बाबासाहेब अम्बेडकर: एक सच्चे राष्ट्रवादी

0
13642

यह समाज के लिए ही नहीं बल्कि राष्ट्र के लिए भी गर्व की बात है कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक प्रबुद्ध विचारक, न्याय के पक्षधर और स्पष्टवादी व्यक्ति थे. प्रत्येक व्यक्ति का कोई न कोई प्रेरणा-सूत्र होता है. बाबासाहेब ने कबीर, फुले और महात्मा बुद्ध को अपना आदर्श माना था. बाबासाहेब को शोषण-उत्पीड़न व अन्याय के विरोध, समता, बन्धुता और भाई-चारे जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना की प्रेरणा कबीर, फुले और महात्मा बुद्ध के जीवन दर्शन से प्राप्त की थी.

बाबासाहेब वर्ण और जाति को भारतीय समाज का कोढ़ मानते थे क्योंकि गुलामी, पिछड़ेपन और गरीबी की खास वजह यही वर्ण और जाति-प्रथा ही है. दलित-शोषित लोगों की उन्नति के मार्ग में छूत-अछूत का भूत ही सबसे बड़ा रोड़ा रहा है. सो यह अति आवश्यक है कि समाज में व्याप्त जाति-पांति के भूत को भगाया जाए. इस बारे में बाबासाहेब स्पष्ट रूप से कहते हैं कि आप जिस भी रास्ते से बचकर निकलना चाहें तो जातियता का दानव आपका मार्ग रोक लेगा और उसका वध किए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते. जातिय समस्या का उन्मूलन किए बिना न तो राजनीतिक सुधार ही लाए जा सकते हैं और न ही आर्थिक क्रांति ही.

आपको जानकर हैरत होगी कि गांधीजी के विचार बाबासाहेब की इस सोच के बिल्कुल विपरीत थे. गांधीजी वर्ण व्यवस्था को बरकरार रखते हुए छुआछात के निवारण के पक्ष में थे, जो किसी भी तरह संभव ही नहीं है. इसलिए बाबासाहेब और गांधी के बीच गहरे वैचारिक मतभेद हो गए थे. इसके चलते पूना पैक्ट के दौरान बाबासाहेब ने यहां तक कह डाला कि यदि अछूतों के लिए अलग चुनाव की मांग करने से मुझे देशद्रोही कहा गया तो उस समाजिक व्यवस्था को ही देशद्रोही क्यों न माना जाए जिसने अछूतों को सदियों से स्वराज्य का कभी अनुभव ही नहीं होने दिया.

बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपने सामाजिक चिंतन के आधार पर हिन्दू-धर्म को जातिगत उत्पीड़न की जड़ पाया. अछूतोद्धार आंदोलन की निराशाजनक प्रगति के चलते बाबासाहेब ने जातिगत उन्मूलन के लिए धर्म बदलने को एक मजबूत विकल्प के रूप में स्वीकार किया और सन 1935 में येवला कांफ्रेंस में बाबासाहेब ने घोषणा कर दी कि मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ, यह मेरे वश की बात नहीं थी किंतु मैं हिन्दू  रहकर मरूंगा नहीं, यह मेरे वश की बात है. धर्म बदलने के निष्कर्ष पर बाबासाहेब अचानक नहीं बल्कि एक लम्बे विचार-मंथन, हालातों के गंभीर चिंतन और लम्बे अनुभव के आधार पर पहुंचे थे. बाबासाहेब मानते थे कि धर्म व्यक्ति के लिए है, व्यक्ति धर्म के लिए नहीं. वे मानते थे कि धर्म का आधार बुद्धि होना चाहिए और धर्म समता, स्वतंत्रता और बन्धुता का भाव मानव व मानवता के कल्याण का साधन होना चाहिए किंतु हिन्दू-धर्म इस कसौटी पर खरा उतरने में पूरी तरह असफल रहा है. इसलिए उन्होंने 14 अक्तूबर 1956 को अपने दस लाख से भी ज्यादा अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म को अपनाकर जाति व वर्ण की बेड़ियों को तोड़ने का क्रांतिकारी कदम उठाया. बाबासाहेब ने कहा था कि मैं बौद्ध धम्म को इसलिए पसंद करता हूं क्योंकि बौद्ध धम्म में प्रज्ञा अर्थात अन्धविश्वास तथा दुष्ट प्रवृति के स्थान पर बुद्धि का प्रयोग, दूसरे करुणा अर्थात प्रेम और तीसरे समता अर्थात समानता और स्वतंत्रता का भाव समाहित है. मनुष्य इन्ही तीन सिद्धांतों/बातों को ही एक शुभ आनंदित जीवन के लिए चाहता है. बाबासाहेब का मानना था कि बौद्ध धम्म भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है और इससे न तो समाज को और न ही देश को किसी प्रकार का नुकसान होगा. वर्ण और जाति से व्यक्ति की मुक्ति होगी.

बाबासाहेब लोकतंत्र के प्रबल समर्थक थे और मानते थे कि लोकतंत्र ऐसी शासन व्यवस्था और प्रणाली है जिससे समाज में सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किया जा सकता है. लेकिन उनका यह भी मानना था कि यदि लोकतंत्र की बागडोर पूंजीपतियों के हाथों में जाती है तो गरीब और निरीह लोगों को गुलामी में जीना-मरना पड़ेगा. इसलिए बाबासाहेब एक ऐसी सरकार की जरूरत समझते थे जो एक समुदाय को दूसरे समुदाय के शोषण से बचाए और देश में आंतरिक दंगों, हिंसा तथा अव्यवस्था पर काबू रख सके. बाबासाहेब की इस मान्यता के चलते कुछ लोग बाबासाहेब को लोकतंत्र विरोधी होने का राग अलापते रहते हैं. ऐसे लोगों को ज्ञात होना चाहिए कि जब अंग्रेजों ने जाते समय बाबासाहेब के सामने भारत का “अछूतिस्तान” के नाम पर एक और विभाजन करने का प्रस्ताव रखा तो अम्बेडकर इसका जोरदार विरोध करके भारत के एक और विभाजन को रोक देते हैं.

कहना जरूरी है कि जहां बाबासाहेब एक तरफ सत्ता प्राप्ति को सब तालों की चाबी की संज्ञा दे रहे थे, वहीं निरंकुश सत्ता पर अंकुश लगाने के पक्षधर थे. उनका कहना था, “अपनी शक्ति को केवल राजनीतिक और सामाजिक सवालों को हल करने में मत लगाइए. आर्थिक सवालों की ओर भी ध्यान देना चाहिए, इसके बिना कोई दूरगामी परिणाम नहीं निकलने वाले.” इस प्रकार बाबासाहेब ने सामाजिक और राजनीतिक  मुद्दों पर ही गंभीरता से विचार करते हुए दलित समाज से साथ मजदूरो से जुड़े  आर्थिक मुद्दो की अनदेखी नहीं की. आज की तारीख में कहा जा सकता है कि बाबा साहेब और मार्क्स की नीतियों में कोई खास अंतर नजर नहीं आता. किंतु यह सत्य है कि बाबा साहेव पूंजीपतियों के साथ-साथ ब्राह्मणवादियों को भी आर्थिक समानता का विरोधी मानते हैं.

प्रसंगवश …गांधी जी का चिंतन दलित-हित के उनके तमाम कदम एक दिखावा ही सिद्ध हुए. दरअसल, गांधी जी महज एक विचार थे, व्यवहार नहीं. गांधी जी का दलित-हित में देखा गया प्रत्येक सपना कभी पूरा न होने वाला सपना ही था. यद्यपि गांधी, अम्बेडकर और लोहिया अपने समय में तीनों ही वर्तमान भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों के लिए प्रासंगिक कहे जा सकते हैं. तीनों ही भारतीय सामाजिक इतिहास के बारे में सोचते थे और समाज को बदलना चाहते थे. लेकिन गांधी जी की दाल में काला था.

उल्लेखनीय है कि गांधी जी दलित वर्ग के पक्ष केवल और केवल इसलिए बयानबाजी करते रहे ताकि दलित वर्ग कांग्रेस का वोटर बना रहे. यह सत्य इसी बात से जाना जा सकता है कि जब अम्बेडकर ने दलित जातियों के पृथक निर्वाचन की मांग की थी, तब गांधीजी ने यह कहकर अम्बेडकर के प्रस्ताव को खारिज करा दिया था कि दलित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग मेरे लिए अधिक निष्ठुर प्रहार सिद्ध होगा.

यहां यह जान लेना अति आवश्यक है कि किसी भी देश का संविधान किसी भी प्रजातंत्र देश का सबसे उपयुक्त दस्तावेज होता है. बाबासाहेब स्वयं संविधान के निर्माता रहे हैं. संविधान में तमाम मानव हितों के प्रावधानों के चलते यदि  लोकतंत्र खतरे में पड़ता है तो बाबासाहेब इसे संविधान की नहीं, अपितु इसके लागू करने वालों की असफलता मानते हैं, न कि संविधान की. इसीलिए वे चाहते थे कि संविधान का कार्यांवयन सभी प्रकार के पूर्वाग्रहों और स्वार्थों से ऊपर उठकर किया जाना चाहिए.

बाबासाहेब मानते थे कि नारी के पतन का असली कारण हिन्दू-धर्म है. मनु जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था के कर्णधार रहे हैं, उसने ही ऐसे नियमों का प्रतिपादन किया, जिससे नारी की स्वतंत्रता तथा उसके सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की अनदेखी हुई है. नारी को पुरुष की दासी बनाकर रख दिया गया. बाबा साहेब का मानना था कि भारतीय समाज में नारी की भी वही अवस्था है तो गरीब निरीह दलितो की. इसलिए उन्होनें कहा कि मैं समाज में नारी की प्रगति की हालत पर दलित समाज की प्रगति के जैसा ही पैमाना रखता हूं. इतना ही उन्होंने महिला संगठनों की आवश्यकता भी जाहिर की. इसके लिए उन्होंने महिलाओं की शिक्षा व उनमें भविष्य के प्रति जागरुकता जगाने के साथ-साथ बाल-विवाह का जमकर विरोध किया. बाबासाहेब का हिन्दू-कोड बिल को लेकर मंत्रीमंडल से त्यागपत्र भी नारियों के विषय में नारियों की प्रगति के प्रति उनका संकल्प ही झलकता है. और आज जो संसद् में महिला आरक्षण की आग धधक रही है, वो बाबासाहेब की आवाज की ही गूंज है.

बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर शिक्षा व ज्ञान को खास मानते हुए जब ये कहते हैं कि आदमी महज रोटी पर ही जीवित नहीं रह सकता. उसे विचारों की खुराक भी चाहिए क्योंकि उसके पास दिमाग भी है. बाबासाहेब दलित नौजवानों को अपने स्वाभिमान और अस्मिता की रक्षा के लिए बार-बार याद दिलाते थे कि जब कभी अवसर मिले तो यह सिद्ध करने का प्रयास करें कि वे बुद्धिमानी और योग्यता में किसी से रत्ती भी कम नहीं हैं. हमको चाहिए कि निजी लाभ की ओर ध्यान न देकर अपने समाज को प्रत्येक प्रकार से लाभ ही नहीं, स्वतंत्र, बलशाली और ख्यातिप्राप्त बनाने का प्रयास करें कि वे बुद्धिमानी और योग्यता में किसी से कम नहीं हैं. मनुष्य को चाहिए कि वह हर पल समाज की प्रगति का मार्ग तलाशे. इस बात के लिए बाबासाहेब इतिहास और साहित्य को जरूरी समझते थे. वह इसलिए  कि इतिहास लम्बे समय तक जिन्दा रहता है और ऊर्जा प्रदान करता है. इसलिए बाबासाहेब कहते थे कि लोगों को इतिहास भूलने का आग्रह करना गलत है. जो लोग इतिहास भूल जाते है, वे नए इतिहास का निर्माण ही नहीं कर सकते.

आज का साहित्य इसी बात को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है. हां! कल का दलित साहित्य, अब अम्बेडकरवादी साहित्य हो गया है जो मानवतावादी साहित्य के रूप में बाबासाहेब की विचारधारा को आगे बढ़ाने मे एक अहम भूमिका अदा कर रहा है. इसने तमाम दीवारें तोड़ दी हैं. दलित साहित्य जाति संबोधक है किंतु अम्बेडकरवादी साहित्य एक विचार को उद्घाटित करता है. यही होना भी चाहिए क्योंकि बाबासाहेब किसी एक वर्ग के नहीं. अपितु समग्र समाज के अगुआ थे.

कुछ कुबुद्धि राजनीतिज्ञ बाबासाहेब को देशद्रोह का आवरण पहनाने में पीछे नहीं हैं. ये वे लोग हैं जो भारत में व्याप्त जाति-प्रथा के समर्थक हैं. जबकि बाबासाहेब में राष्ट्र-प्रेम कूट-क़ूट कर भरा था. चाहे अछूतों के पक्ष में मंदिर प्रवेश का मामला हो, या तालाब के पानी का, धर्म परिवर्तन का या पूना पैक्ट से जुड़ा कम्युमनल एवार्ड का, बाबासाहेब ने कभी भी राष्ट्रहित की अनदेखी नहीं की.यह अलग बात है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बाबासाहेब ने अछूत समस्या पर गुमराह करने वालों से तर्क-वितर्क करने में कठोर रुख अपनाया. बाबासाहेब के राष्ट्रप्रेम को कुछ ऐसे समझा जा सकता है. बाबासाहेब कहते हैं कि मुझे अच्छा नहीं लगता कि जब  कुछ लोग कहते हैं कि हम पहले भारतीय हैं और बाद में हिन्दू या मुसलमान. किंतु मुझे यह मंजूर नहीं. धर्म, संस्कृति, भाषा आदि की होड़ में यकीन के रहते हुए आदमी के प्रति निष्ठा पनप ही नहीं सकती. मैं चाहता हूं कि लोग पहले भी भारतीय हों और अंत में भी भारतीय रहें. भारतीय के अलावा और कुछ नहीं. भारत के मामले में बाबासाहेब का मानना था कि भारत जैसा देश जहां सत्ता, साधन और संपत्ति एक छोटी कौम की बपोती है, जिसने कपट नीति से अधिकार हथियाएं, ऐसे देश में राजनीतिक  क्रांति से पहले सामाजिक क्रांति का होना जरूरी है. यह जानना जरूरी है कि बाबा साहेब के जमाने में संचार-तंत्र इतना व्यापक नहीं था जितना आज है. सो बाबासाहेब हाथ के लिखे खतों से ही ज्यदातर काम चलाते थे.

उनके पत्रों से पता चलता है कि वे अपने परिवार, समाज और उसके विभिन्न समुदायों तथा देश की छोटी-बड़ी सभी प्रकार की समस्याओं को लेकर कितने चिंतित रहते थे. इसलिए वे अपनी व्यक्तिगत समस्याओं से ज्यादा अपने समाज और समुदाय को लेकर ज्यादा गंभीर रहते थे. यह जानकर हैरत होगी कि लोकमान्य तिलक डॉ. अम्बेडकर के जितने विरोधी थे, तिलक के बेटे श्रीधर पंत बलवंत तिलक उतने ही डॉ. अम्बेडकर के पक्के प्रशंसक थे.

खेद की बात ये है कि आज तक भारत में किसी भी विद्यालय में बाबासाहेब अम्बेडकर के नाम से कोई Chair  स्थापित नहीं की गई है, जबकि कोलंबिया यूनिवर्सिटी में , जहाँ बाबासाहेब अम्बेडकर ने शिक्षा प्राप्त की थी, अम्बेडकर Chair की स्थापना की जा चुकी है. भारत में किसी भी विद्यालय में बाबासाहेब अम्बेडकर के नाम से कोई Chair  स्थापित न करना दुर्भावना नहीं तो और क्या है? क्या ऐसी भावनाएं अन्ना हजारे को नहीं सालती? क्या जाति-वाद अन्ना को नजर नहीं आता? नजर तो आता होगा किंतु चर्चा में बने रहने के लिए बेशक एक अलग मार्ग ही चाहिए, सो अन्ना ने किया. जीत भी गए. अच्छा हुआ. अन्ना हजारे भुखमरी के खिलाफ मुहीम छेड़ें तो जानें. इतना ही नहीं निचले स्तर पर हो रहे भ्रटाचार जैसे पुलिसिया तंत्र और जिला स्तर पर हो रहे भ्रटाचार को रोकने के लिए कौन सा अन्ना आएगा? सड़क ऊंची हो गई. दरवाजा ऊंचा करना है तो पुलिस को दक्षिणा दो. क्या जन लोकपाल बिल इसे रोक पाएगा? ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला, जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा. बस! आत्म-संतुष्टि की बात है, सो सरकार को भी मिल गई और अन्ना को भी. अब आपस में छींटा-कसी के दौर की बहुत संभावना है. वो होना ही है. कांग्रेस भाजपा पर और भाजपा कांग्रेस पर पत्थर उछालेगी ही. सत्ता की लड़ाई जो ठहरी.

अंत में, मैं कहना चाहूंगा कि बाबासाहेब ने कहा था कि किसी भी संविधान की सफलता या असफलता संविधान की अपनी नहीं होती अपितु उसे लागू करने वालों की नीयत पर निर्भर होती है. बाबासाहेब का मानना था कि बुद्धिमान व्यक्ति भला हो सकता है, लेकिन साथ ही वह दुष्ट भी हो सकता है. बाबासाहेब का यह भी मानना था कि सभी समता, स्वतंत्रता व भ्रातत्व के भाव के आधार पर प्रगति व खुशहाली के अवसर प्राप्त कर सकें, यही बाबासाहेब का मानवतावाद है जिसके लिए वे जीवन भर संघर्षरत रहे. यहां यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि बाबासाहेब अम्बेडकर एक सच्चे राष्ट्रवादी थे. उन्होंने जो भी मुद्दे छुए वो सब ऐसे रहे थे कि यदि उनका सही मायने में अनुपालन हो जाता तो आज का भारत खून के आंसू न बहाता.

लेखक तेजपाल सिंह तेज को हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार और साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. इनका संपर्क सूत्र tejpaltej@gmail.com है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.