भारत बंद के पीछे पूंजीभूत हुईं मोदी सरकार की सवर्णपरस्त नीतियां !

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गत 3 अप्रैल को सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय यादव शक्ति पत्रिका के संपादक चन्द्रभूषण सिंह यादव ने 2 अप्रैल को हुए भारत बंद पर एक पोस्ट डाला, जिसे बहुत से लोगों की लाइक मिली. ‘भारत बंद पर और दलित चेतना’ शीर्षक डाले गए उस पोस्ट में उन्होंने लिखा था-‘मैं दलित चेतना और उनके संघर्ष को कोटिशः नमन करता हूँ क्योंकि वे ही कौमें जिंदा कही जाती हैं जिनका इतिहास संघर्ष का होता है,जो अन्याय के प्रतिकार हेतु स्वचेतना से उठ खड़े होते हैं. 2 अप्रैल 2018 का दिन दलित चेतना का,संघर्ष का,बलिदान का,त्याग का ऐतिहासिक दिन बन गया है क्योंकि बगैर किसी राजनैतिक संगठन या बड़े नेता के आह्वान के सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया पर दलित नौजवानों/बुद्धिजीवियों की अपील पर पूरे देश में दलित समाज का जो स्वस्फूर्त ऐतिहासिक आंदोलन उठ खड़ा हो गया,वह देश के तमाम बड़े आंदोलनों को पीछे छोड़ते हुए एक अद्वितीय और अनूठा आंदोलन हो गया है.

अब तक देश मे जितने बड़े अंदोलन हुए उन सबका नेतृत्व या तो किसी नेम-फेम वाले बड़े व्यक्ति/नेता ने किया या किसी बड़े राजनैतिक/सामाजिक संगठन द्वारा प्रायोजित हुवआ, जिसका भरपूर प्रचार -प्रसार विभिन्न माध्यमों से या मीडिया द्वारा किया गया . लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी ऐक्ट में किये गए अमेंडमेंट के बाद सोशल मीडिया पर एक न्यूज उछला कि 2 अप्रैल को दलित समाज द्वारा भारत बंद किया जाएगा. इस आह्वान का कर्ता-धर्ता कौन है,यह अपील किसकी है,ये सब कुछ बेमानी हो गया और सोशल मीडिया पर उछले इस अपील की परिणति यह हुई कि 2 अप्रैल को पूरा भारत बिना किसी सक्षम नेतृत्व के बुद्धिजीवियों/छात्रों/नैजवानों और प्रबुद्ध जनो के सड़क पर उतर जाने से बंद हो अस्त-व्यस्त हो गया.

इस आंदोलन का एक पहलू जहाँ यह रहा कि पूरे देश के दलित बुद्धजीवी एकजुट हो करो या मरो के नारे के साथ जय भीम का हुंकार भरते हुए देश भर में सड़कों पर आ गये तो कथित प्रभु वर्ग अपने अधिकारों को बचाने हेतु आंदोलित संविधान को मानते हुए शांतिपूर्ण सत्याग्रह कर रहे वंचित समाज के लोगो पर ईंट-पत्थर-गोली चलाते हुए इस आंदोलन को हिंसक बना दिया जिसमें 14 दलित साथी शहीद हो गए.

यह आंदोलन अपने आप मे बहुत ही महत्वपूर्ण आंदोलन हो गया है क्योंकि अपने संवैधानिक अधिकारों को महफ़ूज बनाये रखने के लिए शहादत देने का ऐसा इतिहास अब तक किसी कौम ने नही बनाया है.यह दलित समाज ही है जो अपने अधिकारों व सम्मान के लिए लड़ना व मरना जानता है.‘

वास्तव में दलितों का स्वतःस्फूर्त भारत बंद था ही इतना प्रभावशाली कि यादव शक्ति पत्रिका के संपादक की भांति तमाम समाज परिवर्तनकामी बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट उसकी सराहना करने में एक दूसरे से होड़ लगाये . उस दिन सचमुच देश थम गया था. यूपी-बिहार , राजस्थान-पंजाब-हरियाणा इत्यादि की भांति ही 2 अप्रैल का भारत बंद हर जगह सफल रहा. तमाम जगहों पर ट्रेनों के चक्के थम गए, सड़क यातायात रुक गया: दुकानें बंद हुईं एवं जीवन अस्त व्यस्त हो गया. इस दौरान यह कई जगहों पर हिंसात्मक रूप अख्तियार कर लिया. विरोध प्रदर्शन के दौरान बिहार में भारी बवाल हुआ. पटना समेत प्रमुख शहरों और जिला मुख्यालयों में हालात बेकाबू हो गए. स्कूल, कॉलेज, और बाजार बंद रहे .

पंजाब सरकार के शांतिपूर्ण बंद की अपील को ताक पर रखते हुए प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की. इस दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रही. अमृतसर, जालंधर सहित चार जिलों में ट्रेनों को रोका गया. शिक्षण संस्थान , सरकारी व प्राइवेट बसें पूरी तरह बंद रहीं, मोबाइल इंटरनेट सेवा व एसएमएस सेवा भी बंद रही . हरियाणा के पंचकुला,अम्बाला , कैथल, हिसार, रोहतक, यमुनानगर, फरीदाबाद, गुरग्राम व चंडीगढ़ में दलितों ने विरोध मार्च निकाले. सड़क व रेल यातायात बाधित किया. समूचे राजस्थान में जगह-जगह तोड़ –फोड़, आगजनी की घटनाएं सामने आयीं. एससी/एसटी एक्ट में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश में बंद बेहद सफल रहा. किन्तु कुछ जिलों में हिंसात्मक रूप ले लिया .

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चार जिलों मेरठ, आगरा, हापुड़, और मुजफ्फरनगर में तो हालात इतने बेकाबू हो गए कि दोपहर बाद चार कंपनी आरएऍफ़ और भेजनी पड़ी. इस दौरान मेरठ में दो और मुजफ्फरनगर में एक की मौत हो गयी. किन्तु मौतों के लिहाज से ज्यादे चर्चा में रहा , मध्य प्रदेश . यहाँ भारत बंद के दौरान ग्वालियर में दो, भिंड में तीन , मुरैना व डबरा में एक-एक जानें गईं. शाम होते-होते अधिकांश चैनेल ही इस सफलतम बंद के पीछे क्रियाशील कारणों की खोज करने के बजाय बंद के दौरान हुई घटनाओं को प्रमुखता देकर इसकी अहमियत कम करने की कोशिश किये.

बहरहाल बंद के दौरान जो हिंसक घटनायें हुईं , उसके लिए देश के सबसे सज्जन युवा नेता अखिलेश यादव सहित ढ़ेरों लोगों ने ही भाजपा को जिम्मेवार ठहराया है, जिससे कोई इनकार भी नहीं कर सकता. दरअसल कानून के अनुपालन में अगली क़तार में रहने वाले दलितों ने स्वतःस्फूर्त से जब भारत बंद अंजाम दे डाला, यह बात विशेषाधिकारयुक्त तबकों की चैम्पियन भाजपा को भौचक्क कर दी. भाजपाई सोच भी नहीं सकते थे कि बंद का ऐसा रूप वे देख्नेंगे.किन्तु सोशल मीडिया के सौजन्य से शुरू से ही ज्यों -ज्यों इसके सफल होने की खबर आने लगीं , संघ परिवार बेचैन होने लगा. और अंत में इस यादगार और शानदार बंद की गरिमा को म्लान करने के लिए उसे उसमें हिंसा की छौंक लगानी पड़ गयी. पर,यह, बंद इतिहास के पन्नों में जगह बना चुका है.

इस बंद की अहमियत पर फेसबुक पर रमेश मांझी की ओर से एक बेहद महत्वपूर्ण पोस्ट पढने को मिला. मांझी जी ने अपने पोस्ट की शुरुआत में ही लिखा है-’ 2 अप्रैल, 2018 का भारत बंद एक नया इतिहास बन चुका है. इसे आने वाले समय में स्कूलों में पढ़ाया जायेगा, जानिए क्यों ? भारत में समय-समय पर अनेकों बार भारत बंद होते रहे हैं,लेकिन 2 अप्रैल ,2018 भारत का एक नया इतिहास बन चुका है. इस भारत बंद की निम्नलिखित विशेषताएं हैं.’ आगे इस बंद की 27 वीं व आखरी विशेषता बताते हुए उन्होंने लिखा है-‘दो अप्रैल भारत बंद क्रांति का इतिहास आने वाले भविष्य में स्कूलों एवं कॉलेजों में पढाया जायेगा एवं इस पर टीवी सीरियल एवं फिल्में भी बनेंगी . इसलिए इससे सम्बंधित फोटो , वीडियो , सीडी, डी वी डी इत्यादी साक्ष्य के रूप में पेश करने के लिए सुरक्षित रखें.‘

इसमें कोई शक नहीं कि यह बंद निर्विवाद रूप से ऐतिहासिक रहा और इसने बदले हुए दलित साईक का साक्ष्य पेश कर दिया है. इस ऐतिहासिक बंद पर मीडिया द्वारा हिंसात्मक घटनाओं को ज्यादा जोर दिए जाने से इसकी सफलता के पीछे क्रियाशील कारणों की सही पड़ताल नहीं हो पाई है.पर, इसमें कोई शक नहीं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी एक्ट को निष्प्रभावी किये जाना एकमेव कारण नहीं रहा. इसके लिए पूरी तरह जिम्मेवार मोदी राज की सवर्णपरस्त रही .इसका सबसे पहला प्रकटीकरण मोदी राज में 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के प्रतिभाशाली छात्र रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद हुआ. किन्तु रोहित की हत्या के बाद उठे जनविक्षोभ से मोदी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया. वह बेख़ौफ़ होकर ऐसी नीतियाँ बनाती रही, जिससे शक्ति के सारे स्रोत(आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक और धार्मिक इत्यदि) पूरी तरह जन्मजात विशेषाधिकारयुक्त अल्पजन तबकों के हाथ में चली जाय. इसके तहत उन सरकारी उपक्रमों को बड़ी तेजी से निजी हाथों में देने का प्रयास किया गया, जहाँ दलित-आदिवासियों-पिछड़ों को आरक्षण मिलता है. इन्हें आरक्षण से वंचित करने के लिए ही एयर इंडिया, रेलवे स्टेशनों, हास्पिटलों इत्यादि को निजी हाथों में सौपने का उपक्रम चलाया गया. मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों का भयावह परिणाम 2018के जनवरी के शेष में तब सामने आया जब ऑक्सफैम की रिपोर्ट सामने आई . रिपोर्ट से पता चला कि 2016 और 2017 के बीच 1% टॉप की आबादी की दौलत में 15% इजाफा हुआ,जिससे उनके हाथ में आज 73 % दौलत पर कब्ज़ा हो गया है. कुल मिलाकर ऑक्सफैम की रिपोर्ट सामने आने बाद स्पष्ट हो गया कि 10 % विशेषाधिकारयुक्त तबकों के हाथ में 90 % धन-संपदा चली है.

इससे बहुजनों के आक्रोश में लम्बवत विकास हो गया. इसी बीच यूजीसी ने स्वायत्तता के जरिये प्रतिष्ठित यूनीवर्सिटीयों को निजी हाथ में देने एवं दलित-आदिवासी-पिछड़े समुदायों के युवाओं को प्रोफ़ेसर बनने से रोकने लिए जो फैसले लिए उसने आरक्षित वर्गों के क्रोधाग्नि में घी डालने का काम किया. अभी बहुजन समाज के लोग मोदी सरकार की सवर्णपरस्त नीतियों के खिलाफ कमर कसने का मन बना ही रहे थे कि एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया. और इस फैसले के खिलाफ किसी कोने से जब भारत बंद की आवाज उठी, बिना किसी नेतृत्त्व और तैयारी के पूरा दलित समुदाय स्वतः स्फूर्त रूप से सडकों पर उतर आया और उनका भारत बंद इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. बहरहाल भारत का विशेषाधिकारयुक्त तबका दलित साईक में आये बदलाव को सहजता से नहीं लेने जा रहा है. इसलिए उसने पिछड़े भाइयों को सामने रख कर एक नए भारत-बंद के जरिये बहुजन एकता में पलीता लगाने तथा दलितों में बढे मनोबल तोड़ने के लिए 10 अप्रैल को एक नए भारत बंद की घोषणा कर दिया है. अब लाख टके का सवाल है,’क्या आरक्षित वर्गों के जागरूक लोग विशेषाधिकार युक्त तबकों के नए भारत बंद के पीछे छिपे मंसूबों को व्यर्थ कर पायेंगे ?

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