सम्राट अशोक जयंती विशेषः अशोक महान एवं बाबासाहेब अम्बेडकर

ashokसम्राट अशोक का जन्म वर्ष 304 ई.पू. हुआ था. यदि आज सम्राटों के सम्राट, चक्रवर्ती सम्राट अशोक जीवित होते तो वे यह घोषणा अवश्य ही करते कि मेरे सातवीं पीढ़ी के पौत्र वृहदर्थ मौर्य (अंतिम मौर्य सम्राट) की षडयंत्रापूर्ण हत्या ई.पू. 85 में की गई थी. उसके पश्चात मानवीय मूल्यों के विरोध में प्रतिक्रांति का ऐसा विनाश लीला का चक्र घूमा कि इस देश से अस्तित्व के सभी प्रमाणों के साथ हमारा नाम तक भी मिटाने की कोशिश की गई. यहां की जनता, जिसे बलात निरक्षर और अज्ञानी बना दिया गया था, के दिलो-दिमाग से मेरा नाम भुलवा दिया गया था.‘मुझे विस्मृति के गर्भ से बाहर निकालते हुए मेरे प्रतीक चिन्हों को भारतीय संविधान में विधि-सम्मत तरीके से सम्मिलित करवाने का काम यदि किसी ने संभव कर दिखाया तो वे हैं- बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर.

यदि आज सम्राट अशोक जीवित होते तो वे निश्चय ही कह उठते कि जिन्होंने मेरे द्वारा सारनाथ में मेरे स्तंभ पर स्थापित चार शेरों वाली प्रतिमा को राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में स्वीकार कराया और इन शेरों के चरणों में बने 24 तिली वाले ‘धम्मचक्र’ को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में स्थापित करवा कर बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने मेरा खूब मान बढ़ाया. भारत की राजमुद्रा; एवं कोट-पेपर्स में चार शेरों वाली प्रतिमा स्थापित करा कर भारत में मेरी स्मृति को बहाल कराने में डॉ. अम्बेडकर ने अपनी जिस प्रतिभा और क्षमता का परिचय दिया, उसकी वजह से मैं डॉ. अम्बेडकर से अत्यंत प्रसन्न हूं.

यह बात बहुत महत्वपूर्ण है तथा इस देश के मूलनिवासियों के लिए महान गौरव का विषय है कि उनके ये दोनों ही पुरखे-महापुरुष ‘काल्पनिक’ नहीं-अपितु ऐतिहासिक हैं. इन दोनों महापुरुषों में एक महान विसंगति भी है. वह यह कि सम्राट अशोक का जन्म तो तत्कालीन भारत के सबसे शक्तिशाली एवं महान राजा ‘बिन्दुसार’ के महल में एक राजकुमार के रूप में हुआ था. जहां सुख-सुविधा के सभी साधन सहज ही उपलब्ध थे, मगर डॉ. अम्बेडकर का जन्म सम्राट अशोक से 2195 वर्ष पश्चात एक ऐसे परिवार में हुआ, जो सामाजिक दृष्टि से सबसे दीन-हीन समझा जाता था. शोषित-अछूत कुलोत्पन्न, दरिद्रता में पले, अस्पृश्यता के अभिशाप के भुक्त-भोगी थे डॉ. अम्बेडकर.

उन्होंने अपने बुद्धि बल के आधार पर भारतीय समाज और राजनीतिक क्षेत्र में स्वयं को इतना मजबूत बना लिया था, जिससे वे भारतीय जनमानस के सबसे पसंदीदा नायक बन गए. यह तथ्य भदंत आनंद कौसल्यायन के कथन से भलीभांति प्रमाणित होता है, जब वे कहते हैं-‘लोग गांधी को भुला देना चाहते हैं, पर सरकार उन्हें भूलने नहीं देती और सरकार बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को भुला देना चाहती है, पर लोग उन्हें नहीं भूलने देते.’

सम्राट अशोक और डॉ. अम्बेडकर के समय के सामाजिक एवं धार्मिक परिवेश में भी काफी विसंगति नजर आती है. सम्राट अशोक के समय में भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के अनुरूप अपने जीवन का निर्धारण करने वालों अर्थात बौद्धों का प्राबल्य था. बौद्धों के अतिरिक्त जैन धर्मावलंबी भी अस्तित्वमान थे. इनके अतिरिक्त 62 ऐसे संप्रदाय भी थे, जिनमें आजीवक (अचेलक) लोग भी थे, जो नंगे रहते थे और इनकी मान्यताएं बहुत विचित्र थीं. इन सभी को मिथ्या-दृष्टि का वाहक माना गया था. इन 62 संप्रदायों का विशद वर्णन ‘कथा-वत्थु’ नामक तिपिटक ग्रंथ में सविस्तार मिलता है. सम्राट अशोक के समय में हिन्दू धर्म, ईसाई रिलीजन, मुसलमान मजहब और सिख पंथ आदि का अस्तित्व ही नहीं था. हिन्दू धर्म तो बहुत बाद में बौद्ध धर्म से ही निकला था.

जबकि डॉ. अम्बेडकर के समय में भारत में बहुत सारे धर्म अस्तित्व में थे. हिन्दू, ईसाईयत, इस्लाम, यहूदी, पारसी, सिख आदि धर्मों की भीड़-भाड़ के बीच डॉ. अम्बेडकर का प्रादुर्भाव हुआ था. दोनों महापुरुषों के समय में सामाजिक धार्मिक परिवेश में भी भारी अंतर होने के बावजूद ये दोनों महापुरुष प्रबल मानवतावादी थे. उदार थे, जात्याधारित व्यवहार अथवा चातुर्वणीय व्यवस्था उन्हें मान्य नहीं थी. ये दोनों ही अपने-अपने समय में सभी जाति-धर्म-संप्रदाय के लोगों को समान अधिकार एवं न्याय देने के पक्षधर थे. सम्राट अशोक के कल्याणकारी एवं मंगलकारी कार्यों का ब्यौरा ऐतिहासिक सनद के रूप में उनके शिलालेखों एवं स्तंभ लेखों के रूप में सुरक्षित है.

मगर दूसरी ओर बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा का परिचय प्राप्त करने की किसी बंधु को जिज्ञासा हो तो वह भारत के संविधान का संज्ञान ले सकता है. विद्यमान, समता, स्वतंत्रता एवं बंधुता के सिद्धांत बाबासाहेब ने बुद्ध और अशोक की शिक्षाओं से ही ग्रहण करके भारतीय संविधान में निरूपित किए थे.

अशोक और अम्बेडकर दोनों ही ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ के समर्थक थे. दोनों महापुरुष अंधश्रद्धा के स्थान पर वैज्ञानिक एवं तर्कशील बुद्धिवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे. इतना होने पर भी हम पाते हैं कि बाबासाहेब ने 25 मई, 1950 को कोलंबो में आयोजित विश्व बौद्ध धम्म सम्मेलन के समक्ष ‘भारत में बौद्ध धम्म का उत्थान और पतन’ विषय पर अपने भाषण के माध्यम से सम्राट अशोक से यह विनम्र शिकायत भी की थी कि सम्राट अशोक हद से ज्यादा उदार सम्राट थे. षडयंत्रकारियों ने उनकी इस विशेषता का अनुचित लाभ उठाते हुए बौद्ध धम्म के प्रति लामबंद होने का षडयंत्र रच डाला था.

यही कारण था कि उन्होंने 14 अक्टूबर को नागपुर की पवित्र भूमि पर बौद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण करके जब अपने 10 लाख अनुयायियों को बौद्ध धम्म की स्वयं ही दीक्षा प्रदान की तो उन्होंने उन्हें 22 प्रतिज्ञाएं भी ग्रहण कराई थीं. एक प्रकार से बाबासाहेब ने सम्राट अशोक के महान कार्यों से प्रेरणा लेकर ही वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बौद्ध धम्म के सुरक्षा कवच के रूप में 22 प्रतिज्ञा का प्रावधान किया था. धार्मिक आतंकवाद और सांप्रदायिक उन्माद के कारण लगता है कि आज दुनिया ने वैज्ञानिक आविष्कारों का दुरुपयोग करके अपने विनाश का साधन बना लिया. आज यदि संसार का भविष्य सुरक्षित रखना है तो दुनिया के कर्णधारों को महान अशोक और बाबासाहेब की विचारधारा का वरण करना होगा.

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