”अम्बेडकरवाद” को स्थापित करती फिल्म “काला”

किसी ने कहा था की “जिस विचार को आने का समय हो गया है उसे रोका नहीं जा सकता” गाँधीवाद, समाजवाद, वामपंथ के बाद ”अम्बेडकरवाद” ही वो विचार है जो भारतीय विमर्श में आ गया है.

और उसी को स्थापित करती है फिल्म “काला”…

अगर मैं कहूँ की विचारधारा के तौर पर ये भारत की ये पहली फिल्म है जिसमें अम्बेडकरवाद को दिखाया गया तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. फिल्म आंबेडकर आंदोलन के प्रतीकों से भरी पड़ी है. घरों की छतों से ले कर कलाकारों के कपड़ो का नीला रंग हो, आंबेडकर, पेरियार, फूले और बुद्ध की मुर्तिया या तस्वीरें हों, बस्ती का नाम भीमवाड़ा से ले कर किरदारों का जय भीम बोलना, काला की मीटिंग पॉइंट का एक बौद्ध विहार होना आदि प्रतीक भरे पड़े हैं.

ब्लैक पैंथर आंदोलन के दौरान उत्पन्न हिप हॉप की तर्ज पर एक डांस और सिंगर ग्रुप भी है जो अमेरिकन ब्लैक क्रांति से इसको जोड़ता हुआ दिखता है. फिल्म जमीन के दर्शन को पहले सीन में ही बता देती है कि, जमीन ही इंसान की हैसियत निर्धारित करती है इस देश में. उत्तर भारत में इस फिल्म को काफी कम देखा गया है और अगर देखा जाता तो बहुत से आज कल के कथित राष्ट्रवादीयों को इस पर आपत्ति हो सकती है और उनको विवादित भी लग सकती है, बीजेपी और शिवसेना की राजनीति को एक तरह से सीधा टारगेट किया गया.

दलित-मुस्लिम एकता दिखाई गयी है. उन दलित नेताओ पर भी टिप्पणी है जो दलित कोटे से टिकट ले कर जीत जाने के बाद बिक जाते हैं. फिल्म दलितों को सन्देश देती है कि पढ़ाई करो और शाराब कभी न पियो, फिल्म वामपंथ को पूरी तरह खारिज करती है (मैं इस बात को पहले से कहता आया हूं कि वामपंथ हमारे देश के लिए नहीं है, यहाँ वर्ग भेद नहीं, जाति भेद है) फिल्म का किरदार लेनिन बाद में अम्बेडकरवाद समझ पाता है.

फिल्म उन दलितों पर भी कटाक्ष करती है जो आगे बढ़ गए है और खुद को दलितों से ही दूर रखना चाहते हैं, दलित समाज की कमजोरियां भी उजागर की गयी है. फिल्म में राम रावण के युद्ध का वर्णन करती हुई राम कथा है जिसका जिक्र करना मैं उचित नहीं समझता. फिल्म के अंदर दलितों के हाल के आंदोलनों को इधर-उधर दिखाया गया है. साथ ही दलितों का श्रम कितना महत्वपूर्ण है उसकी बानगी दलितों की हड़ताल वाली घटना दिखाती है, सफेदपोश लोगों के विचारो की संड़ांध भी है जो दलितों को सिर्फ अपराधी समझती है. फिल्म का एन्ड अवसाद पैदा करता है बिलकुल इसी तरह जैसे की आज के दौर में दलित आंदोलन है निराश. खैर फिल्म में विचारो के तौर पर इतना है की काफी कुछ लिखा जा सकता है.

वही बात करे की इस फिल्म में सिनेमा प्रेमियों के लिए क्या है तो सबसे पहले रजनीकांत जो ग्रेस और स्टाइल रजनीकांत का है उसको देख कर लगता है कि एक सत्तर साल का आदमी भी कितना जमता है अगर वो खुद पर ध्यान दे तो, सभी पचास प्लस लोगो को रजनीकांत को फॉलो करना चाहिए. दूसरा एक दृश्य है जिसमे रजनीकांत फ्लाईओवर पर अपने छाते से गुंडों को पिटता है वो सीन इतना शानदार है की उसका फ्रेम बनवा कर लगवा सकते हैं, फिल्म का ह्यूमर भी अच्छा है, अंतिम गाना और सीन भी बहुत ही शानदार है.

फिल्म की सबसे बड़ी कमी है उसकी लम्बाई ये एक घंटा कम हो सकती थी हुमा कुरैशी इतने लम्बे टाइम के लिए क्यों है समझ नहीं आता अगर उसका किरदार नहीं होता तो फिल्म को कोई फर्क नहीं पड़ता फिल्म छोटी भी होती, काफी सारी चीजों को कहने के चक्कर में निर्देशक कई जगह भटका- सा लगता है. पर क्या पता निर्देशक ने ये जान कर ही किया हो, इस फिल्म के निर्देशक है पा. रंजीत जो की अम्बेडकरवादी है जिसका दर्शन पिछली फिल्म कबाली में जो छुपा कर दिखाया वो इस फिल्म में खुल कर दिखाया है. मसान के निर्देशक नीरज घेवान वही सैराट के निर्देशक नागराजमंजुले ये तीनो ही दलित है और बॉक्स ऑफिस के सफलता के साथ दलित विमर्श को जिस सावधानी और ख़ूबसूरती से अपनी फिल्मों में स्थान दे रहे है उसके लिए ये प्रसंशा के पात्र हैं.

लेखक- मनोज कुमार जाटव​

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