हकमार कौन !

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गत 23 अगस्त, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह दलितों के आरक्षित तबकों के संपन्न लोगों के बच्चों को प्रमोशन में आरक्षण पर दिए जाने पर सवाल उठाया है, उससे भारत में एक नए वर्ग,‘हकमार वर्ग’ को लेकर एक नया विमर्श शुरू हो गया है. हालाँकि ऐसा नहीं कि इससे पहले ऐसा नहीं होता रहा: होता रहा पर, एससी/एसटी के आरक्षित वर्ग की तुलनामूलक रूप से थोड़ी सी अग्रसर तीन –चार जातियों को हकमार वर्ग के रूप में चिन्हित करने का जैसा प्रयास सुप्रीम कोर्ट द्वारा सवाल उठाये जाने के अगले दिन से शुरू हुआ, वह अभूतपूर्व है. और इसके पीछे परोक्ष भूमिका वर्तमान सत्ताधारी पार्टी की है, जिसका प्रश्रय पाकर ही अब मीडिया और न्यायिक सेवा इत्यादि से जुड़े लोग हकमार जातियों को आरक्षण के दायरे से बाहर करने में सक्रिय हो गए हैं. बहरहाल जिन कथित अग्रसर जातियों पर आरक्षण छोड़ने का नैतिक दबाव बनाया जा रहा है क्या वे इतनी संपन्न बन चुकी हैं कि उन पर आरक्षण छोड़ने का दबाव बनाया जाय? इनको रिजर्वेशन से दूर धकेलने की मुहिम क्या युक्तिसंगत है? बहरहाल युक्तिसंगत न होने के बावजूद अगर पिछड़ों की भाँति दलितों की कुछ कथित संपन्न जातियों को हकमार बताते हुए आरक्षण से दूर धकेलने की मुहिम चल रही तो उसके पीछे एकाधिक कारण है.

दलितों की अग्रसर जातियों को क्रीमी लेयर और अन्यान्य तरीकों से आरक्षण के दायरे से बाहर रखने के पीछे का खास मकसद अनग्रसर जातियों को अवसर प्रदान करना नहीं, बल्कि प्रकारांतर में ‘योग्य कैंडिडेट उपलब्ध नहीं हैं’ के जरिये वह सीटें उन 15% अनारक्षित वर्ग के लोगों को शिफ्ट कराना है, जिनका अघोषित रूप से 50% से ज्यादा आरक्षण है. लेकिन आज दलितों के आरक्षित वर्ग की संपन्न जातियों को निशाने पर लेने के पीछे जो कारण प्रमुख रूप से क्रियाशील है, वह है बहुजन एकता से निजात पाना.

वैदिक काल से ही हिन्दू आरक्षण का लाभ उठाने वाली जातियों के समक्ष आतंक का अन्यतम विषय रहा है, वर्ण-व्यवस्था की वंचित जातियों की एकता, जिसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट आने के बाद लम्बवत विकास हो गया. मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के साथ ही वर्ण-व्यवस्था के अर्थशास्त्र के तहत सदियों से शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) से बहिष्कृत दलित-आदिवासी-पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित समूह परस्पर घृणा और शत्रुता की प्राचीर तोड़कर एक दूसरे के निकट आने लगे. वंचितों की एकता और उनकी जाति चेतना का राजनीतिकरण हजारों साल की विशेषाधिकारयुक्त और सुविधाभोगी जातियों को राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील कर दिया. इस कारण ही बहुजन एकता इनके लिए आतंक का विषय बन गयी. इस आतंक से निजात पाने के लिए ही शासक दलों की ओर से तरह-तरह की तरकीबें की गयीं, जिनमें प्रधान थी 24 जुलाई, 1991 को गृहित ‘नवउदारवादी अर्थनीति’. इस अर्थनीति में दलित-आदिवासी-पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित तबकों को मंडल पूर्व स्थिति पंहुचाने का भरपूर सामान देखते हुए ही देश के दोनों प्रमुख दलों के प्रधानमंत्रियों ने अपना वैचारिक मतभेद भुलाकर निजीकरण, उदारीकरण, विनिवेशीकरण, भूमंडलीकारण की अर्थनीति को आगे बढाने में एक दूसरे से होड़ लगाया, जिनमें सबसे आगे निकल गए वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

आज मोदी की नीतियों के कारण देश की टॉप की 10% आबादी का शासन-प्रशासन के साथ देश की धन-दौलत पर 9० प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो गया है. यही नहीं जो शिक्षा आरक्षण के अवसरों का लाभ उठाने का मुख्य जरिया है, मोदी राज में उस शिक्षा से आरक्षित वर्गों को पूरी तरह दूर धकेलने की तैयारी मुक्कमल हो चुकी है. अतः विगत चार वर्षों में मंडल से हिन्दू आरक्षणवादियों की हुई क्षति की भरपाई का जो बलिष्ठ प्रयास मोदी राज में हुआ, उससे बहुजन, विशेषकर दलित समुदाय शर्तिया तौर पर विशुद्ध गुलाम में परिणत होने जा रहा है. इस स्थिति को देखते को हुए आरक्षित वर्गों के बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट मोदी सरकार को 2019 में सत्ता से आउट करने और धनार्जन के समस्त स्रोतों में ‘जिसकी जितनी संख्या भारी – उसकी उतनी हिस्सेदारी’ लागू करवाने की निर्णायक लड़ाई के लिए नए सिरे से संगठित होना शुरू कर दिए.

किन्तु बहुत पहले से ही 2019 की तैयारियों में जुटी मोदी सरकार ने आरक्षित वर्गों बुद्धिजीवियों की तैयारियों का इल्म हो चुका था. लिहाजा आरक्षित वर्गों की एकता को छिन्न-भिन्न करने के लिए वह अगस्त 2017 में पिछड़ों के आरक्षण को तीन भागों में विभाजित करने की दिशा में अग्रसर हुई. तब बहुत से पत्रकारों ने सवाल किया था क्या सरकार दलितों के आरक्षण में भी ओबीसी की तरह विभाजन करेगी. उस समय सरकार की ओर से साफ इंकार कर दिया गया था. किन्तु 2018 में मोदी की अतिसवर्ण-परस्त नीतियों के कारण 2019 में सम्भावना और धूमिल हो गयी लिहाजा सरकर को ओबीसी की भांति दलित आरक्षण में भी कुछ करना जरुरी हो गया. उसी का परिणाम है हकमार वर्ग का नया सामाजिक-राजनीतिक विमर्श, जिसके जरिये दलितों के उन सक्षम जातियों को आरक्षित वर्ग के दायरे से अलग-थलग करने का उपक्रम शुरू हो चुका है, जो सामान्यतया शोषकों के खिलाफ चलाये जाने वाले आंदोलनों में पहली कतार में दिखती हैं. तो कहा जा सकता है भारत के असल हकमार मार्ग, जिनका वर्तमान सरकार की नीतियों के सौजन्य से शासन-प्रशासन सहित देश की धन दौलत पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो चुका है, की स्थिति सुरक्षित करने के मकसद से ही आरक्षित वर्गों की सबसे जुझारू जातियों को हकमार बताकर अलग-थलग करने की बड़ी साजिश शुरू हो गयी है.

दलितों में विभाजन से जो असर हो सकता है, भाजपा नेता नीतीश कुमार के साथ मिलकर उसका सफल प्रयोग बिहार में कर चुके हैं, जहां महा-दलितों को नाममात्र की सुविधाएँ दिला कर मंडल उत्तरकाल में दलितों में विकसित हुई चट्टानी एकता में गहरी दरार पैदा की जा चुकी है. और जिस तरह बहुजन नेतृत्व निष्क्रिय है, मुमकिन है सरकार का प्रश्रय पाकर न्यायिक और मीडिया जगत तथा संघ परिवार से जुड़े लोग आरक्षित वर्गों की कथित संपन्न जातियों को ‘हकमार वर्ग’ के रूप में स्थापित करने में सफल हो जांय. ऐसे में आरक्षित वर्गों की पिछड़ी जातियों के बुद्धिजीवीयों पर एक अतिरिक्त जिम्मेवारी आन पड़ी है.

इसमें कोई शक नहीं कि आरक्षण के अवसरों का असमान बंटवारा एक समस्या है, लेकिन इससे कई-कई गुना बड़ी समस्या है संपदा-संसाधनों का असमान बंटवारा. आज हजारों साल से शक्ति के समस्त स्रोतों पर एकाधिकार रखने वाले भारत के जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का पुनः मोदी राज में हर जगह 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा हो गया है. आधुनिक विश्व में कोई ऐसा देश नहीं है जहां परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग का इस तरह कब्ज़ा हो. यह यूं ही नहीं हुआ है : इसे सुपरिकल्पित रूप में अंजाम दिया गया है. आजाद भारत के शासकों ने जो महा-लोकतंत्र व मानवता-विरोधी काम अंजाम दिया, वह यह कि उन्होंने जन्मजात वंचितों-दलित,आदिवासी, पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित- को सरकारी नौकरियों को छोड़कर धनार्जन के बाकी स्रोतों- भूमि, सप्लाई, डीलरशिप,ठेकों,पार्किंग, परिवहन, फिल्म-मीडिया-में बिलकुल ही हिस्सेदारी नहीं दिया. और सरकारी नौकरियों में दिया भी तो मंडल उत्तरकाल में उसे ख़त्म करने में सारी ताकत झोंक दी. इस मामले में मोदी सरकार का कोई जवाब नहीं.

मोदी सरकार आरक्षित वर्गों के प्रति इतनी निर्मम रही है कि एक ओर जहाँ यह निजीकरण, विनिवेशीकरण इत्यादि के जरिये सरकारी नौकरियों के खात्मे में पूरी तरह मुस्तैद रही, वहीँ दूसरी ओर बची-खुची सरकारी नौकरियों की वैकेन्सी निकालने में तरह-तरह का षड्यंत्र करती रही. खुद मोदी सरकार ने मार्च 2016 में माना कि 2013 से 2015 के बीच केंद्र सरकार की नौकरियों में करीब 89 प्रतिशत गिरावट आई है. तब राज्य मंत्री जितेन्द्र कुमार ने संसद में बताया था कि 2013 में 1,51,841 सीधी नौकरिया दी गयीं थी, जो 2014 में घटकर 1,26,261 रह गयीं और 2015 में केवल 15,877 लोगों की सीधी भर्ती की गयी. इसका मतलब यह हुआ कि 2013 से 2015 के बीच आरक्षित वर्ग की नौकरियों में 90 प्रतिशत की गिरावट आई. एससी/एसटी और पिछड़े वर्गों के लिए निर्धारित आरक्षण के जरिये 2013 में 92,928 लोगों को नौकरी मिली थी. 2014 में यह तादाद 72,077 थी जो 2015 में महज 8,436 तक सिमट कर रह गयी. अब भाजपा के केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने 5 अगस्त, 2018 को स्पष्ट घोषणा कर दिया है कि सरकारी नौकरियां नहीं हैं और जब नौकरियां ही नहीं हैं तो आरक्षण का भी कोई अर्थ नहीं है!. तो यह है उस मोदी सरकार की कारगुजारी जो आरक्षण को पूरी तरह कागजों की शोभा बनाने के साथ सरकारी नौकरियों को कपूर की भाँति उड़ा चुकी हैं. कागजों की शोभा बन चुके उसी आरक्षण में आरक्षित वर्गों की अनग्रसर जातियों को वाजिब हिस्सेदारी दिलाने के लिए मोदी आज आरक्षण में विभाजन कर सामाजिक न्याय के नए मसीहा बनने की तैयारियों में जुट गए हैं. और अगर उनके सामाजिक न्याय की मुहिम सफल हो जाती है तो उसका हस्र एक रोटी के लिए कलहरत उन दो बिल्लियों जैसा हो जायेगा, जिनके मध्य रोटी का वाजिब बंटवारा करते-करते जज बना एक बन्दर पूरी रोटी ही खा गया और बिल्लियाँ देखती रह गयीं.

ऐसे में अब ओबीसी और एससी/एसटी के आरक्षित वगों की पिछड़ी जातियों के समक्ष दो ही ठोस विकल्प रह गए हैं.पहला, वे सामाजिक न्याय के नए मसीहा मोदी के साथ मिलकर अपने हकमार भाइयों को अलग-थलग करने की मुहिम में जुट जाएँ, ताकि कागजों की शोभा बन चुके आरक्षण में अपना वाजिब हिस्सा पा सकें. दूसरा, अपने हकमार भाइयों के साथ मिलकर धनार्जन के समस्त स्रोतों में- जिसकी जितनी सख्या भारी,उसकी उतनी भागीदारी- की नीति लागू करवाने की लड़ाई लड़ें और यह लड़ाई जीतने के बाद फिर आपस में मिलकर नए सिरे से आरक्षण बंटवारा कर लें.!और यदि क्रांतिकारी बदलाव की इच्छाशक्ति हो तो संगठित होकर भारत को आज का दक्षिण अफ्रीका बनाने प्रयास करें.स्मरण रहे दक्षिण अफ्रीका में भारत के बहुजनों सादृश्य मूलनिवासी कालों की तानाशाही सत्ता कायम होने के बाद वहां शक्ति के समस्त स्रोतों पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा रखने वाले गोरे आज हर क्षेत्र में 9-10 प्रतिशत पर सिमटने के लिए मजबूर हो चुके हैं. भारत को आज का दक्षिण अफ्रीका बनाने का परिणाम क्या हो सकता है, आरक्षित वर्गों की अन्ग्रसर जातियों के लिए इसकी कल्पना करना कोई कठिन काम नहीं है.

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