2 अप्रैल भारत बंद: आक्रोशित दलित जनांदोलन

भारतीय जन आन्दोलनो के इतिहास मे 2 अप्रैल का भारत बंद दलितआक्रोशित जनांदोलन के रूप मे एक अनोखे तरीके से इतिहास मे दर्ज होकर रहेगा . जो बिना किसी दल विशेष नेता के आह्वान पर ना होकर स्व-स्फूर्त जन आन्दोलन मे तब्दील हो गया,जिसका मुख्य कारण वर्तमान भारतीय राजनीति,मीडिया व न्यायपालिका के साथ-साथ धर्माधिकारियो द्वारा दिये गये वक्तव्य मसलन दलितो,अछूतो का मंदिर प्रवेश निषेध बताकर बहुसंख्यक आबादी के दलित,पिछड़े,अल्पसंख्यक वर्ग की उपेक्षा एवं अवहेलना का परिणाम था . आऐ दिन इन वर्गो पर होने वाले कातिलाना हमले व अपने हक हकूक के लिऐ लड़ने वाले सामाजिक योद्धाओ को मिथ्या मुकद्दमे फंसा कर रासुका लगा कर जेल मे बंद कर, दलितो को अधिकार विहिन करने की न्यायपालिका की साजिश बहुजन समाज को लग रही थी ,जिसे पूर्णतया राजनीतिक सुरक्षा कवच मिला हुआ लगता है . इसी सोच विचार समझ के तहत खुद को असहाय व असुरक्षित होने के भाव मे उत्पीड़ितो का एक जुट होना व सड़को पर प्रतिरोध का स्वर उतरना लाजिम ही नही वरन एक बेबसी भी रही होगी.

खास वर्गो के लोगो को निशाना बनाकर उनकी सरे आम हत्याये करना,गौ हत्या व बिरयानी के नाम पर रोजी रोटी को हाथो से छीनना व नोटबंदी कर अंकिचन समाज व श्रमिक वर्ग की आर्थिक नाकेबंदी कर कमर तोड़ना ही मानो इस सरकार का एकमात्र ध्येय रह गया हो . आर्थिक उदारीकरण के नाम पर पूंजीवादी शक्तियो के हित लाभ हेतु आम नागरिको को हित वंचित करके व जाति धर्म के नाम पर जनमानस को उलझाये रखना,विकास के नाम पर जूमलेबाजी कर भाषणो द्वारा संतोष की घुट्टी पिलाकर ही रखना, मानो सरकार का एक मात्र उद्देश्य बन कर रह गया हो . लोकतंत्र मे नारो से कब और कितनी देर तक लुभाया जा सकता था .

EVM द्वारा वोटो के लूटने से आम मतदाता अपने को ठगा सा महसूस कर रहा था . आरक्षण के विरूद्ध उठती आवाजे,दलित अधिकारो पर सरकारी अंकुश व अनुसूचित जाति एव जनजाति तथा पिछड़े आदिवासियो के जल,जंगल,जमीन को हड़प कर कंक्रीट के जंगलो मे तब्दील करना, उनके हितो पर दिन प्रतिदिन होते कुठाराघात,दलित महिलाओ के साथ सामूहिक बलात्कार कर नंगा घुमाना व उनके गुप्तांगो मे सरिया,डंडे लाठिया घुसेड़ निर्ममता से हत्याये कर जलाकर खाक कर देना व पत्थरो से मार-मार कर चेहरे मोहरे को चिथड़े- चिथड़े कर लहुलुहान कर देना,नाबालिगो को अकेले मे दबोच कर लाठी,डंडे,सरिया,बेल्टो से नंगा कर पीटना,पेड़ से बांध कर बेरहमी से दंडित करना व करवाना इत्यादि. किस बर्बर संस्कृति का परिचायक रहा है यह एक सोचनीय ही नही वरन् एक विचारणीय प्रश्न समाज के सम्मुख उठ खड़ा हुआ . लेखक चिंतको को लोकशाही के धराशायी होने की वाजिब दिखती चिंता सताने लगी . विरोध मे कुछ लिखा तो शब्द के साथ शरीर भी मरने लगे . सरेआम लेखको को जान से मारने की धमकिया मिली और उसकी परिणति उन पर जान लेवा हमला कर जान लेकर ही हुयी.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खुलेआम लोकतंत्र मे हमला हुआ . हमारी चुनी हुयी सरकारे इनके विरूद्ध मौन धारण करे रही और मिडिया झूठी खबरो को सच साबित करने पर ही अपनी इतिश्री समझने लगा . जिसके लिये एक तरफा ब्यान बाजी को देख आम जन हताश व निराश होता रहा . जैसे उसके अधिकार और विवेक पर निरंकुश शासन का हथौड़ा चल रहा हो . इस चुप्पी के लिये जगह-जगह से प्रतिरोध के स्वर उभरने लगे और 2 अप्रैल के दिन भारत बंद मे इसका नजारा देखने को मिला . पूरा भारत आग की लपटो मे आखिर क्यो झुलस पड़ा . संविधान व देश को सम्मान देने वाला देशप्रेमी दलित जनांदोलन एकाएक कैसे हिंसक हो उठा, इस पर सरकारी तंत्र को अवश्य विचार करना पड़ेगा आखिर, वो कौन से अवांछित असमाजिक, राजनितिक,अपराधी तत्व थे .

जिन्होंने शान्ति प्रिय जनांदोलन को आग के हवाले कर दिया . सदियो से संताप झेलता आया समाज आखिर एक ना एक दिन तो उठ खड़ा होना तो चाहेगा ही वो भी संवैधानिक दायरे मे . भारतीय संविधान सबको बराबरी व अवसर की समानता प्रदान करता है यही सब कुछ वर्चस्वशाली व सत्ता सम्पन्न होते सामन्ती समाज को रास नही आ रहा था . जो लोग सदियो से धार्मिक /सामाजिक /राजनीतिक व शैक्षणिक सांस्कृतिक शोषण के शिकार होते रहे और आज सिर उठाकर चलने लगे तो तथाकथित वर्ग को यह सब नागवार गुजरने लगा और प्रतिक्रिया स्वरूप दिन पर दिन हिंसक होने लगा और यही उत्पीड़न निर्बल वर्ग को गहरे तक उनकी अस्मिता को तार-तार करने लगा,अंतत् उनका विवेक कभी तो जागना ही था ? बस यही से, लोगो का अधिकारो के प्रति विवेक का जागना ही उन्हे खलने अखरने लगा .

विगत वर्षो मे हुयी दलित छात्रो की संस्थागत हत्याये व अल्पसंख्यक समुदाय विशेष के छात्रो का एकाएक संस्थानो से गायब हो जाना तथा पुलिस प्रशासन से गुहार लगाने के बावजूद कोई हल ना निकलना व कानूनी कार्रवाई के नाम पर कोरा आश्वासन मिलना यही सब कुछ आम भारतीय नागरिको को गहरे तक पीड़ा देता रहा और वह चुपचाप इस संत्रास को झेलता रहा . जगह-जगह अम्बेड़कर की मूर्तियो को तोड़ना किस विरोध का प्रतीक बन उठ खड़ा हुआ . आखिर वो कौन से आराजक तत्व है सरकारी तंत्र व पुलिस प्रशासन को इन पर विचार करना पड़ेगा नही तो समाज का ताना बिखरने मे देर नही लगेगी. जो देश की राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिये एक बड़ा खतरा बनेगा .पड़ोसी देश,आऐ दिन देश को आतंकित करने पर तुला हुआ है .

हिन्दु फासीवादी ताकते सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर आमजन को आतंकित करने पर तुली है . जातिगत सेना का वजूद बढने लगा प्रतिक्रिया स्वरूप दलित जातियो ने भी अपने जातिगत संगठन बनाने शुरू कर दिये जो आगे चलकर वर्ग संघर्ष की राह पकड़ने का पथ ही साबित होगा .जो देश के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक ही सिध्द होगा . क्या यह सब षड्यंत्र सरकारी संरक्षण का परिणाम नही है ? इन सवालो के जवाब तो ढूंढने ही होगे . वरना, देश व्यापी आक्रोश तो सरकार के विरूद्ध उभरने ही लगा है . देश के चिन्तनशील बुद्धिजीवियो /साहित्यकारो को इन विषयो पर सरकार से संवाद तो स्थापित करना ही होगा. जनता का जनता द्वारा जनता के लिये स्थापित लोकतंत्र कंही खतरे मे ना पड़ जाऐ . ये आशंका निर्मूल नही है . संसार का सबसे दीर्घजीवि चार खम्बो पर खड़ा लोकतंत्र इन फासीवादी ताकतो से परास्त ना हो जाऐ . सत्तासीन राजनैतिक दलो ने समय-समय पर अपने-अपने हित साधने के लिये संविधान मे संशोधन किये फिर अमानत मे ख्यानत क्यो ?

इससे साफ प्रतीत होता है कि – ” किसी भी देश का संविधान कितना भी सर्वश्रेष्ठ क्यो ना हो,जब तक उसके लागू करने वालो की नियत ठीक नही, तो वह निरर्थक ही साबित होगा . (डा.अम्बेडकर )

आज संविधान की गरिमा को जीवित बनाये रखने का दायित्व केन्द्र व राज्य सरकारो का ही नही अपितू भारतीय गणतंत्र के प्रत्येक नागरिक का है . देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका पर दिन प्रतिदिन हावी होती जा रही है जो जातिगत मानसिकता को सामने रख न्याय की विषैली घुट्टी पिला रही है . जिस पर भारत के चार न्यायधीशो ने लीक को तोड़कर देश के प्रति अपनी वाजिब गम्भीर चिंता जाहिर की . जिस पर राज्यसभा व लोक सभा ने कोई संग्यान क्यो नही लिया ?
देश मे आऐ दिन हो रहे साम्प्रदायिक व जातिगत दंगे देश के आर्थिक विकास मे एक बड़ी बाधा बन कर आ रहे है . राजनीति जनसेवा के भाव से विमुख हो व्यवसायिकता की ओर मुखातिब हो चली है . पहले स्वय हित बाद मे राष्ट्र एवं नागरिक हित यही आज का भयावह राजनीतिक दौर है . जिसे जितनी जल्दी बदला जाऐ या फिर इस पर अंकुश लगाये बिन देश तरक्की की राह पर नही आ सकता . हर और विषमता आन खड़ी है . श्रमिक व किसान आत्महत्याऐ कर रहा है .
सरकारी शिक्षक कर्मचारियो मे सरकार की नीतियो के विरूद्ध रोष बढ रहा है . जिसके फलस्वरूप जगह-जगह आन्दोलनो का चलन बढने लगा है . सरकार को विषमता की और ध्यान देने की त्वरित आवश्यकता है वरना तो ऐसे लग रहा कि देश का अवाम बारूद के ढेर पर बैठ कर उचित समय का इंतजार कर रहा है . अंतत् सरकार को एकल शिक्षा प्रणाली पर जोर,ठेकेदारो के चंगुल से श्रमिक को बाहर निकालना,किसानो की फसल का उचित मूल्य,दलित अधिकारो का संरक्षण, आरक्षण का लाभ समुचित अनुपात मे देने की गारंटी व दलितो के सम्मान की रक्षा करना,पुलिस प्रशासन के जातिगत ढांचे को तोड़ना होगा . जिससे पुलिसकर्मियो द्वारा एक तरफा लाठियां भांजने पर अंकुश लग सके,युवाओ के रोजगार की गारंटी लेनी होगी,प्राईवेट सेक्टर रोजगारो मे आरक्षण व्यवस्था लागू हो, चुनाव प्रक्रिया को EVM रहित कर बैलेट पत्र से घोषित करे व आर्थिक बर्बादी को रोकने के लिये पूरे देश मे एक या दो चरण मे चुनाव सम्पन्न कराये जाये . जनसेवक की मृत्यु के बाद चुनाव करवाना अपवाद स्वरूप है . राजनीति को अपराधियो से मुक्त करने की और सरकार को अविलंब ध्यान देने की आवश्यकता पर विचार करना पड़ेगा या फिर वर्तमान सरकार या आने वाली सरकारे जन आक्रोश का सामना करने को तत्पर रहे.

डा.कुसुम वियोगी
(लेखक वरिष्ठ आम्बेडकरवादी कवि चिंतक साहित्यकार है)

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