देखी हैं आपने बुद्ध की सोने-चांदी की किताबें?

ये ख़ज़ाना हीरे जवाहरात का नहीं बल्कि किताबों का ख़ज़ाना है. ये वो किताबें हैं जो राहुल सांकृत्यायन ख़च्चर पर लादकर तिब्बत से बिहार लाए थे. 10 हज़ार से ज़्यादा इन ग्रंथो का डिजिटाइजेशन हो चुका है और जल्द ही इसे वेबसाइट के ज़रिए इसके ग्लोबल हो जाने की उम्मीद है.1929 से 1938 के बीच राहुल सांकृत्यायन चार बार तिब्बत गए थे. इन यात्राओं के दौरान वो बुद्ध के मूल वचन, तंत्र साधना, जीवन के रहस्य आदि से जुड़े कई अमूल्य ग्रंथों से परिचत हुए. इनमें कई ग्रंथों को वह बेहद कठिन परिस्थितियों में भारत लेकर आए. बिहार रिसर्च सोसाइटी में मौजूद इनमें से कई किताबों को स्ट्रांग रूम में रखा गया है.

दरअसल इनमें से कई किताबें सोने और चांदी के चूर्ण से लिखी हुई है. स्वर्णप्रभा सूत्र और शतसाहस्रिका प्रज्ञा पारमिता ऐसे ही ग्रंथ है. स्वर्णप्रभा सूत्र पूरा सोने और चांदी से लिखा हुआ है. वही शतसाहस्रिका प्रज्ञा पारमिता का पहला पन्ना सोने की स्याही से लिखा हुआ है. इस ग्रंथ में बुद्ध के मूल वचन हैं. ग्रंथ में पहले पन्ने पर ही बुद्ध का चित्र है. ये भी सोने के पानी से बनाया गया है. 700 साल पुराना ये ग्रंथ तिब्बती में लिखा है.

राहुल सांकृत्यायन अपने साथ कई किताबें जेलोग्राफ़ करवा के भी लाए. जेलोग्राफ़ यानी वो विधि जिसमें तिब्बत स्थित मंदिर मठों की दीवारों में लिखे हुए ग्रन्थों को हाथ से बने काग़ज़ पर छापा गया. तंत्र साधना से जुड़े कई ग्रंथों और चित्रों को राहुल जी जेलोग्राफ के ज़रिए बिहार लाए. बौद्ध साहित्य में 84 सिद्धाचार्यों का उल्लेख है. ये सिद्धाचार्य बौद्ध धर्म का प्रचार करने तिब्बत गए थे. इन 84 सिद्धाचार्यों की तस्वीर भी जेलोग्राफ़ करके बिहार लाई गई. इस तस्वीर में सबसे ऊपर बुध्द साधना करते दिखते है. एक अन्य चित्र तन्त्र साधना का है और चित्र के नीचे कुछ लिखा भी हुआ है. लेकिन क्या लिखा है, इसके बारे में जानकारी नहीं मिलती.

दरअसल इस ख़ज़ाने के बारे में कम जानकारी होने की वजह ये है कि ज़्यादातर ग्रन्थ तिब्बती भाषा में है. पटना संग्रहालय के निदेशक जे पी एन सिंह कहते है, “हमारे लिए अब तक ये अनजान दुनिया है. एक बार इनका तिब्बती से इसका हिन्दी या किसी अन्य भाषा में अनुवाद हो जाए, तब ही ज़्यादा जानकारी हमें मिल सकेगी.” सारनाथ केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्दालय के साथ हिन्दी अनुवाद के लिए बातचीत हो चुकी है. वहीं वेबसाइट पर इन किताबों के आने के बाद दुनिया भर के तिब्बती भाषा के जानकार इसका अनुवाद कर सकेंगें.

1915 में बनी बिहार रिसर्च सोसाइटी में राहुल सांकृत्यायन ख़ुद भी अध्ययन करते थे. उनके नाम पर बने राहुल कक्ष में ही उनकी लाई किताबों का संग्रह किया गया है. इसमें तंज़ूर भी है. तंज़ूर यानी वो ग्रंथ जिसमें भारतीय विद्धानों ने बुध्द के मूल वचनों की व्याख्या तिब्बती भाषा में की है. रिसर्च सोसाइटी में 3500 तंज़ूर ग्रंथ है. इसके अलावा तिब्बती विधान बुस्तोन का काम भी यहां मौजूद है. बुस्तोन ने 107 ग्रन्थों की सूची बनाई थी. साथ ही राहुल सांकृत्यायन संस्कृत ग्रंथों की तस्वीरे जो खींचकर लाए जिसको 1998 में नारीत्सन इंस्टीट्यूट फ़ॉर बुद्धिस्ट स्टडीज जापान ने प्रकाशित किया था.

दिलचस्प है कि 1938 तक राहुल सांकृत्यायन ये ख़ज़ाना ले आए थे लेकिन आज तक इनके बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है. हाल ही में सारनाथ केन्द्रीय तिब्बती संस्थान से 5 विशेषज्ञ रिसर्च सोसाइटी आए तो उन्होंने पहली बार कुछ किताबों का कैटलॉग तैयार किया. सोसाइटी में अभी भी 600 ऐसे बंडल हैं जिनके बारे में ये मालूम करना बाक़ी है कि आख़िर वो किस विधा से जुड़ी किताबें हैं.

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