अजाक्स की रैली से प्रदेश में कर्मचारियों का उत्साह बढ़ा है- जे.एन. कंसोटिया

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12 जून के बाद मध्य प्रदेश में हचलच बढ़ गई है. कारण मध्य प्रदेश अनुसूचित जाति एवं जनजाति कर्मचारी एवं अधिकारी संघ यानि ‘अजाक्स’ की भोपाल में हुई वह रैली है, जिसमें प्रदेश भर से पहुंचे लाखों सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों ने एक साथ अपनी मांगों को लेकर हुंकार भरी. इस कार्यक्रम में जुटी भीड़ को देखकर सरकार इतने दबाव में आ गई कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को खुद यह घोषणा करनी पड़ी कि आरक्षण कोई खत्म नहीं कर सकता. यह सफल कार्यक्रम अजाक्स के प्रांतीय अध्यक्ष जे.एन. कंसोटिया के नेतृत्व में हुआ. 1993 में गठित हुए अजाक्स के श्री कंसोटिया 2005 से अध्यक्ष हैं. इस कर्मचारी आंदोलन को लेकर ‘दलित दस्तक’ के संपादक अशोक दास ने भोपाल में जे.एन. कंसोटिया से बात की.

12 जून की रैली के बाद क्या फर्क पड़ा है?

–  देखिए, उस रैली के बाद दो बदलाव आया है. अच्छी बात यह है कि उस रैली में सरकार ने जो घोषणा की थी, उसके अनुसार कार्यवाही कर रही है. सरकार ने आश्वासन दिया है कि वो अजाक्स द्वारा उठाए गए मुद्दों के पक्ष में काम करेगी. कार्यक्रम में एससी/एसटी कर्मचारियों और अधिकारियों की एकता सामने आई है, जिससे उनके बीच उत्साह बढ़ा है. उनकी हिम्मत बढ़ी है कि वह बड़ा काम कर सकते हैं. जो एक निगेटिव बात हुई है वह यह है कि हमारे ही बीच के दो-तीन लोग गुटबंदी करने लगे हैं. उन्होंने अपना एक अलग गुट बना लिया है, जिसमें दूसरे कम्युनिटी के लोगों को भी शामिल कर लिया गया है. हालांकि उनके साथ समाज के लोग नहीं गए हैं.

अजाक्स की मांगे क्या है?

– रिजर्वेशन इन प्रोमोशन कंटिन्यू होना चाहिए. बैकलाग भरा जाए. छात्रों को स्कॉलरशिप टाइम से मिले. विद्यार्थियों के हॉस्टल का मुद्दा देखा जाए. सबको हॉस्टल की सुविधा मिले. इसके साथ ही सेल्फ इम्प्लाइमेंट के मुद्दे पर भी ध्यान दिया जाए. इसके लिए समय पर फंडिंग हो. हमारा मानना है कि सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक न्याय भी हो.

अजाक्स की गतिविधियों की बात करें तो यह संगठन किन मुद्दों को देखता है?

– हम अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवाओं से संबंधित मुद्दों को देखते हैं. सरकार के नियम-कानून और संवैधानिक दायरे में रहते हुए यह संगठन काम करता है. चूंकि हमारा संगठन सामाजिक है, इसलिए जब हम चर्चा करते हैं तो कर्मचारियों की सेवाओं के साथ-साथ समाज से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा करते हैं कि समाज में किस तरह जागरूकता लाई जाए. समाज के लोगों को उनके शिक्षा के अधिकार, समानता के अधिकार और उनको प्राप्त संवैधानिक अधिकारों की चर्चा करते हैं. हम ‘पे बैक टू सोसाइटी’ के मुद्दे पर भी चर्चा करते हैं कि जिस समाज ने हमको सबकुछ दिया है; उसके भी थोड़ा काम आ सकें. हम संगठन के माध्यम से समाज के लोगों को प्रेरित करते हैं. उनको उनके अधिकारों के बारे में बताते हैं और यदि उनके साथ कुछ गलत होता है तो हम उनको मदद करते हैं.

आप किन परिस्थितियों से निकलते हुए आईएएस के पद तक पहुंचे. अपने बारे में बताइए. 

– मैं राजस्थान का रहने वाला हूं. नागौर जिले के कुचामन सिटी का. निश्चित तौर पर मैं ऐसे परिवार से आता हूं जहां अभाव था. मैं फर्स्ट जेनरेशन का बंदा हूं. मैं अपने परिवार का पहला व्यक्ति हूं जिसने छठी कक्षा पास की. मेरे से पहले मेरे परिवार में कोई इतना पढ़ा-लिखा नहीं था. पिताजी के पास कोई संसाधन नहीं था. वो शू-मेकिंग का अपना परंपरागत काम करते थे. मेरे साथ यह अच्छी बात थी कि मुझे शुरू से ही पढ़ना अच्छा लगता था. मैंने मेहनत की तो मुझे आगे बढ़ने का मौका मिला.

मेरा गांव टाउन है, तो वहीं से मैंने हाई स्कूल पास किया. फिर जयपुर के महाराजा कॉलेज पढ़ने गया. मैं बॉयलोजी का छात्र था क्योंकि मेरे घरवाले मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे. लेकिन परिस्थितियां ऐसी थी कि अगर मैं डॉक्टर बन जाता तो मेरे दूसरे भाई-बहन नहीं पढ़ पाते. क्योंकि डॉक्टरी का खर्चा ज्यादा होता है. मैंने डॉक्टर बनने का ख्याल छोड़ दिया और सिंपल ग्रेजुएशन करने लगा ताकि मेरे दूसरे भाई-बहन भी पढ़ सकें और मैं अपने पिताजी की मदद कर सकूं. इस तरह मैं शासकीय सेवा में आया. बैंक में नौकरी करते हुए ही मैंने कंप्टीशन परीक्षा पास की और शासकीय सेवाओं में आया. मैं 1989 बैच में सीधे आईएएस के लिए चुना गया.

आप किन-किन पदों पर कहां-कहां रहें?

– मेरी पहली पोस्टिंग उज्जैन में असिस्टेंट कलेक्टर के पद पर हुई. 92 के सिंहस्थ में वहीं एसडीएम था. रायगढ़, बिलासपुर (अभी छत्तीसगढ़) में असिस्टेंट कलेक्टर रहा. इधर रहते हुए ही मुझे आदिवासी इलाकों में काम करने का मौका मिला. खासकर बिरहोर जनजाति के लिए काम किया. मैं वहां प्रोजेक्ट डायरेक्टर था. छतरपुर में दो साल कलेक्टर रहा, राजगढ़ में चार साल कलेक्टर रहा. कई और जगहों पर रहने के बाद भोपाल में कई विभागों में सेक्रेट्री रहा. अभी मैं मुख्य सचिव (महिला एवं बाल विकास) हूं.

सामाजिक सरोकार से आप कैसे जुड़े?

– मैंने बचपन से ही अनुसूचित जाति/ जनजाति की दिक्कतों को देखा है. जब मैं इस नौकरी में आया तो मुझे लगा कि मैं निचले पायदान पर खड़े इस समाज के लिए कुछ कर सकता हूं. योजनाओं के क्रियान्वयन में नियमानुसार उनको प्राथमिकता दे सकता हूं. संवैधानिक दायरे और सरकारी सीमा में रहते हुए उनके सशक्तिकरण के लिए काम कर सकता हूं तो मुझे करना चाहिए. मध्य प्रदेश में आकर देखा कि यहां के आदिवासी भाईयों और अनुसूचित जाति के भाईयों को इसकी जरूरत भी है. उनके हित के लिए काम करने से उनको व्यवस्था में विश्वास भी होता. मेरा शुरू से यह सोचना रहा है कि जो शासन है और उसकी प्रजातंत्र की जो अवधारणा है वह हमेशा से एक वेलफेयर स्टेट की अवधारणा है. और ऐसे में प्रशासनिक अधिकारी को जनता के वेलफेयर के लिए काम करना चाहिए. और जब हम वेलफेयर की बात करते हैं तो इसकी सबसे ज्यादा जरूरत अनुसूचित जाति/ जनजाति और गरीब चाहे वो किसी भी वर्ग का हो उन लोगों को है. इस तरह मैंने समाजिक दायित्वों को भी निभाना शुरू किया.

किससे प्रभावित रहें?

– देखिए, बचपन से तो ऐसा कोई आइडिया नहीं था लेकिन जब बाबासाहेब को पढ़ा और जाना तो लगा कि जब उन्होंने इतने संघर्ष और मुश्किल के बावजूद देश के गरीबों, पिछड़ों और महिलाओं के लिए इतना काम किया तो हमें भी सरकारी दायरे में रहते हुए यह करना चाहिए. ताकि हम देश एवं समाज के विकास की गति बढ़ा सके.

वंचित तबके से आने वाले अधिकारियों की समाज के प्रति क्या जिम्मेदारी होनी चाहिए? 

– देखिए, मेरा मानना है कि जब सामान्य वर्ग का कोई अधिकारी होता है तो वंचित समाज को उससे उतनी अपेक्षा नहीं होती. लेकिन जब वंचित तबके का ही कोई व्यक्ति अधिकारी बनकर आता है तो उसे उसका समाज उम्मीद भरी नजरों से देखता है. उसे उम्मीद होती है कि उसके ही समाज से आना वाला व्यक्ति निश्चित ही संवेदनशील होगा. उसे इस तबके की दिक्कतें पता होंगी, इसलिए वो उम्मीद करता है जो जायज भी है.

क्या है अजाक्स

मध्य प्रदेश अनसूचित जाति एवं जनजाति अधिकारी एवं कर्मचारी संघ यानी अजाक्स एक सामाजिक संगठन है. यह सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों का संघ है और शासन से मान्यता प्राप्त है. प्रदेश के पूरे 51 जिलों में इसकी कार्यकारिणी है. संगठन 1993 में शुरू हुआ और 1994 में इसका रजिस्ट्रेशन हुआ. वरिष्ठ आई.ए.एस (रिटा.) अमर सिंह इसके अध्यक्ष रह चुके हैं. जे.एन. कंसोटिया सन् 2005 से इसके अध्यक्ष हैं.

अशोक दास

अशोक दास

बुद्ध भूमि बिहार के छपरा जिले का मूलनिवासी हूं।गोपालगंज कॉलेज से राजनीतिक विज्ञान में स्नातक (आनर्स) करने के बाद सन् 2005-06 में देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान, जेएनयू कैंपस दिल्ली’ (IIMC) से पत्रकारिता में डिप्लोमा। 2006 से मीडिया में सक्रिय। लोकमत, अमर उजाला, भड़ास4मीडिया और देशोन्नति (नागपुर) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया। पांच साल तक कांग्रेस, भाजपा सहित तमाम राजनीतिक दलों, विभिन्न मंत्रालयों और पार्लियामेंट की रिपोर्टिंग की।
'दलित दस्तक' मासिक पत्रिका के संस्थापक एवं संपादक। मई 2012 से लगातार पत्रिका का प्रकाशन। जून 2017 से दलित दस्तक के वेब चैनल (www.youtube.com/c/dalitdastak) की शुरुआत।
अशोक दास

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