छप्पर वाला अम्बेडकर स्कूल

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भारत में जब हम शिक्षा के बारे में बात करते हैं तो जटिल तस्वीर बनती है. गुणवत्ता परक शिक्षा समाज के वंचित वर्गों तक पहुंचाना अभी भी दूर की कौड़ी है. सामाजिक असमानताओं की तरह ही शिक्षा तक पहुंच में भी भारी भेदभाव एवं असमानताएं विद्यमान है. डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि-“शिक्षा सभी नागरिकों को सहज रूप से उपलब्ध होनी चाहिए. समाज के वंचित वर्गों को समानता के स्तर पर लाने के लिए उनकी शिक्षा की व्यवस्था के लिए विशेष प्रावधान किए जाने चाहिए.’’ डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि अध्यापन का कार्य और विद्यार्थी उन्हें बहुत पसंद हैं. विद्यार्थियों के भविष्य पर ही राष्ट्र का भविष्य निर्भर है.

विद्यार्थी समाज का बौद्धिक हिस्सा है और वे सार्वजनिक विचार बनाने में मददगार होते हैं. उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य लोगों का समाजीकरण और नैतिक शिक्षा देना है. चरित्र निर्माण शिक्षा का महान उद्देश्य है. वंचित और जाति व्यवस्था के शोषण के शिकार जातियों को शिक्षा उपलब्ध कराकर वे जाति व्यवस्था को समाप्त करना चाहते थे और भारतीय लोकतन्त्र को मजबूत बनाना चाहते थे. शिक्षा के महत्व का विश्लेषण करते हुये उन्होंने शिक्षित हो, संघर्ष करो, संगठित हो का नारा दिया था. उनकी प्रेरणा से देश के दूर दराज के गांवों में भी डॉ. अम्बेडकर के नाम से स्कूल खुल चुके हैं. संसाधनों की बहुत परवाह न कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा की अलख जगाने वाले ऐसे ही एक स्कूल का जिक्र इस लेख में है.

डॉ. अम्बेडकर के उपर्युक्त महान विचारों एवं उद्देश्यों के प्रकाश में हम अपने गांव में स्थित डॉ. अम्बेडकर जूनियर हाई स्कूल की स्थापना व महत्व का विश्लेषण करना चाहेंगे. डॉ. अम्बेडकर जूनियर हाई स्कूल सन 2000 के आसपास एक बगीचे में एक-दो झोपड़ियां डालकर मेरे गांव के ‘दक्खिन’ तरफ खोला गया. वहीं बगल की जमीन पर परंपरागत रूप से मरे हुए जानवरों की खाल उतारने का काम किया जाता था और शेष शरीर को खुले में छोड़ दिया जाता था. उस स्थान पर हवा में इतनी दुर्गन्ध फैली रहती थी कि उधर से लोग नाक बंद कर और मुंह दूसरी तरफ कर बड़ी मुश्किल से गुजरते थे. गिद्धों और कौओं का झुण्ड वहां जमा रहता था. स्कूल खुलने के बाद मरे जानवरों का वहां फेंकना बंद हो गया. दलितों ने चमड़े उतारने का काम भी उस समय तक छोड़ दिया था. अब वहां लगभग दो सौ बच्चे पढते हैं. गिद्ध, कौआ बदबू सब कुछ उस स्कूल की वजह से वहॉ से दूर हो गए.

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि डॉ. अम्बेडकर जूनियर हाई स्कूल को शिक्षक श्री जयश्री अम्बेडकर जो अनुसूचित जाति (चमार) से आते हैं, ने शुरू किया था. इस स्कूल को खोलने के पहले वे दूसरे गांवों के कई स्कूलों में गणित पढ़ाया करते थे. संपन्न लोग अपने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के लिए जयश्री मास्टर साहब को आज भी बुलाते हैं. पूरे क्षेत्र में वे गणित के मास्टर के रूप में विख्यात हैं. उनके ही घर में रामनरेश गौतम, भगवती प्रसाद वेदकर जैसे लोग हैं, जो अंग्रेजी के शिक्षक के रूप में जाने जाते हैं और उन्होंने पूरा जीवन अध्यापन में लगा रखा है. नाम के साथ लगे उनके टाइटल्स उनकी जागरूकता के स्तर को रेखांकित करते हैं.

एक हडावर (मरे जानवरो को फेंकने का स्थान) जैसी बदबूदार जगह का सार्वजनिक स्थान में बदलना और कभी शिक्षा से सर्वथा वंचित अनुसूचति जाति के लोगों का कुशल अध्यापक बनना एवं पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के सभी वर्गों के बच्चों को शिक्षा देना सामाजिक गतिशीलता एवं सामाजिक परिवर्तन का बेहतरीन उदाहरण है. हम दो भाईयों को भी गणित और अंग्रेजी इन्ही सम्मानित अध्यापकों ने पढ़ाया है.

मरे जानवरों को फेंकने वाले उपेक्षित व घृणित स्थान पर छप्पर में चलने वाला डा. अम्बेडकर जूनियर हाई स्कूल समाज के शोषित-वंचित ही नहीं बल्कि सभी जातियों, समुदायों के बच्चों को गुणवत्ता परक शिक्षा उपलब्ध कराकर बाबा साहेब के सपनों का राष्ट्र बनाने में अपना योगदान दे रहा है. जयश्री अम्बेडकर जैसे लोग समाज के लिए एक प्रेरणा हैं.

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