इंग्लिश चैनल को पार करने वाले सत्येंद्र जाटव बनें एशिया के पहले दिव्यांग तैराक

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नई दिल्ली। सत्येंद्र सिंह जाटव ने गरीबी व दिव्यांग होने के बावजूद भी समुद्र पार ना केवल देश-दुनिया में नाम रोशन किया है. सत्येंद्र सिंह का पैर काम नहीं करता है यानी कि 75 फीसदी तक इनका शरीर काम नहीं करता है. मुश्किल केवल इतनी ही नहीं थी ट्रेनिंग लेने के लिए पैसे नहीं थे. इन तमाम मुश्किलों को मात देने के बाद सत्येंद्र ने समुद्र को भी मात दे दी.

34Km का इंग्लिश चैनल पार

सत्येंद्र सिंह जाटव मध्य प्रदेश के ग्वालियर के रहने वाले हैं. पैरास्विमर सत्येन्द्र ने ब्रिटेन और यूरोप के बीच के समुद्र यानि इंग्लिश चैनल को पार करके इतिहास रच दिया है. स्विमर सत्येन्द्र ने 12 घंटे और 26 मिनट में 34 किलोमीटर का इंग्लिश चैनल पार किया. रिले की तर्ज पर सत्येन्द्र ने अपने तीन साथियों के साथ ये उपलब्धि हासिल की है. महाराष्ट्र के चेतन राउत, बंगाल के रीमो शाह और राजस्थान के जगदीश चन्द्र ने तैराकी की. इसके साथ ही सत्येन्द्र इंग्लिश चैनल पार करने वाले एशिया के पहेल पैरास्विमर (दिव्यांग तैराक) भी बन गए है. यही नहीं पूरे एशिया में भी यह खिताब हासिल करने वाले वह पहले दिव्यांग तैराक बन गए हैं.

इससे पहले सत्येंद्र तैराकी का सबसे बड़ा खिताब विक्रम अवॉर्ड से नवाजे जा चुके हैं. इसके अलावा करीब तैराकी स्पर्धाओं में अबतक 16 मैडल जीते हैं.

पैरों ने दे दिया जबाव

दरअसल, सत्येंद्र बचपन से ही दिव्यांग हैं. जब वह 15 दिन के थे उन्होंने ग्लूकोज ड्रिप के रिएक्शन के चलते अपने पैर खो दिेए. गरीबी के कारण भी इनका इलाज ठीक ढंग से ना हो सका. सतेंद्र को बचपन से ही तैराकी का शौक था,  लेकिन दिव्यांगता के चलते शुरुआती दौर में उन्हें खासी समस्याओं का सामना करना पड़ा. पर कमजोर शरीर को अपन ताकत बनाई और सबसे पहले अपने गांव की बैसली नदी में तैराकी की. इसके बाद तैराकी का हुनर निखरने लगा लेकिन इसके लिए उनको ट्रेनिंग की जरूरत भी थी. इसलिए ट्रेनिंग के लिए सत्येंद्र ने अपने पास बचे घर को गिरवी रखकर दाव पर लगा दिया. सत्येंद्र ने पहला मैडल कलकत्ता में 2009 में हासिल किया. और आज इनके जज्बे को दुनिया सलाम कर रही है.

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