बुद्ध पूर्णिमा का महत्व

बुद्ध पूर्णिमा बौद्धों के लिए सबसे पावन व सबसे महत्वपूर्ण पर्व है. बुद्ध पूर्णिमा अथवा वैशाख पूर्णिमा को त्रिविध पावन माना जाता है, क्योंकि भगवान बुद्ध के जीवन की तीन महत्वपूर्ण घटनाएं जन्म , संबोधी प्राप्ति और महापरिनिर्वाण वैशाख पूर्णिमा के दिन हुई थीं. वैशाख पूर्णिमा, जिसे बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती भी कहा जाता है, इसी दिन भगवान बुद्ध का लुम्बिनी में जन्म हुआ, बोध गया में उन्हें सम्यक संबोधि प्राप्ति हुई व कुशीनारा में उनका महापरिनिर्वाण हुआ. इन तीनों घटनाओं में सम्यक संबोधि प्राप्ति का सबसे अधिक महत्व है.

जन्म व महापरिनिर्वाण तो मानव मात्र के जन्म व मृत्यु का प्रतीक है, लेकिन सम्य्क संबोधि तो लाखों वर्षों में कहीं एकाध बार ही होती है. कोई आश्चर्य नहीं, वैशाखी पूर्णिमा पर देश-विदेश के लाखों बौद्ध बोधगया मेंभगवान बुद्ध की वज्रासन प्रतिमा की पूजा करते हैं. इस पावन दिन बौद्ध उपासक-उपासिकाएं गरीबों को भोजन कराकर, रोगियों को दवा देकर और चिडि़यों व मछलियों को आजाद करके प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, क्योंकि बौद्ध धर्म में प्रेम व करूणा को ही सर्वोच्च स्थान दिया गया है.

सिद्धार्थ गौतम का जन्म 563 ई. पूर्व वैशाख पूर्णिमा के दिन लुम्बिनी में हुआ था. 16 वर्ष की उम्र में राजकुमारी यशोधरा के संग उनका विवाह हुआ था. 13 वर्ष तक दाम्पत्य जीवन बिताने के बाद और एक पुत्र के पिता बनने के बाद 29 वर्ष की आयु में सत्य की खोज में सिद्धार्थ गौतम ने गृह त्याग कर महाभिनिष्क्रमण किया और 6 वर्षों तक तरह-तरह की कठिन तपस्या करने के बाद अनुभव किया कि शरीर को अत्यधिक कष्ट देने से या विलासिता पूर्ण जीवन से संबोधि प्राप्त नहीं हो सकती इसलिए उन्होंने विपस्सना का मार्ग चुना.

बुद्ध ने विपस्सना साधना करते-करते अणुओं-परमाणुओं का विच्छेंदन, विश्लेाषण-विभाजन करते-करते देखा कि लोग बाहरी कारणों जैसे गरीबी, भुखमरी, असमानता, ऊंच-नीच, बीमारी, बुढ़ापा, मृत्यु , प्राकृतिक आपदाओं से तो दु:खी हैं ही, मनचाहा न होने पर, अनचाहा होने पर, प्रिय लोगों से बिछुड़ने, अप्रिय लोगों से मिलाप जैसी स्थितियों से भी दु:खी होते हैं. बुद्ध ने ध्यान करते-करते खोज निकाला कि हमारे दु:ख का मूल कारण यह है कि हम घटने वाली घटनाओं और स्थितियों के सही स्वभाव से अनजान हैं. दूर से भासमान या प्रत्येक्ष दिखने वाली बस्तुस्थिति को ही हम असली और वास्तविक मान बैठते हैं और उनके प्रति राग-द्वेष-मोह के गहरे-गहरे संखार बनाते जाते हैं. उन्होंने देखा कि जब हमें कुछ अच्छा लगता है तब हमारे शरीर पर सुखद संवेदनाएं प्रकट होती हैं और जब कुछ बुरा लगता है या अच्छा नहीं लगता है तो शरीर पर दु:खद संवेदनाएं पैदा होती हैं.

बुद्ध ने विपस्सना करते-करते शरीर को सूक्म् से सूक्ष्मतर स्तर पर विभाजन-विश्लेषण करते हुए, अणुओं-परमाणुओं का निरीक्षण-परीक्षण करते हुए स्वंयं के प्रत्य क्ष अनुभव से जाना कि संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है, सब कुछ परिवर्तनशील है जो हर पल बदल रहा है इसलिए सब कुछ अनित्य है. ऊपर से ठोस दिखने वाले इस शरीर में और इसके साथ जुड़े चित्त में और इन दोनों के मिलने से चलने वाली जीवनधारा में कहीं पर कुछ भी ‘मैं’ नामक चीज नहीं है और न ही इसमें ‘मेरा’ या आत्मा का कोई अस्तित्व है, पूरे अस्तित्व में किसी का भी पृथक और स्वतंत्र अस्तित्वह नहीं है.

सब कुछ, प्रत्येक प्राणी-वस्तु, घटना बहुत सी बातों पर, चीजों पर निर्भर है और सभी कुछ किसी न किसी कारण से उत्पन्न, होता है, विकसित होता है और देखते-देखते किसी नए रूप में परिवर्तित हो जाता है, कुछ भी (बिना किसी अपवाद के), किसी एक मूल स्रोत से उत्पन्न नहीं हुआ है, एक बीज जब जमीन में बोया जाता है तो वह जल, मिट्टी हवा की मिली-जुली मदद से ही अंकुरित हो पाता है और सूर्यप्रकाश की मदद से बड़ा होता है. इस तरह पेड़ की एक पत्ती में पूरे ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व होता है जिसमें जल, वायु, पृथ्वीे, अग्नि सभी कुछ समाया हुआ है.

किसी व्यक्ति का अपना अकेले का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है. वह जीने के लिए पर्यावरण पर, पेड़-पौधों पर, जीव-जंतुओं पर और समाज पर निर्भर है. वह किसी का पुत्र, किसी का भाई, किसी का दोस्तौ और किसी का रिश्तेदार है. अगर वह शील-सदाचार का जीवन जीता है तो अपनी सुख और शान्ति से समाज के अन्य‍ प्राणियों की सुख-शांति में मदद करता है. प्रज्ञा जगाता है, दान-शील और करूणावान बनता है तो दूसरे लोगों के प्रति मंगल मैत्री जगाता है, करूणा जगाता है जिससे समाज में जो भी लोग जिस किसी कारण से दु:खी हैं, उनका दु:ख दूर करने की कोशिश करता है.

बातों से और शब्दों से, सत्य को जो नित्य है, शाश्वत है, अमृत है, बयान नहीं किया जा सकता है. इसे केवल स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभव से ही जाना जा सकता है. इससे लोगों को जीवन, घटनाओं, वस्तुओं के सही और वास्तविक स्वभाव से परिवर्तनशील है, हर पल बदलता जा रहा है, को समझने में मदद मिलती है.

इस तरह विपस्सना करते-करते 35 वर्ष की आयु में सन् 528 ई. पूर्व की वैशाख पूर्णिमा को बुद्धत्व‍ प्राप्त कर सिद्धार्थ गौतम सम्यक संबुद्ध बन गए और भगवान बुद्ध तथागत जैसे नामों से जाने गए. 45 वर्षों तक करूण चित्त से गॉंव कस्बों में पैदल जाकर मानव कल्याण के लिए लोगों को धम्म सिखाते रहे.

वैशाख पूर्णिमा के दिन भगवान बुद्ध भिक्खु संघ के साथ कुशीनगर के नजदीक मल्लों के सालवन में पहुंचे. आनंद ने दो सालवृक्षों के बीच बिस्तर बिछा दिया और भगवान उत्तर दिशा की ओर मुंह किए लेट गए. आनंद ने नगर में खबर कर दी कि रात के तीसरे पहर में तथागत महापरिनिर्वाण को प्राप्त होंगे. दर्शनार्थियों का तांता लग गया. उसी समय सुभद्र नाम का परिव्राजक आनंद के पास आया और बुद्ध से धम्म्दीक्षा की जिद करने लगा. आनंद ने उसको कहा कि तथागत थके हैं, विश्राम कर रहे हैं. बुद्ध ने उनका वार्तालाप सुन लिया और सुभद्र को अपने पास बुलाकर धम्म दीक्षा दी.

आनंद के पूछने पर कि महापरिनिर्वाण के लिए उन्होंने कुशीनगर ही क्यों चुना, भगवान बुद्ध ने बताया कि किसी समय वहां महासुदर्शन राजा की राजधानी थी और उस नगरी का नाम केशवती था.
भिक्खुओं को अंतिम बार संबोधित करते हुए भगवान बुद्ध ने कहा:
‘’वयधम्मां संखारा, अप्पमादेन सम्पादेथ’’
(भिक्खुओं सुनो, सारे संखार व्ययधर्मा हैं, मरणधर्मा हैं, नष्टधर्मा हैं. जितनी भी संस्कृत अर्थात निर्मित वस्तुएं हैं, व्यक्ति हैं, घटनाएं हैं, स्थितियां हैं, वे सब नश्वर हैं, भंगुर हैं, मरणशील हैं, परिवर्तनशील हैं. यही प्रकृति का कठोर सत्य है. प्रमाद से बचते हुए, आलस्य से दूर रहते हुए, सतत सचेत और जागरूक रहते हुए, प्रकृति के इस सत्य का संपादन करते रहो! इस सत्य से स्थित रहकर अपना कल्याण साधते रहो!)

यह अंतिम उपदेश देकर वैशाख पूर्णिमा की रात के तीसरे पहर में 483 ई.पू. को तथागत महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए. निर्वाण वह अवस्थाा है जहां न तो पृथ्वी है, न पानी, न प्रकाश है, न हवा, न तो अंतरिक्ष है, न ही आकाश, न तो शून्य है, न ही अशून्य है, न तो यह लोक है, न ही अन्ये लोक, ये सूर्य और चंद्र दोनों हैं, यह इन्द्रियातीत अवस्था है. जैसे दीपक की लौ उठकर बुझ जाने के बाद चली जाती है, वैसे ही महापरिनिर्वाण प्राप्ति कर बुद्ध चले जाते हैं.

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