नीरव मोदी ने पीएनबी में ऐसे किया अरबों का घोटाला

नई दिल्ली। पंजाब नेशनल बैंक में हुए 11,360 करोड़ रुपये के घोटाले से देश हिल गया है. इस घोटाले के पीछे जिस शख्स का नाम आ रहा है, वह जाना माना हीरा व्यपारी नीरव मोदी है. यह घोटाला यह बताने के लिए भी काफी है कि अगर भारत में आपका रसूख है तो आप बैंक के अरबों का गबन कर चुपचाप देश छोड़कर जा सकते हैं. हालांकि भारत के सबसे बड़े बैंकों में से एक पंजाब नैशनल बैंक ने इस मामले में लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं, लेकिन बैंक ने इस बात को स्वीकार किया है कि इसमें बैंक के कर्मचारी और खाताधारकों की मिली-भगत है.

2011 से चल रहा यह घोटाला 2018 में सामने आया है. और इसके सामने आने से पहले ही आरोपी नीरव मोदी जनवरी में परिवार सहित देश छोड़कर जा चुका था. पीएनबी का जो घोटाला हुआ है उसमें जो आधारभूत चीज़ है वो है एलओयू यानि कि लेटर ऑफ़ अंडरटेकिंग. जो कि बैंकों में प्रचलित है और आम तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. असल में जो देश के बाहर से सामान आयात करता है उसे देश के बाहर मौजूद निर्यातकर्ता को पैसे चुकाने होते हैं. इसके लिए अगर आयात करने वाले के पास पैसे नहीं हैं तो बैंक आयातकर्ता के लिए विदेश में मौजूद किसी बैंक को लेटर ऑफ़ अंडरटेकिंग दे देता है. व्यवसायी के लिए बैंक वायदा करता है कि वो निश्चित तारीख को ब्याज के साथ उस बैंक के दिए गए पैसे चुका देगा. बैंकों में आम तौर पर ऐसा होता है.

अब अगर पीएनबी ने विदेश के बैंक को एलओयू दिया है तो वो विदेशी बैंक पीएनबी की गारंटी के ऊपर उस निर्यातकर्ता को जितने पैसे की पेमेंट के बारे में कहा गया है वो कर देता है. एक साल या निश्चित तारीख पर आयातकर्ता पीएनबी को पेमेंट देगा और फिर पीएनबी आगे विदेशी बैंक को ब्याज समेत उनका पैसा लौटा देगा.

नीरव मोदी के मामले में क्या हुआ?

नीरव मोदी के मामले में बैंक ने एलओयू जारी नहीं किए, बल्कि बैंक के दो कर्मचारियों ने फर्जी एलओयू बनाकर दे दिया. इसके लिए इन कर्मचारियों ने स्विफ्ट सिस्टम कंट्रोल का इस्तेमाल किया, जो कि एक अंतरराष्ट्रीय कम्यूनिकेशन सिस्टम है और दुनिया भर के सभी बैंकों को आपस में जोड़ता है. इस सिस्टम के जरिए संदेश को कोड में भेजा जाता है. एलओयू भेजना, खोलना, उसमें बदलाव करने का काम इसी सिस्टम के ज़रिए किया जाता है. यही वजह है कि जब इस सिस्टम के ज़रिए ये संदेश किसी बैंक को मिलता है तो उन बैंक को पता होता है कि ये आधिकारिक और सही संदेश है. और कोई इस पर शक़ नहीं करता.

बैंक की कमी

सबसे पहले तो जिन दो लोगों ने ये किया, उन्हें लंबे समय तक एलओयू डेस्क पर काम नहीं करना चाहिए था. बैंक अक्सर इस डेस्क पर लोगों की अदला-बदली करता रहता है. पीएनबी की ओर से जो एक और कमी हुई वह यह थी कि भेजा गया संदेश स्विफ्ट सिस्टम कोर बैंकिंग से जुड़ा नहीं लगता. क्योंकि कोर बैंकिंग में पहले एलओयू बनाया जाता है और फिर वो स्विफ्ट के मैसेज से चला जाता है. और इस कारण कोर बैंकिंग में दिन, तारीख और राशि को लेकर एक एंट्री बन जाती है. लेकिन इस मामले में स्विफ्ट कोर बैंकिंग से जुड़ा हुआ नहीं था. इन दोनों ने फर्जी मैसेज को स्विफ्ट से भेजा, मैसेज को ग़ायब भी कर दिया और इसकी कोर बैंकिंग में एंट्री नहीं की जिससे कुछ भी पता नहीं चला.

बैंक का सिस्टम बाईपास कैसे हो गया?

अब सवाल उठता है कि बैंक का पूरा सिस्टम बाईपास कैसे हो गया? इसके लिए आपको यह समझना होगा कि अगर कोई चोर कोई निशान या सबूत ना छोड़े तो उसे पकड़ना बहुत मुश्किल होता है. ख़ास कर तब जब कोई संदेह भी नहीं कर रहा है.

असल में आरोपी एक बैंक से पैसे लेते रहे और दूसरे को चुकाते रहें. जैसे कि एक वक्त में पचास मिलियन का एलओयू खोला गया, जब तक अगले साल इसे चुकाने की बारी आई तब तक आरोपियों ने सौ मिलियन का एलओयू और करा लिया. इस तरह उन्होंने पहले लिए गए पचास मिलियन चुका दिए और अगला कर्ज़ किसी और बैंक से खड़ा हो गया. इस प्रकार से ये लेनदेन महीनों तक चलता रहा. इस तरह कर्ज़ की रकम साल दर साल बढ़ती रही.

नियम के मुताबिक इसमें होता यह है कि विदेशी बैंक, भारतीय बैंक के वायदे के मुताबिक पैसे देगा और फिर पैसों के वापिस पाने के लिए दी गई तारीख़ का इंतज़ार करेगा. वो पैसा आ गया तो कोई बात नहीं लेकिन अगर नहीं आया तो उसी सूरत में वो भारतीय बैंक से संपर्क करेगा.

इस मामले में जैसा समझ में आ रहा है कि कुछ साल तक शायद पैसा चुकाने के लिए जो तारीख निर्धारित की जाती होगी, उस दिन या उसके एक दो दिन पहले ही पेमेंट कर दिया जाता होगा. इसीलिए यह घोटाला सामने नहीं आया, और जब ऐसा नहीं हुआ तो यह मामला सामने आ गया. तब तक मामला इतना बड़ा हो गया था कि देश में हड़कंप मच गया.

अब क्या होगा?

जिन कंपनियों ने ये घोटाला किया है उसकी जितनी संपत्ति जब्त होगी, वही पीएनबी को मिलने की उम्मीद है. बताया जा रहा है कि नीरव मोदी ने चिट्ठी दी है और कहा है कि वो पांच-छह हज़ार करोड़ की पेमेंट कर देंगे. लेकिन अगर मोदी के इरादों में इतनी ईमानदारी होती तो वो पहले ही ऐसा कर सकते थे और यह घोटाला होता ही नहीं. जहां तक आगे की बात है तो नीरव मोदी बड़े व्यवसायी और ग्लोबल सिटिज़न हैं. उनकी संपत्ति पूरे विश्वभर में फैली हुई है. उन्हें ढ़ूढ़ना, ज़ब्त करना और फिर उससे पैसों की उगाही करना बेहद मुश्किल है. फिलहाल प्रवर्तन निदेशालय ने नीरव मोदी के ठिकानों पर छापा मारकर 5 हजार 100 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की है. इसलिए जो वसूल हो पाएगा उसके बाद जो रकम नहीं मिल पाएगी, वो एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग एस्सैट हो जाएगा. सीधे तौर पर कहें तो यह बैंक का नुक़सान होगा लेकिन अगर दूसरे तरीके से देखें तो बैंकों के पास मौजूद पैसा ग्राहक का होता है. यानि नीरव मोदी देश के आम आदमी को हजारों करोड़ की चपत लगाकर फरार हो चुके हैं.

कंटेंट साभार बीबीसी

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