सम्राट अशोक और डॉ. अम्बेडकर के सपनों का भारत

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ठीक से तो याद नहीं लेकिन शायद जब हम चौथी या पांचवीं में पढ़ रहे थे; तब पहली बार डॉ. अम्बेडकर का नाम सामने आया था. हम रट्टा मारा करते थे कि भारत का संविधान किसने बनाया और जवाब में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नाम याद करते थे. तब हमारे जहन में अम्बेडकर माने संविधान निर्माता बैठ गया था. और मुझे पता है कि लाखों लोग बाबासाहेब को इसी रूप में याद करते होंगे. तब मुझे पता नहीं था कि यही डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक दिन मेरे लिए बाबासाहेब हो जाएंगे.

बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को आप जितना जानने की कोशिश करते हैं, उनकी महानता, उनके द्वारा देश के हर वर्ग के लिए किए गए काम को जानकर आप हैरत में पड़ते जाते हैं. अप्रैल महीना जाहिर तौर पर अम्बेडकरमय होता है, बल्कि मार्च में मान्यवर कांशीराम जी की जयंती के साथ ही अम्बेडकर जयंती की तैयारियां शुरू हो जाती है. यह बात बार—बार खटकती रहती है कि डॉ. अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए, नौकरीपेशा लोगों के लिए, किसानों के लिए और हाशिए पर खड़े हर वर्ग की बेहतरी के लिए काम किया, बावजूद इसके उनको सिर्फ संविधान निर्माता के तौर पर ही क्यों पेश किया जाता रहा? उनके व्यक्तित्व को, उनकी महानता को कम करने की साजिश क्यों रची जाती रही? अब इन सवालों के जवाब मिलने लगे हैं. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या और सोशल मीडिया पर चल रही बहसों ने अम्बेडकरी-फुले विचारधारा को साजिशन दबाकर रखने की वजहों पर से पर्दा हटा दिया है.

बहुजन समाज के ज्यादातर लोगों द्वारा बाबासाहेब और जोतिबा फुले सहित तमाम बहुजन नायकों पर अपना अधिकार जताया जाता रहा है. जाहिर है कि ये हमारे पूर्वज हैं और हमलोग अम्बेडकर, फुले, पेरियार और कबीर परंपरा के लोग हैं और उन पर सबसे पहला हक हमारा है. लेकिन बदले वक्त में तमाम अन्य विचारधाराओं के लोग बहुजन नायकों को अपने मंच से लोगों के बीच रखने लगे हैं. यहां फर्क यह है कि बाबासाहेब सहित तमाम बहुजन नायकों की बात करते वक्त वो उन्हें अपने तरीके से परिभाषित करने की कोशिश करते हैं. ऐसे में हमारा दायित्व भी बनता है कि हम बहुजन नायकों के जीवन से जुड़े उन तमाम पक्षों को तमाम मंचों से समाज के सभी वर्गों के बीच लेकर जाएं जिसने देश के हर आम इंसान की जिंदगी को बेहतर किया है.

बाबासाहेब को संविधान निर्माता की सीमित भूमिका से निकाल कर उन्हें किसानों, महिलाओं, सरकारी कर्मियों और यहां तक की निजी सेवाओं में लगे लोगों के हितैषी के रूप में पुरजोर तरीके से स्थापित करने की जरूरत है. क्योंकि बाबासाहेब का काम किसी सीमा में बंधा हुआ नहीं था. ‘दलित दस्तक’ और अन्य मंचों से प्रो. विवेक कुमार जी ने बाबासाहेब को ‘राष्ट्रनिर्माता’ के तौर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसी तरह अब माता सावित्रीबाई फुले को देश की प्रथम शिक्षिका और उनके जन्मदिन पर शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा भी बहुजनों के बीच शुरू हो गई है. हमें इस बात को और आगे बढ़ाना होगा. हमें बाबासाहेब, जोतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार, कबीर आदि समाज सुधारकों को उन सीमाओं से आजाद कराना होगा, जिसमें अब तक देश की सत्ता पर काबिज रहने वाले सत्ताधारियों ने उन्हें बांध रखा है. हमें बहुजन नायकों को देश की आम जनता के बीच स्थापित करना होगा.

एक वक्त में सम्राट अशोक ने यही काम किया था. उन्होंने तथागत बुद्ध की विचारधारा को देश-दुनिया में पहुंचाने के लिए अपनी जिंदगी लगा दी. यहां तक की अपने बच्चों को धम्म प्रचार के लिए देश से बाहर भेज दिया. इस साल अप्रैल की 14 तारीख का महत्व और ज्यादा है, क्योंकि 14 अप्रैल को बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के साथ-साथ भारत के मानवतावादी और महान सम्राट अशोक की भी जयंती है. बाबासाहेब और अशोक महान दोनों ने एक ही सपना देखा था. सम्राट अशोक ने भारत को बुद्धमय बनाया था. भगवान बुद्ध के संदेश को प्रचारित प्रसारित करने के लिए 84 हजार स्तूपों का निर्माण करवाया. जब भगवान बुद्ध का नाम भारत के इतिहास से मिटाने की साजिश रची जा रही थी, उसी समय बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने भारत में बुद्ध को आम जन तक पहुंचाया. जिस तरह भगवान बुद्ध का दिया धम्म संदेश हर आमजन के जीवन में बेहतरी लाता है उसी तरह बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा किया गए काम ने भी देश के हर व्यक्ति के जीवन को बेहतर किया और उनको विशेष अधिकार दिलवाया. इस वर्ष जब हम बाबासाहेब की जयंती मना रहे होंगे तो हमारे जहन में बाबासाहेब के साथ ही सम्राट अशोक के बुद्धमय भारत का ख्वाब भी रखना होगा.

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