सबकी लड़ाई बसपा सेः यूपी चुनाव को लेकर प्रो. विवेक कुमार का विश्लेषण

Details Published on 13/07/2016 16:34:03 Written by Prof. Vivek Kumar


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हाल ही में शिक्षा कार्य के लिये मुझे गोरखपुर जाना पड़ा. गोरखपुर के लिये सीधी फ्लाइट रद्द होने के कारण मुझे वाया लखनऊ होकर गोरखपुर जाना पड़ा. लखनऊ एयरपोर्ट पर टैक्सी पकड़ कर मैं जब लखनऊ में दोस्तों से मिलने जा रहा था तो अनजान टैक्सी ड्राइवर जिसकी उम्र तकरीबन 30-35 साल रही होगी, से पूछा कि उत्तर प्रदेश के आने वाले चुनाव में किसकी सरकार बनेगी. टैक्सी ड्राइवर ने बिना झिझक, बिना कोई परवाह किये कि मैं किस विचारधारा का हूं-तपाक से कहा किभाई साहब सरकार तो अबकी मायावती की ही बनेगी. उसने बीएसपी की जगह सीधे मायावती का नाम लिया था. मैंने पूछा बीएसपी की सरकार क्यों बनेगी? तो उसने उत्तर दिया क्योंकि मायावती इ गुन्डन का बहुत सही इलाज करती है. मैंने फिर पूछा भाजपा क्यों नहीं आयेगी? तो उसने कहा कि भाजपा और मोदी ने अभी कुछ नहीं किया है. उल्टे महंगाई और बढ़ा दी है. इसलिये उत्तर प्रदेश में तो सरकार बीएसपी की ही बनेगी. लखनऊ से मैं गोरखपुर बाई रोड गया. अबकी बार मेरी टैक्सी का ड्राइवर बुजुर्ग व्यक्ति था. कोई 50-55 की उम्र का. मैंने थोड़ी देर में अपना वही प्रश्न दागा- भई अबकी उत्तर प्रदेश चुनाव में किसकी सरकार बनेगी. मुझे आश्चर्य हुआ कि फिर से मुझे उत्तर मिला कि मायावती का. गोरखपुर पहुंच कर छात्रों, शिक्षकों एवं नौकरी पैशा लोगों से यही सवाल दोहराने पर फिर वही उत्तर आया जो दोनों टैक्सी वालों ने दिया था. यहां इस लेख में इन तथ्यों का जिक्र करने का केवल इतना मकसद है कि बच्चा, बूढ़ा, नौजवान, औरत हो या आदमी सब यही कह रहे हैं कि  अबकी बार मायावती सरकार.


गोरखपुर से लौटकर लखनऊ में चर्चा के दौरान उत्तर प्रदेश में होने वाले 2017 के विधान सभा चुनाव के बारे में जो जानकारी मिली उसे यहां साझा करना आवश्यक है. सबसे पहले यहां यह बात उभर कर सामने आयी की सब की लड़ाई बसपा से है. सपा, भाजपा, कांग्रेस, आरएलडी, उवैसी हो या रामदास अठावले की आरपीआई सभी बीएसपी या मायावती को निशाना बना रहे हैं. पर आश्चर्य की बात यह है कि कोई भी विपक्षी दल खुले में या प्रत्यक्ष रूप से जनता के सामने बीएसपी को अपना मुख्य प्रतिद्वंदी या ‘दुश्मन नंबर एक’ मानने को तैयार नहीं है. विशेषकर भाजपा और सपा. केंद्र में भी अपनी सरकार बनाने के दो साल बाद भाजपा आज उत्तर प्रदेश में भी अपनी सरकार बनाने का दिवा स्वपन देख रही है. एक रणनीति और डर के तहत भाजपा खुद को बसपा के साथ लड़ाई में नहीं दिखाना चाह रही है. इसके लिये उसने सपा को अपना पहला विपक्ष बताना शुरू कर दिया है. भाजपा यह बताने की कोशिश कर रही है कि उत्तर प्रदेश में उसकी लड़ाई तो सपा से है, बसपा से नहीं. यहां तक कि उसके लीडर बसपा का नाम लेने से कतराते हैं. भाजपा और उसके नेताओं की साजिश बसपा को तीसरे नंबर की पार्टी के रूप में में प्रचारित करने की है. वैसे यह स्थिति भाजपा को सूट भी करती है क्योंकि भाजपा सपा की एंटी-इनकम्बेसी का लाभ उठाने की फिराक में है. भाजपा की रणनीति यह दिख रही है कि भाजपा एवं सपा अपने सांप्रदायिक एजेंडे से एक दूसरे से लड़ते हुए दिखेंगे तो दोनों को लाभ होगा और बसपा पीछे छूट जायेगी. हालांकि भाजपा के इस दावे को अगर दोनों टैक्सी ड्राइवर और उत्तर प्रदेश की जनता की कसौटी पर कसेंगे तो उसकी हवा अपने आप निकल जाती है.


12 जून को इलाहाबाद में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में यह बात खुल कर सामने आ गयी थी कि भाजपा, बसपा की अनदेखी का कतई नाटक नहीं कर सकती. उसे बसपा का संज्ञान लेना ही होगा. लेकिन भाजपा के पास बसपा पर कोई प्रत्यक्ष राजनैतिक हमला करने का मुद्दा नही है. इसलिये उसके अध्यक्ष ने एक नया जुमला गढ़ा है. यह जुमला है- भाजपा सपा-बसपा की जुगलबंदी को खत्म करेगी. परंतु भाजपा के किसी भी लीडर ने सपा-बसपा की जुगलबंदी क्या है इसको परिभाषित नहीं किया. लेकिन इस जुमले से एक बात अवश्य स्थापित हो गयी है कि भाजपा एवं उसका शीर्ष नेतृत्व चाह कर भी बसपा को तीसरे नंबर पर नहीं धकेल पाये और उन्हें बसपा को अपना मुख्य विपक्षी मानना पड़ा. यह बसपा एवं मायावती की जीत है. इसका मतलब यह हुआ कि भाजपा भी अब मान रही है कि उत्तर प्रदेश के 2017 के चुनावों में उसकी असली लड़ाई बसपा से होगी. इस स्थापना के बाद सपा खुद ब खुद तीसरे नंबर पर पहुंच गयी है.


दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के निशाने पर हमेशा बसपा रहती है और सपा एवं उसका शीर्ष नेतृत्व बसपा को अपनी राजनीति का विपक्षी नंबर वन मानता है फिर भी सपा प्रत्यक्ष रूप से यह मानने से परहेज कर रही है क्योंकि अगर सपा बसपा को आम जनता के सामने विपक्षी नंबर वन मान लेगी तो इससे बसपा को ही लाभ मिलेगा और बसपा नंबर एक पार्टी बन जायेगी. जन सामान्य की सोच में कहीं बसपा नंबर एक पोजीशन में न आ जाये, ऐसी स्थिति से बचने के लिये सपा बसपा को मुख्य विपक्षी दल मानने से इंकार करती रहती है. यद्धपि उसका एक-एक कदम तथा राजनैतिक पैतरा बीएसपी के एवं दलित विरोधी होता है. इसको कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है. सपा ने सबसे पहले डॉ. अम्बेडकर गोमती ग्रीन पार्क का नाम बदलकर जनेश्वर मिश्रा पार्क कर दिया. सत्ता में आते ही सपा सरकार ने मान्यवर कांशीराम के नाम पर उर्दू-फारसी विश्वविद्यालय का नाम बदल दिया. सवाल उठता है कि आखिर इसकी क्या आवश्कता थी? बाबा साहेब के नाम पर किसी स्थल का नाम बदलने की यह अपने आप में पहली घटना है. यह बाबा साहेब का अपमान है. फिर भी दलित समाज के नेता सपा से जाकर चुनाव लड़ते हैं. सपा ने जो सबसे बड़ा दलित विरोधी कार्य किया वह प्रोमोशन में आरक्षण के खिलाफ था. उच्चतम सरकार ने जब प्रमोशन में आरक्षण पर रोक लगाई तो सपा सरकार उसके खिलाफ अपील में नहीं गयी. अगर सपा सरकार अपील में गयी होती तो प्रमोशन में आरक्षण बना रहता. इतना ही नहीं जो दलित प्रमोशन में आरक्षण की वजह से पदोन्नत हुए थे उनको बड़ी बेदर्दी से रिवर्ट कर लज्जित किया गया. इसी कड़ी में जब मायावती ने प्रमोशन में आरक्षण हेतु संविधान संशोधन बिल राज्यसभा से पारित करके लोकसभा पटल पर रखवाया तब उस बिल को मुलायम सिंह की अगुवाई में दलित सांसद से फड़वा दिया गया. सपा की दलित विरोधी एवं दमनकारी राजनीति की पराकाष्ठा तब और भी उजागर होती है, जब हम देखते हैं कि उत्तर प्रदेश विधान सभा में सपा कोटे से चुन कर आये 58 आरक्षित वर्ग का एक भी विधायक दलितों की दुर्गती पर एक भी शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. क्या सपा के नेताओं ने इन 58 दलित विधायकों को डरा रखा है कि अगर दलितों के पक्ष में, प्रमोशन में आरक्षण के पक्ष में और बाबा साहेब के अनादर के एवं उत्तर प्रदेश में दलितों पर बढ़ते अत्याचारों के विरोध में बोलोगे तो तुम्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा. कुछ ऐसा ही हाल भाजपा से चुने गये आरक्षित वर्ग के सांसदों का है. वे सब के सब दलित मुद्दों पर मूक बने बैठे हैं. इसलिये बहुजन समाज की जनता को समझना होगा कि सपा और भाजपा की मुख्य लड़ाई बसपा है.


कांग्रेस भी बीएसपी को अपना प्रमुख विपक्षी मानती है यद्यपि उत्तर प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में उसकी अपनी कोई बड़ी हैसियत नहीं है. कांग्रेस के नेताओं का यह मानना रहा है कि बीएसपी की वजह से ही उनकी राजनीति उत्तर प्रदेश में हाशिये पर चली गयी है. अगर बीएसपी ने दलितों एवं अल्पसंख्यकों को कांग्रेस से नहीं छीना होता तो कांग्रेस हाशिये पर नहीं जाती. आज कांग्रेस इसीलिये दलित एवं अल्पसंख्यकों को रिझाने में लगी है. इसी प्रायोजन के तहत उसने गुलाम नबी आजाद को प्रभारी बनाकर भेजा है. लेकिन उसके बावजूद बसपा उसकी मदद करती रहती है. शायद कहीं न कहीं बसपा एवं बहनजी को मान्यवर कांशीराम की कही हुई बात याद आती है. मान्यवर कांशीराम कहते थे कि किसी भी एक पार्टी को बहुत बलशाली नहीं होने दो नहीं तो वह आपकी राजनीति के लिए हानिकारक होगा. शायद इसलिए बसपा ने कांग्रेस की सरकार उत्तराखण्ड में बचाई. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं हरियाणा आदि राज्यों से कांग्रेस के राज्यसभा के सांसदो को जिताने में मदद की ताकि कांग्रेस की स्थिति राज्यसभा में ठीक-ठाक बनी रहे. कांग्रेस बसपा को उत्तर प्रदेश में कितनी चुनौती दे पायेगी यह तो समय बतायेगा. लेकिन नैतिकता तो यही कहती है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बसपा की भी मदद करे.


कांग्रेस के अलावा रामदास अठावले एवं प्रकाश अम्बेडकर की आरपीआई के धड़े भी उत्तर प्रदेश में सक्रिय होकर बसपा के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं. इसी कड़ी में एमक्यूएम, पीस पार्टी भी बसपा पर अपना निशाना साध रही है. बहुजन मुक्ति मोर्चा एवं आम्बेडकर समाज पार्टी भी दलित लीडरो की अगुवाई में बसपा को दुश्मन नंबर एक प्रोजेक्ट कर उसको विलेन घोषित कर रहे हैं. इतना ही नहीं, कहा जा रहा है कि कुछ राजनैतिक दलों ने कुछ बौद्ध भिक्षुओ को बौद्ध धर्म यात्रा के बहाने बसपा एवं बसपा प्रमुख पर प्रहार करने के लिए भेजा है. इसमें सबसे अग्रणी भूमिका कभी किसी आयोग के सदस्य रह चुके भन्ते धम्माविर्यों निभा रहे हैं. अब बहुजन समाज के सदस्यों को इन सभी की चाल को समझना पड़ेगा, वे किस प्रकार से बसपा के खिलाफ एवं मायावती जी के खिलाफ अनरगल प्रचार को काउंटर कर पाएंगे इसकी रूपरेखा उन्हें जल्द ही बनानी पड़ेगी. उन्हें बहुजन समाज के लोगों को बताता पड़ेगा कि अम्बेडकरवाद का सच्चा सिपाही कौन है. अगर राजनीति में सामाजिक न्याय को जिंदा रखना है तो बसपा के हाथों को मजबूत करना ही होगा फिर चाहे सारी राजनैतिक पार्टियां ही दुश्मन क्यों न हो जाये.


बसपा को अभी अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतना बाकी है. उत्तर प्रदेश में यद्यपि अल्पसंख्यक समाज सपा-भाजपा की जुगलबंदी से उत्पन्न साम्प्रदायिक वातावरण से परेशान एवं भयभीत है और वह सपा से नाराज भी है, परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि वह बसपा की ओर पूरी तरह मुड़ गया है. अल्पसंख्यक को अपनी ओर पूरी तरह मोड़ने के लिए बसपा एवं उसके नेताओं को पूरा दम लगाना होगा. बसपा को बताना पड़ेगा कि  अल्पसंख्यकों का भविष्य बसपा के साथ ही क्यों सुरक्षित है. बसपा को अल्पसंख्यकों को समझाना पड़ेगा कि वह कांग्रेस एवं सपा से किस तरह से भिन्न है. उसको अपनी धर्मनिरपक्षेता के प्रति प्रतिबद्धता साबित करनी होगी. विशेष परिस्थिति में जब मीडिया एवं बुद्धिजीवी उसकी धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ झूठा प्रचार करते रहे हैं. लखनऊ से प्रकाशित होने वाले उर्दू अखबारों में लगातार अन्य राजनैतिक दलों एवं अल्पसंख्यकों के रिश्तों को लेकर पक्ष में लेख छप रहे हैं, पर बसपा वहां से नदारद है. अतः बसपा के नेतृत्व को जन सामान्य एवं विशेषकर अल्पसंख्यकों को यह बताना पड़ेगा कि वह धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ कैसे मजबूती से खड़ी है. उदाहरण के लिए जब उत्तराखंड की कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार पर साम्प्रदायिक ताकतों ने राष्ट्रपति शासन लगाया तब बसपा नेता मायावती ने कांग्रेस की सरकार को बचाकर साम्प्रदायिक ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दिया. पर मीडिया या अन्य किसी माध्यम से बसपा ने इसका प्रचार नहीं किया. इसी कड़ी में हाल ही में उत्तर प्रदेश में सम्पन्न हुए राज्यसभा के चुनावों में कांग्रेस के प्रत्याशी के जीतने की कोई उम्मीद नहीं थी. ऐसे में बसपा ने अपने कोटे के सरप्लस वोटों को उसके उम्मीदवार को स्थानान्तरित कर उसे जीता दिया. इससे हुआ यह कि भाजपा समर्थित उम्मीदवार की हार हुई. पर कांग्रेस के नेतृत्व ने इस सभी तथ्यों को कहीं भी प्रचारित नहीं किया.


अल्पसंख्यकों में भी पिछड़ी जाति के अल्पसंख्यकों पर बसपा को अधिक ध्यान देना होगा. पहले बसपा में अल्पसंख्यक समाज के कई नामचीन नेता हुआ करते थे जो बसपा की राजनीति को पिछड़ी जाति के अल्पसंख्यकों तक पहुंचाते थे. परन्तु आज बसपा में पिछड़ी जाति के अल्पसंख्यकों का कोई कद्दावर नेता सामने नहीं दिखाई दे रहा है, विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में. ऐसे में बसपा की ओर वह कैसे मुखातिब होगा. अतः बसपा को अल्पसंख्यकों को अपनी ओर मजबूती से लाने के लिए तथा उनमें अपने लिए विश्वास जगाने के लिए पूरी तरह प्रयास करने होंगे. उसे धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता साबित करनी होगी, उसे अपने खिलाफ चल रहे नाकारात्मक प्रचार पर अंकुश लगाना होगा, विशेषकर उर्दू प्रेस, मदरसों एवं मस्जिदों में होने वाले दुष्प्रचारों को काउंटर करने के लिेए प्रयास करने होंगे. एक समय में बसपा ने अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अपील छपवाई थी. उस अपील का शीर्षक था, अल्पसंख्यक समाज सोचे समझे और फिर वोट करे. इस अपील में बसपा की लीडरशिप को समझाना पड़ेगा कि उसके समय साम्प्रदायिक संघर्षों पर कैसे रोक लग जाती है. कानून व्यवस्था कायम रहने से अल्पसंख्यकों को कैसे फायदा होता है आदि अन्य बातें का जिक्र इस अपील में था. ऐसे प्रयास करने से अल्पसंख्यक समाज का रुझान बसपा की तरफ और भी मजबूत होगा.


बसपा सभी सर्वेक्षणों में आगे क्यों

विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर बसपा उत्तर प्रदेश में सभी राजनैतिक दलों से क्यों आगे है? यह बढ़त नकारात्मक नहीं है. अर्थात यह बढ़त केवल इस कारण नहीं है कि सपा सरकार में गुण्डा राज है और कानून एवं अभिशासन की हालत पतली है. मथुरा काण्ड ने इसको और भी हवा दी है. जिस सरकार के राज में डी.एस.पी. एवं एस.पी. मार दिये जाय, पुलिस थानों पर हमले हों और साम्प्रदायिक दंगों का खतरा हमेशा बना रहे, वहां उस सरकार पर कौन भरोसा करेगा. इससे भी सबसे ऊपर जहां, जिस राज्य के मुख्यमंत्री को उसी पार्टी के वरिष्ठ नेता कुछ न समझे, आई.ए.एस एवं आई.पी.एस आंख दिखाये ऐसे मुख्यमंत्री के राज में कानून-व्यवस्था कैसे दुरुस्त रहेगी. इन सबका फायदा तो बसपा को अवश्य मिलेगा परन्तु बसपा के पास लोगों का समर्थन सकारात्मक कारणों से ज्यादा हो रहा है. उसका सबसे बड़ा कारण है बसपा प्रमुख मायावती का कद.


उत्तर प्रदेश में नेतृत्व की बात करें तो फिलहाल विपक्ष के पास बसपा प्रमुख मायावती के कद का कोई नेता मौजूद नहीं है. कई विपक्षी दल केवल विकास का नारा दे रहे हैं, लेकिन उनकी विचारधारा से सामाजिक न्याय नदारद हैं. परन्तु बसपा सामाजिक न्याय के साथ विकास के लिए जानी जाती है. अगर अम्बेडकर ग्राम योजना से ग्रामीण बहुजनों को सामाजिक न्याय मिलता है तो कांशीराम शहरी विकास योजना से शहरी बहुजनों/गरीबों/सर्वजनों को न्याय मिलता है. दूसरी ओर 165 किलोमीटर लम्बी एक्सप्रेस वे, 3 विश्वविद्यालयों एवं 4 मेडिकल कॉलेजों का निर्माण, नवीन जमीन अधिग्रहण योजना तथा ग्रेटर नोएडा का निर्माण आदि विकास की योजनाएं थी, जिसका प्रचार कहीं नहीं हुआ पर आज सभी इस विकास को याद कर रहे हैं. लॉ एंड आर्डर में तो बसपा शासन का कोई सानी नहीं है. बसपा प्रमुख मायावती जी ने अपने शासन काल के दौरान यह साबित किया है कि बसपा का शासन कानून का राज, विकास एवं सामाजिक न्याय का अद्भुत संगम है.


- यह लेख दलित दस्तक मासिक पत्रिका के जुलाई अंक की कवर स्टोरी है। इसके लेखक प्रो. विवेक कुमार प्रख्यात समाजशास्त्री और जे.एन.यू, दिल्ली में सोशल साइंस विभाग में प्रोफेसर हैं। संपर्क- vivekambedkar@yahoo.co.in


  • Comments(3)  


    Subodh kumar

    Salute u sir


    vipin jatav

    Jai bhim sir. .... Bahut hi satik or tarkik analysis vivek sir ke dwara....... Apne bahut hi gahanata se bsp ki taiyariyo pr prakash dala. Sath hi no-1 position pr bsp ko ane hetu or kya kya krna chahiye iska bhi micro analysis kiaa .................. Sir ji ko mera jai bhim. ........... Aap mere jaise karodho yuvayo ki asim urja ke preradjashrot ho..


    vikrama jeet yadav

    डॉ लोहिया की जन्मस्थली अकबरपुर को बाबा साहेब के नाम पर जनपद बनाने को क्या कहेंगे?


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