उपचुनावों में मिली जीत बीएसपी और सपा के लिए एक सबक

2014 के लोकसभा और उत्तर प्रदेश में 2017 में हुए विधान सभाई चुनावों में बी. एस. पी. को मिली हार को देखते हुए यह लगने लगा था कि बी. एस. पी. का वोट बैंक खिसक रहा है. उस दौरान पड़े वोटों का प्रतिशत जिस गति से बढ़ा, उससे लग तो रहा था कि बी.एस.पी. निश्चित रूप से नीचे खिसकेगी, किंतु इतना बुरा हाल होगा यह कतई नहीं सोचा था. यह भी नहीं लग रहा था कि बढ़ा हुआ वोट किसी एक करवट बैठ जाएगा, जैसा कि हुआ. सभी दलों की सभाओं में अप्रत्याशित भीड़ जुटी. क्षेत्रीय दलों की सभाओं में भी अच्छी- भीड़ देखी गई.  किन्तु वो मतों में परिवर्तित नहीं हो सकी. सोचा था कि बढ़ा हुआ वोट बिखरेगा, किंतु ऐसा हुखासीआ नहीं. आखिर क्यों? यह एक सोचनीय विषय है. किंतु उत्तर प्रदेश में हुए निकाय चुनावों में बसपा को मिली कामयाबी और फूलपुर और गोरखपुर में हुए हालिया दो उपचुनावों में बसपा के समर्थन से सपा को मिली जीत ने सिद्ध कर दिया कि बसपा का वोटर आज भी कायम है.

वर्ष 2007 के विधान सभा चुनावों में बी.एस.पी. को 85 आरक्षित सीटों में से 61 आरक्षित सीटों पर जीत मिली थी. जबकि इस बार बी.एस.पी. की सबसे बड़ी हार केवल दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर ही हुई थी. इसका कारण यह रहा कि अन्य दलों ने बी.एस.पी. के दलित उम्मीदवारों के खिलाफ कई-कई निर्दलीय दलित उम्मीदवार मैदान में उतार दिए. परिणाम यह हुआ कि दलित वोटों का तो बिखराव हो गया और गैर-दलित मत बी.एस.पी. के खाते में आए ही नहीं. फलत: आरक्षित सीटों पर बी.एस.पी. के उम्मीदवार ही ज्यादा हारे. यह एक सोची-समझी साजिश थी. प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि आरक्षित सीटों पर समाज विरोधी दलितों ने अन्य दलों के जाल में फंसकर बी.एस.पी. के खिलाफ काम किया. यहाँ यह सवाल भी उठ सकता है कि फिर सामान्य सीटों पर बी.एस.पी. के उम्मीदवार कैसे जीत जाते हैं. प्रश्न बेशक जायज है. इसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि सामान्य सीटों पर चुनाव लड़ रहे बी.एस.पी. के उम्मीदवारों के हक में दलित मतों का लगभग 80-85 प्रतिशत मत तो मिल ही जाते हैं, साथ ही गैर-दलितों के मत भी बी.एस.पी. के खाते में चले जाते हैं. किंतु 2017 के चुनावों में ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया.

 बी.एस.पी. के आला कमान को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बी.एस.पी. का जमीनी कार्यकर्त्ता हवाई यानी गली-कूचे की नेतागीरी करने में ज्यादा रुचि लेने लगा है. काम करने में कम. यहां तक कि वोटरों के घरों तक वोटर-पर्चीयां तक नहीं पहुँचा पाते. नतीजा ये होता है कि बी.एस.पी. के वोटरों का लगभग 10-12 प्रतिशत वोट ही नहीं डाल पाता. यहां तक कि ज्यादातर वोटरों को अपने पोलिंग बूथ का ही पता नहीं होता. इलाकाई कार्यकर्त्ताओं से पूछने पर भी कोई सकारात्मक उत्तर नहीं मिलता. बूथ पर व्यवस्था के नाम पर कुछ भी दिखाई नहीं देता.

  दिक्कत एक और भी है कि दलितों में शामिल कुछेक जातियां अपने आपको दलित मानने को ही तैयार नहीं हैं.  संविधान के आर्टिकल 16.4 के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग भी दलितों में आता है. किंतु अफसोस कि वो अपने आप को ब्राह्मण ही मानने पर उतारू है जिसके चलते समूचे दलित समाज का अनहित हो रहा है.

इस संबंध में जे.एन.यू के प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार कहते हैं, “इस प्रकार हिन्दुत्व बहुजनवाद पर भारी पड़ गया. 1978 के पश्चात जातीय अस्मिताओं का प्रयोग कर जिस उत्तर प्रदेश में बामसेफ, डीएस-4 तथा बहुजन समाज पार्टी के सहारे “बहुजन” का एक बड़ा समीकरण बना था, उस समीकरण को बीजेपी ने अपने तौर पर चुनौती दी. इस जातीय अस्मिता के नवीन समीकरण का सूत्रपात करने वाले स्वयं नरेन्द्र मोदी थे. मोदी ने उप्र की जनसभाओं में अपनी अस्मिता को खूब उछाला. उन्होंने अपने आपको पिछड़े वर्ग का बताया. उन्होंने एक रैली में यहाँ तक कहा – “आने वाला दशक पिछड़ों एवं दलितों का होगा.”  मैं समझता हूँ कि मोदी यहाँ दलितों और पिछड़ों के नाम एक अप्रत्यक्ष सवाल भी छोड़ जाते हैं. और वह सवाल है कि अब दलितों और पिछड़ों को सोचना होगा कि वो परम्परागत जातिगत और धार्मिक व्यवस्था अर्थात साम्प्रदायिकता का हिस्सा बनकर जीना चाहते हैं अथवा दलितों और पिछड़ों के तमाम के तमाम राजनीतिक घटक तमाम मतभेदों को भुलाकर एक होकर समाज के दमित और वंचित वर्ग को आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करते हैं.

 जाहिर है कि मोदी तो यही चाहेंगे कि दलित और पिछड़े लोग बीजेपी के साथ ही बने रहें. आखिर मोदी के भी तो अपने निजी निहित हैं. अब यह दलितों और पिछड़ों को सोचना है कि उनका भला कहाँ है. यह भी जाहिर है कि यदि दलित और पिछड़े वर्ग से आने वाले तमाम नेता यदि अपने-अपने निजी स्वार्थो और जातीय अहम को छोड़कर पिछले चुनावों में प्राप्त मतों के प्रतिशत के आधार पर एक होकर चुनाव लड़ते हैं तो 2019 के आम चुनावों के नतीजे कुछ अलग ही होंगे. यदि ऐसा हो पाता है तो उम्मीद की जा सकती है कि भारत में मानवाधिकारों की किसी हद तक रक्षा हो सकती है, अन्यथा नहीं.

दिक्कत एक और भी है कि दलितों में शामिल कुछेक जातियां अपने आपको दलित मानने को ही तैयार नहीं हैं. संविधान के आर्टिकल 16.4 के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग भी दलितों में आता है, किन्तु अफसोस कि वो अपने आप को ब्राह्मण ही मानने पर उतारू है जिसके चलते समूचे दलित समाज का अनहित हो रहा है.  मेरा मानना है कि यदि बी.एस.पी. और सपा आपस में एक हो जाएं तो इनके हाथों में न केवल राज्यों की सता होगी अपितु केंद्रीय-सत्ता भी इनके हाथों में ही होगी. अक्सर देखा गया है कि किसी भी उपचुनाव में प्राय: सत्ताधारी दल की ही जीत होती है, मगर उत्तर प्रदेश में इस बार ऐसा न हो सका. अत: हाल ही में उत्तर प्रदेश में फूलपुर और गोरखपुर में हुए उपचुनावो में बी. एस. पी. के समर्थन से सपा के प्रत्याशियों की भारी जीत तो इस ओर ही संकेत कर रही है. पर इन्हें समझाए कौन? जरूरत है तो केवल निजित्व की भावना से उबरकर सामाजिक हितों की साधना हेतु काम करने की. अब 2019 के लोकसभा चुनाव होने हैं, देखते हैं क्या होगा?

 लेखक:  तेजपाल सिंह तेज चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं. स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं. हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं.

 

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