सोशल मीडिया में उबाल, क्या जस्टिस कर्णन को दलित होने की सजा मिली थी

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में जजों के साथ हो रहे भेदभाव को लेकर इसके चार जजों के सामने आने के बाद जहां देश में बड़ी बहस छिड़ गई है तो वहीं, न्यायपालिका में दलित औऱ पिछड़े समाज के न्यायधीशों की गैरमौजूदगी और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने पर दलित समाज से आने वाले जस्टिस कर्णन को जेल भेजे जाने पर बहस छिड़ गई है.
खासकर देश के चीफ जस्टिस के विरोध में सामने आए चार में से दो जजों के यह कहने पर कि वो जस्टिस कर्णन पर दिए फैसले में नियुक्ति फैसले को फिर से देखने के पक्ष में थे, जस्टिस कर्णन को मिली सजा पर विवाद शुरू हो गया है. इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर भी न्यायपालिका और जस्टिस कर्णन को मिली सजा पर बहस छिड़ गई है.

संजय कुमार ने जस्टिस कर्णन की एक फोटो शेयर करते हुए लिखा है-
जस्टिस कर्णन अपनी बेदाग कमीज दिखाते हुए. लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना इन्हें भारी पड़ा और छः महीने की सजा भुगतनी पड़ी और कमीज को दाग लगाने की कोशिश हुई. सुना कि कल जस्टिस कर्णन प्रेस कांफ्रेंस देखकर मुस्करा रहे थे क्योंकि उनके खिलाफ निर्णय लेने में ये 4 जस्टिस महोदय भी थे.

तो लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर काली चरण स्नेही ने लिखा है-
जस्टिस कर्णन को क्या दलित होकर न्याय की बात कहने की सजा मिली थी? क्या दलितों की बात कहीं भी नहीं सुनी जाएगी?

न्यायपालिका में जजों की भर्ती और जस्टिस कर्णन और फिर लालू प्रसाद यादव को लेकर दिए गए फैसले पर लगातार टिप्पणी करने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने न्यायपालिका में जातिवाद का मुद्दा उठाते हुए लिखा है-

जस्टिस दीपक मिश्रा ने जस्टिस अरुण मिश्रा से कहा कि लालू यादव का फ़ैसला आप कीजिए. मिश्रा जी ने मिश्रा जी के मन का फ़ैसला दे दिया. हर केस की अलग अलग सुनवाई और 9 महीने में केस निपटाने का आदेश. नीचे की अदालत ने सुप्रीम कोर्ट का मूड भांप लिया. अब नीचे के मनचाहे फ़ैसले आने लगे.
इस तरह भारत में हो रहा है न्याय.
बीजेपी को दीपक मिश्रा पसंद है.

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