने लिखा; 'सुस्पष्ट और सुयोग्यतापूर्ण लिखी गयी पुस्तक है. अन्य अनेक रचनाओ में से मुद्रा समस्या का कोई अन्य पहलू निश्चित रूप में इतना पठनीय नहीं है.’

 

कुछ समय पश्चात रॉयल कमिशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फ़ाइनेंस जिसको हिल्टन युवा आयोग के नाम से भी जाना जाता है भारत आया. इस आयोग के हर सदस्य के पास 'द प्रोब्लेम ऑफ द रूपी' पुस्तक संदर्भ ग्रंथ के रूप में  मौजूद थी. भारत की मुद्रा समस्या के बारे में डॉ. अम्बेडकर ने हिल्टन युवा आयोग के सामने जो विचार प्रस्तुत किए वे उनकी मुद्रा समस्या के विषय में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान थे. आयोग ने अपनी रिपोर्ट सन 1926 में प्रस्तुत की. इसी रिपोर्ट के आधार पर 1 अप्रैल 1935 को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना हुई.

 

 

श्रमिक कल्याणकारी कानून और डॉ. अम्बेडकर (भविष्य निधि (PF) और रोजगार कार्यालय के जनक)

2 जुलाई 1942 को वाइसरॉय की एक्जिक्यूटिव कौंसिल में डॉ. अम्बेडकर को श्रम सदस्य (वर्तमान समय में लेबर मिनिस्टर) के रूप में शामिल किया गया. मालिक मजदूरों के तमाम संघर्षों में उन्होंने मजदूरों का साथ दिया. 7 मई 1943 को उन्होंने त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलन द्वारा संस्थापित स्थायी श्रम समिति की अध्यक्षता की और संयुक्त श्रम समितियां और रोजगार कार्यालय स्थापित करने के लिए पहल किया. आज जो हम हर जिले में रोजगार कार्यालय (इम्प्लॉइमेंट एक्स्चेंज) देख रहे हैं, वो डॉ. अम्बेडकर की ही देन है. श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए उन्होंने भविष्य निधि योजना (प्रोविडेंट फ़ंड) लागू करवाया. उऩ्होंने नौकरीपेशा लोगों के लिए काम के घंटे तय करने में भी भूमिका निभाई. उनका मानना था कि एक व्यक्ति का काम करने का घंटा निश्चित रहना चाहिए.

 

 अप्रैल 1944 में डॉ. अम्बेडकर ने एक संशोधन बिल पेश किया कि निरंतर काम करने वाले मजदूरों को सवेतन अवकाश दिया जाए. डॉ. अम्बेडकर ने मजदूरों से कहा कि वे पूंजीपतियों से यह सवाल पूछें कि उन्होंने मजदूरों का रहन–सहन ऊंचा उठाने के लिए पैसा क्यों नहीं खर्च किया? डॉ. अम्बेडकर के अनुसार औद्योगिक शांति स्थापना के लिए एक समझौता व्यवस्था, श्रम-विवाद-कानून में संशोधन और न्‍यूनतम वेतन कानून आवश्‍यक थे. उन्‍होंने कहा कि औद्योगिक शांति कानून के आधार पर स्‍थापित हो सकती है, पर यह आवश्‍यक नहीं कि ताकत के बल पर ही यह संभव हो. इसके लिए त्रिपक्षीय मार्ग ही अनुकूल रहेगा. उनका कहना था कि शोषण समाप्‍त करके, श्रम कल्‍याण द्वारा और सही औद्योगिक संबंधों के जरिए ही औद्योगिक शांति स्‍थापित हो सकती है. औद्योगिक शांति के लिए यह आवश्‍यक है कि मालिक और मजदूरों के बीच के झगड़े सामाजिक न्‍याय के सिद्धांत पर सुलझाए जाएं.  

 

 

किसानों के हितैषी डॉ. अम्बेडकर

सार्वजनिक निर्माण कार्य मंत्री के रूप में डॉ. अम्बेडकर द्वारा किया गया काम उल्‍लेखनीय हैं. इसका फायदा विशेष कर देश के किसानों को मिला. वाइसरॉय की एक्जिक्यूटिव कौंसिल में डॉ. अम्बेडकर को केंद्रीय सार्वजनिक निर्माण विभाग (सी.पी.डब्‍ल्‍यू.डी.) का मंत्री बनाया गया. इस पद पर रहते हुए डॉ. अम्बेडकर ने अगस्‍त 1945 में बंगाल और बिहार के लिए एक बहुउद्देशीय दामोदर घाटी विकास योजना प्रस्‍तुत की जो अमेरिका के तेन्‍नेसी वैली प्रोजेक्‍ट से मिलती जुलती थी. इस योजना के तहत सिंचाई के लिए पानी, जल मार्ग से यातायात, बिजली का उत्‍पादन आदि जैसे काम किए गए जिससे देश के करोड़ों लोगों को लाभ मिला. नवंबर 1945 में उन्‍होंने उड़ीसा में वहां की नदियों के विकास के लिए एक बहुउद्देशीय योजना शुरू की जो अंतत: हीराकुंड बांध के रूप में कारगर हुई. डॉ. अम्बेडकर ने हीरा कुंड बांध योजना में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई. डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि जल मार्गों का विकास कर सस्‍ते यातायात को बढ़ावा दिया जा सकता है, उनका कहना था कि बिजली का उत्‍पादन और सिंचाई योजनाओं का विकास भारत के औद्योगिकरण के लिए और आर्थिक विकास के लिए अति आवश्‍यक है. उन्होंने भारत की खनिज संपदा के विकास और उत्‍खनन के लिए एक विस्‍तृत योजना प्रस्‍तुत की और जोलोजिकल सर्वे ऑफ इं‍डिया का पुनर्गठन किया.

 

 

मानव अधिकारों के संरक्षक

डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि सरकार एक ऐसा संगठन है जो (1) जनता की जीवन रक्षा, स्‍वतंत्रता, सुख, भाषा और धर्म पालन के अधिकारों की रक्षा करता है, (2) दलित वर्गों को समान अवसर प्रदान करके सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक असमानताओं को दूर करता है और (3) अपने हर नागरिक को अभाव और भय से मुक्ति प्रदान करता है. स्‍वतंत्रता-पूर्व भारत में उन्‍होंने भारतीयों की आजादी और अधिकारों की लड़ाई लड़ी. उन्‍होंने कहा कि स्‍वतंत्रता मात्र राजनैतिक नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक एवं आध्‍यात्मिक भी होनी चाहिए. डॉ. अम्बेडकर कहते थे कि सरकार की सत्‍ता और व्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता में संतुलन होना चाहिए. उनका कहना था कि अच्‍छी सरकार वही है जो एक समुदाय को दूसरे समुदाय के शोषण के बचाए और देश में आंतरिक उपद्रवी, हिंसा और अव्‍यवस्‍था पर नियंत्रण करे और प्रत्‍येक व्‍यक्ति को उसके मूलभूत अधिकारों का उपयोग करने में सहायता करे.

 

 

महिला सशक्तिकरण में डॉ. अम्बेडकर का योगदान

डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि भारत तभी सशक्‍त बन सकता है जब यहां कि महिलाएं भी सशक्त हों. 4 अगस्त, 1913 को न्यूयार्क से अपने एक मित्र को लिखे एक पत्र में उन्होंने इस सिद्धांत की आलोचना कि थी कि मनुष्य को इस संसार में जन्म के आधार पर या पूर्व कर्मों के अनुसार सब कुछ प्राप्त होता है. डॉ. अम्बेडकर ने इसी पत्र में लिखा: ‘‘हमें कर्म सिद्धांत को त्याग देना चाहिए. यह गलत है कि माता-पिता बच्चे को केवल जन्म ही देते हैं, भविष्य नहीं. माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं. यदि हम इस सिद्धांत पर चलने लग पड़ें तो हम अति शीघ्र शुभ दिन देख सकते हैं और यदि हम लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा की ओर भी ध्यान देने लग जाएं तो हम शीघ्र प्रगति कर सकते हैं. आप अपनी पुत्री को शिक्षा देकर इसका लाभदायक परिणाम स्वयं देख सकते हैं.’’

 

डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि किसी भी देश की आबादी का आधा हिस्सा महिलाओं का होता है और इसलिए कोई भी देश तभी तरक्की कर सकता है जब उसकी महिलाओं को तरक्की का समान अवसर मिले. नागपुर में महिलाओं के एक अखिल भारतीय सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर ने कहा था, ‘मैं किसी समुदाय की प्रगति को इस पैमाने पर देखता हूं कि उसकी महिलाओं में कितनी प्रगति की है. मैं स्त्रियों के उत्थान और मुक्ति का सबसे बड़ा समर्थक रहा हूं और अपने समुदाय में स्त्रियों की स्थिति सुधारने का मैंने भरसक प्रयास किया है और मुझे इस पर गर्व है.” भारत में मनुस्मृति ग्रंथ में महिलाओं के हितों और अधिकारों की अनदेखी की गई है और महिलाओं को दबा कर रखने को कहा गया है इसी के विरोध स्वरूप डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति का सार्वजनिक रूप से दहन किया. डॉ. अम्बेडकर का विश्वास था कि मनुस्मृति के प्रावधानों के चलते महिलाओं को उनका उचित अधिकार नहीं मिल सकता.

 

 

व्यस्क मताधिकार के समर्थक

1928 में साइमन कमीशन के समक्ष दिए गए अपने साक्ष्य में डॉ. अम्बेडकर ने वयस्क मताधिकार की जोरदार वकालत की और कहा कि इक्कीस वर्ष के ऊपर के सभी भारतीयों को चाहे वो महिला हो या पुरुष मताधिकार का अधिकार मिलना चाहिए. वयस्क मताधिकार के विरोधियों का कहना था कि वयस्क मताधिकार के लिए जितने मानव संसाधनों की आवश्यकता है उतने लोग सरकार के पास नहीं है. इस पर डॉ. अम्बेडकर ने दलील दी कि जिस तरह जनगणना के लिए कॉलेज के शिक्षकों और विद्याथियों की सहायता ली जाती है उसी प्रकार निर्वाचन के समय उनकी सहायता ली जा सकती है और दीर्घकाल के लिए आवश्यकतानुसार भर्ती भी की जा सकती है. आज युवा देश की राजनीति में सबसे ज्यादा मायने रखता है. अगर तब डॉ. अम्बेडकर ने व्यस्क मताधिकार को लेकर जोर न दिया होता तो राजनीति में युवाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल पाना आसान नहीं होता.

 

 

प्रसूति अवकाश (मैटरनिटी लीव) का अधिकार

तमाम सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में महिला कर्मचारियों के लिए मैटरनिटी लीव यानी प्रसूति अवकाश होने के कारण महिला कर्मियों को जो सहूलियत होती है, असल में यह सोच डॉ. अम्बेडकर की थी. सन् 1942 में डॉ. अम्बेडकर को गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में श्रम सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया. डॉ. अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए भारत के इतिहास में पहली बार प्रसूति अवकाश की व्यवस्था की. आगे चलकर जब डॉ. अम्बेडकर को संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष चुना गया तो उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में ऐसा प्रावधान रखा कि लिंग के आधार पर महिलाओं के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा और इस तरह समानता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया गया.

 

इतना ही नहीं, कानून मंत्री के रूप में डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल संसद में पेश किया. इसका उद्देश्य अलग-अलग पंथों में बंटे हिन्दू समुदाय के लिए एक समान आचार संहिता तैयार करना था, जिसमें महिलाओं को वैवाहिक मामलों में पति से तलाक के मामले में, उत्तराधिकार के मामले में, गोद लेने के मामले में, गुजारा भत्ता के मामले में और परिवार में हिस्सेदारी के मामले में समान अधिकार मिले.

 

 

महिला सशक्तीकरण के लिए हिन्दू कोड बिल में योगदान

बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर प्रायः कहा करते थे कि शास्त्रों में निहित आदेशों के अनुसार शूद्रों और अछूतों के साथ-साथ सारी स्त्री जाति पर चाहे वह किसी भी वर्ण (जाति) की है, बहुत जुल्म ढ़ाया गया है. डॉ. अम्बेडकर कहते थे कि ‘‘मैं ‘हिन्दू कोड’ पास कराकर भारत की समस्त नारी जाति का कल्याण करना चाहता हूं. मैंने सवर्ण जाति से सम्बन्ध रखने वाली और पतियों द्वारा परित्यक्ता अनेक सवर्ण युवतियों और प्रौढ़ महिलाओं को देखा जिन्हें पतियों ने त्यागकर उनके जीवन-निर्वाह के लिए नाममात्र का चार-पांच रुपया मासिक गुजारा बांधा हुआ था. ऐसी स्त्रियां अपने जीवन के दिन अपने माता-पिता या भाई-बन्धुओं के साथ रो-रोकर व्यतीत कर रही थीं. इस स्थिति के कारण ऐसी स्त्रियों के मां-बाप भी शोक में रहते थे.’’

 

  • अंतरजातीय विवाह को कानूनी मान्यता दिलाने में योगदान

डॉ. अम्बेडकर हिन्दू कोड बनाकर लाखों निरीह महिलाओं को गैरजिम्मेदार और जालिम पतियों के चंगुल से छुड़ाकर उन्हें सामाजिक न्याय दिलवाना चाहते थे. उनका कहना था कि जब कोई हिन्दू पति अपनी पहली पत्नी को त्यागकर दूसरा, तीसरा या चौथा विवाह कर लेता है; तब ऐसी पहली पत्नी को अपने माता-पिता तथा भाई भतीजों के घर पर आश्रय लेना पड़ता है. वह बेचारी पत्नी इस स्थिति में भी अपने पति से न तो तलाक ले सकती थी न दूसरा विवाह कर सकती थी. हिन्दू कोड बिल के पास हो जाने पर ऐसी दुःखित और निरीह पत्नियां कानून के बलबूते पर ऐसे अत्याचारी पतियों से पीछा छुड़ा कर तलाक हासिल कर सकती थीं और जीवन-यापन के लिए किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह भी कर सकती थीं.

 

‘हिन्दू कोड’ की एक प्रबल विशेषता यह भी थी कि किन्हीं भी दो हिन्दू वर-वधुओं का विवाह चाहे उनका परस्पर वर्ण भेद या जाति भेद कुछ भी हो उसे वैध माना जाता है और उनसे उत्पन्न सन्तान पैतृक सम्पत्ति में वैध अधिकारी बनेगी. इस कानून के बनने से पहले परस्पर विरोधी वर्णों, जातियों उप-जातियों में हुए विवाह से उत्पन्न सन्तान पैतृक सम्पत्ति में अंश या हिस्सा प्राप्त करने के लिए वैध या जायज़ नहीं माना जाता था.

 

  • दत्तक बच्चों को अधिकार दिलाने में भूमिका

शताब्दियों से धर्म-ग्रन्थों में निहित आदेशों एवं प्रचलित रूढ़ियों के अनुसार दत्तक या गोद लेने की प्रथा केवल सजातीय या दोहता को ही सुविधा देती थी किन्तु हिन्दू कोड न केवल किसी भी हिन्दू बालक को दत्तक या गोद लेने का अधिकार दिलवाता था बल्कि किसी कन्या को भी गोद लिया जा सकता है और वह गोद लेने वाले माता-पिता की सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त करती है. हालांकि डॉ. अम्बेडकर की यह प्रगतिशील सोच उस समय सत्ता के केंद्र में बैठे लोगों को रास नहीं आई और उन्होंने महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले इन कानूनों के हितैषी हिन्दू कोड बिल को पास नहीं होने दिया, इसके विरोध स्वरूप डॉ. अम्बेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया.

 

महिलाओं के अधिकारों के लिए और उनके सशक्तीकरण के लिए भारत सरकार के केन्द्रीय मंत्रिमंडल से कैबिनेट मंत्री के पद से डॉ. अम्बेडकर द्वारा इस्तीफा देने की बात से यह समझा जा सकता है कि वह महिलाओं को समान अधिकार दिलाने को लेकर कितने गंभीर थे. वह कहा करते थे कि मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से ज्यादा अधिक दिलचस्पी और खुशी हिन्दू कोड पारित करने में है. किसी राजनेता द्वारा महिलाओं के हित के लिए संघर्ष करने का ऐसा उदाहरण दूसरा नहीं मिलता है. लेकिन अफसोस यह है कि आज भी तमाम महिलाएं बाबासाहेब द्वारा उनके हित में किए गए कामों से आज भी अंजान हैं.

 

बाद में सन 1955-56 में हिन्दू कोड बिल को कई टुकड़ों में जैसे हिन्दू विवाह कानून, हिन्दू उत्तराधिकार कानून, हिन्दू गोद एवं गुजारा भत्ता कानून जैसे नामों से पास किया गया. इन कानूनों को पारित करवाने में भी डॉ. अम्बेडकर ने अहम भूमिका निभाई. उन्होंने तत्कालीन कानून मंत्री श्री पाट्स्कर को हिन्दू कोड की एक-एक धारा को विस्तार से समझाकर और उसके विरोध में दी जाने वाली दलीलों के जवाब पहले से तैयार करके उनकी बहुत सहायता की. डॉ. अम्बेडकर का सपना पूरी तरह तब साकार हुआ जब सन् 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार कानून में संशोधन करके पुत्री को भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार दिया गया.

 

 

भारत का औद्योगिकरण और राज्‍य समाजवाद के बारे में डॉ. अम्बेडकर के विचार

डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि भारत का विकास औद्योगीकरण से ही संभव है और औद्योगीकरण करने के लिए राज्य समाजवाद अनिवार्य है. इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए कृषि भूमि सुधार और खेती में सहकारिता को लागू किया जाना चाहिए.

 

 

लोकतंत्र के बारे में डॉ. अम्बेडकर के विचार

डॉ. अम्बेडकर लोकतंत्र के प्रबल समर्थक थे. उनका कहना था कि लोकतंत्र की आत्मा है, एक आदमी-एक मूल्य का सिद्धांत. लंदन में गोलमेज सम्मेलन के पूर्ण अधिवेशन में 20 नवम्बर 1930 को अपने भाषण में उन्होंने कहाः

हमें ऐसी सरकार चाहिए जिसमें सत्ता में बैंठे व्यक्ति इस बात को समझते हों कि कब सरकार की आज्ञाकारिता समाप्त हो जाती है और प्रतिरोध आरंभ हो जाता है, फिर वे न्याय और समय की आवश्यकताओं को देखते हुए सामाजिक और आर्थिक जीवन की आचार संहिताओं में परिवर्तन करने में नहीं हिचकिचाएं. यह काम केवल वही सरकार कर सकती है जो जनता की सरकार हो, जनता के लिए हो तथा जनता द्वारा चुनी गई हो. हम महसूस करते हैं कि हमारे अतिरिक्त हमारे दुख-दर्द को कोई भी दूर नहीं कर सकता और जब तक राजनीतिक सत्ता हमारे हाथों में नहीं आती, हम भी उसे दूर नहीं कर सकते.

 

नए संविधान का निर्माण करते समय भारत की सामाजिक व्यवस्था के कुछ ठोस तथ्यों को ध्यान में अवश्य रखा जाना चाहिए. इस बात को मानकर चलना होगा कि यहां की सामाजिक व्यवस्था उच्च वर्ग के लिए आदर और निम्न वर्ग के लिए घृणा की अन्याय-पूरक मान्यताओं पर आधारित हैं. इसलिए वर्ग और जाति पर आधारित इस व्यवस्था में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के लिए आवश्यक समता और बंधुत्व की मानवीय भावनाओं के विकास की कोई संभावना नहीं है. इस बात को भी मानना होगा कि यद्पि बुद्धीजीवी वर्ग भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है किंतु यह सभी उच्च वर्ग से आते हैं. यद्यपि वह देशहित की बात करते हैं और राजनीतिक आंदोलनों का नेतृत्व करते हैं, किंतु वे जातिगत सकीर्णताओं का परित्याग नहीं कर पातें. हमें बार-बार याद दिलाया जाता है कि दलित वर्गो की समस्या एक सामाजिक समस्या है और उसका समाधान राजनीति में नहीं है. डॉ. अम्बेडकर इस विचार का जोरदार विरोध करते थे. वह दलित वर्ग की समस्या को एक राजनैतिक समस्या मानते थे. उनका कहना था कि असली लोकतंत्र तभी आएगा जब बहुसंख्यक समाज देश का हुक्मरान वर्ग बने. उनका मानना था कि शोषित वंचित वर्ग के हाथ में राजनीतिक सत्ता आए बिना उनकी समस्या का समाधान नहीं हो सकता.

 

 

संविधान निर्माता डॉ. अम्बेडकर

जब भारत देश आजाद हो रहा था और भारत का संविधान लिखने की जिम्मेदारी आई तो संविधान सभा ने डॉ. अम्बेडकर को संविधान निर्माण समिति का अध्यक्ष चुना और डॉ. अम्बेडकर ने उस जिम्मेदारी को बहुत ही अच्छी तरह से निभाया. भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए चुनी गई लेखा समिति पर अम्बेडकर की अध्‍यक्षता में कुल सात सभासदों की संविधान समिति चुनी गई थी. लेकिन प्रत्‍यक्षतया एक सभासद की मौत हो गई थी, दूसरे सभासद अमेरिका चले गए और वहीं रह गए, तीसरे सभासद ने इस्‍तीफा दे दिया था. उन तीन जगहों को भरा नहीं गया. चौथे सभासद संस्‍था के कार्यों में लगे रहे, इसलिए उनका भी संविधान लेखन में कोई भी उपयोग नहीं था. वे सिर्फ नाम के ही सभासद थे. एक-दो सभासद दिल्‍ली से दूर थे और अस्‍वास्‍थ्‍य की वजह से वह अनुपस्थित ही रहे. इस वजह से प्रारूप समिति के अध्‍यक्ष डॉ. अम्बेडकर को अकेले ही संविधान लेखन का संपूर्ण भार अपने कंधों पर उठाना पड़ा. दिन के 18-18 घंटे वह कार्यरत रहते थे. राष्‍ट्र द्वारा सौंपा गया कार्य करने के लिए उन्‍होंने अपने प्राकृतिक स्‍वास्‍थ्‍य की भी परवाह नहीं कि और बहुत ही कष्‍ट सहा.

 डॉ. अम्बेडकर ने अपने विचारों को संविधान के मूलभूत अधिकारों में अनुच्छेद 17 और 23 में रखा. भारतीय संविधान की नीव लोकतंत्र पर टिकी है, इसलिए डॉ. अम्बेडकर को भारतीय संविधान के प्रधान शिल्पकार के रूप में जाना जाता है और कुछ विद्वान लेखक उनको भारतीय संविधान का पिता भी मानते हैं. डॉ. अम्बेडकर द्वारा किए गए कार्यों के लिए अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय ने सन् 1952 में उन्हें एल.एल.डी की मानद डिग्री प्रदान की. हैदराबाद स्थित उस्‍मानिया विश्‍वविद्यालय ने सन् 1953 में डॉ. अम्बेडकर को एल.एल. डी की मानद डिग्री प्रदान की.

 

 

एक देशभक्त के रूप में डॉ. अम्बेडकर

संविधान सभा में संविधान के गुणविशेष के बारे में बोलते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि संविधान में बुने गए तत्व विद्यमान पीढ़ी के मत हैं. संविधान कितना भी अच्छा हो यह आखिर में राज्यकर्ताओं के संविधान के इस्तेमाल करने पर ही निर्भर होगा कि वह अच्छा है या बुरा. राष्ट्र की भविष्य को सोच विचार कर उन्होंने चिंता व्यक्त की और कहा, मेरे दिल को इस बात से बड़ा दुःख होता है कि भारत को इससे पहले अपनी स्वतंत्रता गंवाने की बारी एक ही बार आई हो ऐसा नहीं है, किन्तु भारत की जनता के खुद के ही विश्वासघात से, देशद्रोह करने से ही उसे स्वतंत्रता गंवानी पड़ी. जब मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला किया तब राजा दाहर के सेनापति ने मुहम्मदबिन कासिम के मुनीम से रिश्वत लेकर अपने राजा की ओर से लड़ने से साफ इनकार कर दिया. मुहम्मद गोरी को हिन्दुस्तान पर हमला करने का आमंत्रण देकर पृथ्वीराज के खिलाफ लड़ने का आमंत्रण देने वाला पु़रूष जयचन्द था. उसने मुहम्मद गोरी को सोलंकी राज्य की और अपनी सहायता देने का वचन दिया था. जब शिवाजी महाराज स्वतंत्रता के लिए युद्ध कर रहे थे, तब अन्य मराठा सरदार और राजपूत, मुगल बादशाह की ओर से लड़ रहे थे. जब ब्रिटिश सिख राज्यकर्ताओं के खिलाफ लड़ रहे थे तब उनके सेनापति चुप बैठे थे. सिखों की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए उन्होंने बिलकुल प्रयास नहीं किए.

 

ऐसे ही 1857 में भारत के बड़े भाग ने ब्रिटिशों के खिलाफ स्वतंत्रता युद्ध पुकारा, तब बहुत से लोग उसमें शामिल नहीं हुए. इस तरह डॉ. अम्बेडकर ने इस बात की ओर इशारा किया कि अगर क्षेत्रीय दलों ने अपने दल का मत राष्ट्रहित की अपेक्षा श्रेष्ठ माना, तो भारतीयों की स्वतंत्रता दूसरी बार खतरे में पड़ जायेगी और शायद वह स्थायी रूप से नष्ट हो जाएगी. अतः शरीर में खून की आखिरी बूंद होने तक आपको अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ने की प्रतिज्ञा कऱनी चाहिए. सदन में डॉ. अम्बेडकर द्वारा कहे गए इस बात की सभी राजनेताओं ने जमकर सराहना की.

 

 

राष्ट्रीय एकता के लिए जाति व्यवस्था के विनाश के पक्षधर

डॉ. अम्बेडकर का विचार था कि जब तक भारत में जाति प्रथा रहेगी, भारत मजबूत नहीं हो सकता. वे जातिप्रथा को राष्ट्र विरोधी मानते थे तथा जाति को सामाजिक जीवन में अलगाव व भेदभाव पैदा करने वाला तत्व मानते थे जो लोगों के बीच ईर्ष्या, घृणा और विद्वेष पनपाती और फैलाती है. उनका मानना था कि यदि हम पूरी वास्तविकता में एक राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो हमें इन सारी कठिनाइयों पर विजय पानी ही होगी, क्योंकि बंधुता केवल तभी हकीकत बन सकती है जब हम एक राष्ट्र हो. बंधुता के बिना समानता और स्वतंत्रता रंग की पुताई वाली परतों से ज्यादा गहरी नहीं हो सकती. इसलिए डॉ. अम्बेडकर ने युवकों का आवाह्न किया कि वो अंर्तजातीय भोज और अंर्तजातीय विवाह को प्रोत्साहन दे.

 

अम्बेडकर के बारे में अब गंभीरता से सोचने का मतलब है कि हमें अपने समाज की संरचना पर भी पूर्ण विचार करना चाहिए. हमें जाति पर पूर्ण विचार करना चाहिए और खुद से पूछना चाहिए कि आज का भारत क्या वह करने के लिए तैयार है जो डॉ. अम्बेडकर ने 1936 में करने को कहा था. उनका कहना था, “आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर आपको इस व्यवस्था को तोड़ना है तो आपको वेदों व शास्त्रों को डायनामाइट से उड़ा देना चाहिए जिनमें न कोई तार्किकता है और न कोई नैतिकता. आपकों श्रुतियों और स्मृतियों के धर्म को नष्ट कर देना चाहिए.” लाहौर के जातिपात तोडक मंडल के एक सम्मेलन के लिए तैयार किया गया अध्यक्षीय भाषण; जो दिया ना जा सका उसे उन्होंने ‘अनाहिलेषन ऑंफ कास्ट’ नाम से प्रकाशित करवाया जिसमें उन्होंने इन बातों को लिखा था.

उनका मानना था कि जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए उन धार्मिक अवधारणाओं को नष्ट करना जरूरी है, जिनपर जाति प्रथा आधारित है. दूसरे शब्दों में, अम्बेडकर ने सामाजिक सुधार के लिए हिन्दू समाज के पुनर्गठन और  पुनर्निर्माण को जरुरी बताया था.

 

 

डॉ. अम्बेडकर की नजर में सांप्रदायिकता और राष्ट्रीयता का अर्थ

डॉ. अम्बेडकर के अनुसार मानवता के इतिहास में राष्ट्रीयता एक बहुत बड़ी शक्ति रही है. यह एकत्व की भावना है, किसी विशेष वर्ग से संबंधित होना नहीं. यही राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय भावना का सार कहा जाता है. अम्बेडकर की दृष्टि में सही राष्ट्रवाद है जाति भावना का परित्याग. और जाति भावना गहन सांप्रदायिकता का ही रूप है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब मानव के बीच जाति, नस्ल और रंग का अंतर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाए. राष्ट्रवाद के संदर्भ में अल्पसंख्यक और बहुमत के विषय में डॉ अम्बेडकर कहते हैं; "अल्पमत द्वारा जब सत्ता में कुछ अधिकार मांगे जाते हैं तो वह सांप्रदायिक हो जाता है परंतु बहुमत के बल पर जब सत्ता पर एकाधिकार जमा लिया जाता है तो उसे राष्ट्रीयता कहा जाता है. डॉ. अम्बेडकर व्यक्ति कि स्वतन्त्रता चाहते थे. संविधान सभा में कुछ सदस्यों ने प्रस्तावना में "भारत के लोग" के स्थान पर "भारत राष्ट्र" लिखने कि मांग की. इस पर अम्बेडकर ने पूछा; "हजारों जातियों में बंटे लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? जितनी जल्दी हम यह समझ जाएंगे कि सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अभी हम एक राष्ट्र नहीं हैं, उतना ही अच्छा है".

 

अम्बेडकर ने कहा कि शासक जातियां यह बात जानती हैं कि वर्ग सिद्धान्त, वर्ग हित और वर्ग संघर्ष उनका विनाश कर देगा इसलिए सताये हुये वर्ग का ध्यान बांटने के लिए उसे राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता का नाम लेकर बहका दिया जाए. उन्होंने कहा कि ऐसा राष्ट्रवाद नहीं होना चाहिए जो दूसरे समुदाय या राष्ट्र के प्रति निर्दयता या भय प्रकट करता हो. उन्होंने कहा कि उस समय तक राष्ट्रवाद निरर्थक है जब तक राष्ट्रीयता की भावना विद्यमान न हो. उन्होंने कहा कि सवर्ण जातियां राष्ट्रवाद के नाम पर पिछड़ी जातियों को धोखा दे सकती हैं.

 

 

वैज्ञानिक बौद्ध धम्म के हिमायती डॉ. अम्बेडकर

डॉ. अम्बेडकर गौतम बुद्ध की शिक्षाओं से बहुत प्रभावित थे. 12 मई 1956 को बीबीसी लंदन से वार्ता करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा, “मैं बुद्ध धर्म को प्राथमिकता देता हूं क्योंकि यह एक साथ संयुक्त रूप से तीन सिद्धांत प्रतिपादित करता है, जो कोई और नहीं करता. अन्य सभी धर्म ईश्वर, आत्मा या मरने के बाद के जीवन की चिंता में लिप्त है. बुद्ध धर्म प्रज्ञा की शिक्षा देता है. यह करूणा की शिक्षा देता है. यह समता की शिक्षा देता है. इस धरती पर कुशल व सुखी जीवन के लिए मनुष्य को यही चाहिए. बुद्ध धर्म की इन्हीं तीन शिक्षाओं से मुझे प्रेरणा मिली. इन्हीं शिक्षाओं से पूरी दुनिया को प्रेरित होना चाहिए. समाज को न तो ईश्वर और न आत्मा ही बचा सकती है.” बुद्ध के व्यक्तित्व की एक खासियत से वे बहुत प्रभावित थे जो है उनके कथनी और करनी में कोई भेद न होना. बुद्ध ने वही सिखाया जिस पर वे स्वयं चले. ‘यथावादी तथाकारी, यथाकारी तथावादी’. बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर, 1956 को लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर भारत में लुप्तप्राय हो गए बौद्ध धर्म को पुनःस्थापित किया और एक नई धम्म दीक्षा विधि द्वारा 22 प्रतिज्ञाएं दिलाकर धम्म की जड़ें मजबूत की.

डॉ. अम्बेडकर कहते थे कि बुद्ध की शिक्षाओं में अंधविश्वास के लिए कोई जगह नहीं है. कालाम सुत्त में जिसको स्वतंत्र चिंतन का प्रथम घोषणा पत्र कहा जाता है, बुद्ध ने कहा कि- किसी बात को इसलिए मत मानों कि शास्त्रों में ऐसा लिखा है, या कि ऐसा बहुत पहले से हो रहा है या विद्वान और बड़े लोग ऐसा कहते हैं. हर बात को अपने अनुभव की कसौटी पर कसो और जब यह लगे कि यह बात आपके लिए व दूसरों के लिए कल्याणकारी है तभी मानो. मानसिक गुलामी से मुक्ति का मार्ग इसी में है जिसके द्वारा समतामूलक समाज, देश व लोक की गुंजाइश है. उनके दर्शन की जड़े राजनीतिक शास्त्र में नहीं बल्कि धर्म में थीं और इस दर्शन को उन्होंने अपने शास्ता भगवान बुद्ध की शिक्षाओं से प्राप्त किया था.

 

 

व्यक्तिपूजा के खिलाफ थे डॉ. अम्बेडकर

अपनी 55वीं वर्षगांठ पर मद्रास के ‘जय भीम’ पत्रिका को दिए गए एक संदेश में डॉ. अम्बेडकर ने कहा- ‘व्यक्तिगत तौर पर मैं वर्षगांठ मनाना पसंद नहीं करता. भारत के नेता को पैगम्बरों के बराबर सम्मान दिया जाता है जो लोकतंत्र के लिए खराब है. मैं व्यक्तिपूजा के खिलाफ हूं. बाबाओं, देवी-देवताओं, पुनर्जन्म की अवधारणा, आत्मा का दूसरे शरीर में प्रवेश करना, वशीकरण, तंत्र-मंत्र और ज्यातिष में डॉ. अम्बेडकर का बिल्कुल भी विश्वास नहीं था. उनका कहना था कि ये सब तो अंधविश्वास मात्र हैं,जो सदियों से मनुष्यों में चले आ रहे हैं, जिन्होंने कितने ही घरों का विनाश कर दिया है और जिन्हें आज भी किसी न किसी रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है. वह मनुष्य और मनुष्य के बीच जाति, धर्म, जन्म और धन-दौलत की भिन्नता का विचार किए बिना एक सम्यक संबंध स्थापित करना चाहते थे और स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के तीन शब्दों में समाहित सिद्धांतों पर आधारित समाज की स्थापना करना चाहते थे. डॉ. अम्बेडकर का दर्शन स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के न्यायपूर्ण स्तम्भों पर आधारित था और इसके स्रोत थे- शिक्षा आंदोलन, संगठन, बौद्ध धम्म, संघ और लोकतंत्र में आस्था.

 

 

विदेशों में डॉ. अम्बेडकर

बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा देश के हर वर्ग के लिए जितना सोचा गया, शायद ही किसी अन्य नेता ने ऐसा सोचा और किया होगा. डॉ. अम्बेडकर महज एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वो एक समाज सुधारक और सच्चे अर्थों में गरीबों, महिलाओं, किसानों और हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज थे. वह इनके दर्द को अच्छी तरह समझते थे. वह समानता के पक्षधर थे, यही वजह है कि उन्होंने हर उस वर्ग के लिए काम किया जो हाशिए पर पड़ा था; चाहे वो महिला हो, किसान हो या फिर शोषित वर्ग. उन्होंने देश के 95 फीसदी लोगों की बात की, उनके हक की आवाज उठाई और उनके अधिकारों को लिए लड़े. हालांकि वो पांच प्रतिशत लोग जो सत्ता में काबिज थे उऩ्होंने डॉ. अम्बेडकर के इन कामों की लगातार अनदेखी की और उन्हें सिर्फ एक वर्ग कह कर प्रचारित करते रहे. लेकिन डॉ. अम्बेडकर को पढ़ने और उनके द्वारा किए गए कामों को जानने के बाद यह साबित हो जाता है कि डॉ. अम्बेडकर महज किसी खास वर्ग के हितैषी नहीं बल्कि सबके हितैषी थे. अम्बेडकर सब के हैं.

 

Email- anand622009@hotmail.com


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